Thursday, June 28, 2018

मेरी गंगा यात्रा भाग-54

मेरी गंगा यात्रा भाग-54
इक प्रयास गंगा बचे
कई बार मुझे लगता हैं कि हमारी नदियों पर या ऐसे भी कह सकते है भारतीय जनमानस पर किसी प्यासे का श्राप लगा है जो नदियों प्रदूषित हो गई हैं जिस देश मे लोग प्याऊ लगाते थे इंसान और पशु दोनों के लिये,जहां जल को पिलाना धर्म और पुण्य का काम था उस देख मे पानी बिकता हैं विश्व का सबसे अधिक प्रकृति जल 4% भारत के पास है फिर भी लानत हैं कल हवा पर भी टैक्स होगा..? पानी क्या किसी फैक्ट्री मे बनता हैं,..? भई यह तो प्रकृति हैं जो क़ुदरत ने बेमोल दिया है फिर उसको बेचना कहा तक उचित हैं गरुड़ पुराण मे इसे महा पाप कहा हैं इसके लिये यम के द्वारा दण्ड का भी प्रवधान हैं प्रकृति देंन का फिर मोल क्यो,पानी मनुष्य की मौलिक आवश्यक हैं जिसके बिना कोई तीन दिन से अधिक जी नही सकता, वह भी बिक्री होने लगा है चलिये गंगाजल पर चर्चा करते हैं आयुर्वेद की दृष्टि से भी गंगाजल में जो गुण पाए जाते हैं। उन्हें देखकर भी चकित रह जाना पड़ता है। आयुर्वेद ने समय समय पर गंगा जल पर शोध किये महात्मा चरक ने जिसका काल आज से दो हजार वर्ष पूर्व है- गंगाजल को पथ्य माना है। आयुर्वेद मे चरक संहिता का अपना स्थान हैं आधुनिक युग मे चक्रमणि दत्त ने भी, जो सन् 1060 के लगभग हुए हैं, इसका समर्थन किया है। ‘भण्डारकर ओरियण्टल इन्स्टीट्यूट’ में एक प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ है ‘भोजन कुतूहल’। उसमें गंगाजल की उपयोगिता बताते हुए लिखा है- ‘गंगाजल श्वेत, स्वादु, स्वच्छ, रुचिकर, पथ्य, भोजन पकाने योग्य, पाचक शक्ति बढ़ाने वाला और बुद्धि को तीव्र करने वाला है।गीता प्रैस मे भी बहुत सी पुस्तकें हैं जिसमें गंगा जल के शोध पर लेख मिलते है अलबतूता अरबी शोध कर्ता ने भी गंगा जल को औषधि कहा,’प्रसिद्ध विश्व यात्री मार्क टूइन ने अपनी ‘संसार-यात्रा’ में लिखा है- ‘गंगाजल’ की मैंने स्वयं परीक्षा की है। इसमें बीमारियों के कीटाणुओं को मारने की बड़ी शक्ति है। यह जल अत्यन्त शुद्ध और पवित्र है। मैं स्वामी हरिहर इस बात का समर्थन करता हूं जब से मैंने गंगा जल का आचमन लेना आरम्भ किया है इससे आत्म विश्वास बड़ा है हैं शरीर मे रोग प्रतिरोधक क्षमता बड़ी है यही कारण है कि हम भारतीयों का मानना है गंगाजल के पीने और उसमें स्नान करने से पापी मनुष्य के विचार भी शुद्ध और पवित्र हो जाते हैं।’फारसी के सुविख्यात कवि श्री आफरी ने भागीरथी के जल का गुणगान करते हुए लिखा ,गंगाजल में गोता लगाओ ताकि पुण्य का मोती हाथ लगे। यदि तुम अपने होठों को गंगाजल से तर कर लोगे तो फिर महायात्रा (मृत्यु) के वन में प्यास से न तड़पोगे और प्रलय के भयंकर ताप में पड़कर भी न जलोगे।’फ्राँसीसी यात्री टैवनियर ने भी गंगाजल के सम्बन्ध में इस प्रकार का बहुत कुछ लिखा है। गंगाजल की इन्हीं उपयोगिताओं के कारण हमारे यहाँ अनादि काल से राजाओं से लेकर निर्धनों तक इसका प्रयोग होता आया है। केवल हिन्दुओं में ही नहीं किन्तु मुस्लिम शासन काल में बादशाहों के महलों में भी गंगाजल का ही प्रयोग होता था लखनऊ के नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट एनबीआरआई के निदेशक डॉक्टर चंद्र शेखर नौटियाल ने एक अनुसंधान में प्रमाणित किया है कि गंगा के जल में बीमारी पैदा करने वाले ई कोलाई बैक्टीरिया को मारने की क्षमता बरकरार है.लखनऊ के नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट एनबीआरआई के निदेशक डॉक्टर चंद्र शेखर नौटियाल ने एक अनुसंधान में प्रमाणित किया है कि गंगा के पानी में बीमारी पैदा करने वाले ई कोलाई बैक्टीरिया को मारने की क्षमता बरकरार है.करीब सवा सौ साल पहले आगरा में तैनात ब्रिटिश डाक्टर एमई हॉकिन ने वैज्ञानिक परीक्षण से सिद्ध किया था कि हैजे का बैक्टीरिया गंगा के पानी में डालने पर कुछ ही देर में मर गया
डॉक्टर नौटियाल ने यह परीक्षण ऋषिकेश और गंगोत्री के गंगा जल में किया था, जहाँ प्रदूषण ना के बराबर है. उन्होंने परीक्षण के लिए तीन तरह का गंगा जल लिया था. एक ताज़ा, दूसरा आठ साल पुराना और तीसरा सोलह साल पुराना गंगा नदी का पानी औद्योगिक प्रदूषण के साथ साथ गंदगी का शिकार है
उन्होंने तीनों तरह के गंगा जल में ई-कोलाई बैक्टीरिया डाला. डॉ. नौटियाल ने पाया कि ताजे गंगा पानी में बैक्टीरिया तीन दिन जीवित रहा, आठ दिन पुराने पानी में एक एक हफ़्ते और सोलह साल पुराने पानी में 15 दिन. यानी तीनों तरह के गंगा जल में ई कोलाई बैक्टीरिया जीवित नहीं रह पाया.अभी गंगा जल पर और शोध होने चाहिए सरकार को चाहिए कि वह गंगा के लिये अलग से मंत्रालय बनाये जो गंगा के रख के साथ ही नये शोध भी करे आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध गंगा जल मिलना चाहिए जैसे हमारे बढ़ो ने हमें दी,

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