Tuesday, June 12, 2018

मेरी गंगा यात्रा भाग-43

मेरी गंगा यात्रा भाग-43
एक प्रयास गंगा बचे उत्तर प्रदेश का बदनसीब वाराणसी शहर जो प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र है, जो अब और तब या कहो हमेशा अनदेखी के दर्द को झेल रहा हैं और दर्द झेल रही गंगा,संस्कारो की धरती,धर्म ध्वजा भी कह सकते है शिव और सूर्य की प्रिय धरती , इसके बारे मे कहते यह देवताओं की भूमि हैं जितनी बड़ी वाराणसी हैं इससे बड़ी वाराणसी गुप्त रूप से गङ्गा भी के आसपास कहि भूमि के गर्भ मैं है यहां देवताओं का वास है खैर यह अलग विषय हैं बात अनदेखी का हैं यहाँ पहुचते पहुचते गङ्गा जी बदरंग हो जाती हैं जहाँ कभी पानी केबड़े जहाज चलते थे आज वहा गंगा मे जल स्तर ही नही रहा हैं है तो शहर कस्बों का गन्दा पानी,यहां वर्ष 1992 में बीओडी यानी बायोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड 5 मिलीग्राम प्रति लीटर थी जो वर्ष 2015 में बढ़ कर 8.3 हो गई है। जबकि जिन्स फिकल कोली फार्म की संख्या सौ प्रति मिलीलीटर थी, यह बढ़ कर 49 सौ हो गई है।मित्रों हो रही है न उन्नति,..? केवल बनारस की ही  बात करें तो 44 नालों के जरिये तकरीबन 46 एमएलडी सीवेज और कचरा गंगा नदी में प्रवाहित हो रहा है। और नमामि गङ्गे घाटो का निर्णय कर गङ्गा बचा रही हैं या घाट सौन्दर्य करण पर व्यय हो रहा है दूसरे मणिकर्णिका व हरिश्चंद्र घाटों पर एक वर्ष में इकतालीस हजार शव जलाए जाते हैं जिनमें नब्बे टन राख निकलती है और यह राख गंगा नदी में ही प्रवाहित होती है। जिससे गंगा का मोक्ष निश्चित हैं वही वाराणसी के अलावा फर्रुखाबाद, कन्नौज, कानपुर व इलाहाबाद में बढ़ते शहरीकरण से पिछले दो दशक में गंदे पानी की मात्रा में बेतहाशा वुद्धि हुई है! इस प्रदेश में विशेष रूप से हरिद्वार में प्रदूषण की स्थिति काफी भयानक है। वर्ष 2015 के सर्वे के मुताबिक 16.87 मिलियन टन सीवर का गंदा पानी गंगा में रोजाना मिल रहा है। आज क्या स्थिति हो गई सोचे,अगले लेखों मे हम 2018 के आंकड़े भी पेश करेंगे, पिछले समय जब सपा की सरकार थी तब केंद्र व राज्य के झगड़ों के बीच 43 सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) फंसे हुए थे। यहां एसटीपी बारह क्षेत्रों में स्थापित होने हैं। स्टेट प्रोजेक्ट मैनेजमेंट ग्रुप 52 करोड़ की योजना केंद्र को सौंप चुका है। इस पर केंद्र का स्पष्ट कहना है कि एसटीपी पर होने वाले कुल खर्च का तीन फीसद उत्तराखंड सरकार को वहन करना चाहिए। जबकि उत्तराखंड सरकार को यह मंजूर नहीं है। उसका साफ कहना है कि एसटीपी पर जो खर्च हो वह पूरा का पूरा केंद्र सरकार को वहन करना चाहिए। मेरे शिक्षा काल मे हम पढ़ते थे गांधी के सपनो का भारत, क्या यही है आजादी के 75 सालों के बाद भारत और उसकी नदियों की स्थिति साहब, मोदी जी आपके शासन के स्वर्णिम 4 वर्ष भी समाप्त हो गये अब एक वर्ष अपने संसदीय क्षेत्र पर भी ध्यान दे उमा जी की जगह नितिन जी और उनकी जगह कोई और फिर और से प्रदूषित समस्या का अंत नही होगा

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