Wednesday, November 20, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग 100

मेरी गंगा यात्रा भाग 100
इक प्रयास गंगा बचे
आज मेरी यात्रा अपने 100 कदम पर है पर अफसोस कि गंगा प्रदूषित ही रही, 100 वर्षो से मैला ढोती गंगा बत से बतर हो गई ओर हमने भी 50 वे वर्ष की ओर कदम बढ़ा दिया आज से 30 वर्ष पूर्व आरम्भ प्रयास जारी है ताजा स्थिति मोदी काल मे यह हैं कि आज भी नालों के जरिये गंगा जल में घुल गए मानव मल में ई. कॉलि जैसा फीकल कॉलिफॉर्म बैक्टीरिया पाया जाता है। इसका उच्चस्तर पानी में बीमारी पैदा करने वाले रोगाणु की मौजूदगी को बढ़ाता है। FC की अनुमति प्राप्त सीमा प्रति 100 मिलीलीटर पानी में 2500 एमपीएन है। इसका अपेक्षित स्तर प्रति 100 मिलीलीटर में 500 एमपीएन है। सबसे ज्यादा एफसी पश्चिम बंगाल के बहरामपुर में खाग्रा में पाया गया है। यहां प्रति मिलीलीटर 30,000 एमपीएन मिला है जो अनुमति प्राप्त स्तर से 12 गुना और अपेक्षित स्तर से 60 गुना ज्यादा है। तब जब आज गंगा पर विशेष ध्यान दिया जा है मोदी जी आने के बाद एक मंत्री का तबादला कर नया भार गड़गड़ी जी दिया गया पर प्रयास राजनीति से प्रेरित ही नजर आये सरकार ने गंगा को लेकर शोर मचाया तो मीडिया भी चिंतित दिखा यू लगा समाज मे परिवर्तन आ गया पर ,..? सब शेर कुछ दिन दहाड़े फिर सो गये आज न सरकार न समाज न मीडिया मे कोई चर्चा है न हलचल,..
क्या गंगा पर कार्यक्रम बना कर गंगा प्रदूषण मुक्त होगी सदियों से सबसे पवित्र मानी जाने वाली गंगा नदी का जल नालों से आने वाली गंदगी की वजह से और प्रदूषित हो गया है।  ,उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड से गुजरने वाली नौ अंतर-राज्यीय सीमाओं पर पानी की गुणवत्ता के आंकड़ा बताते गंगा प्रदूषण मुक्त नही प्रदूषण युक्त हुई । गंगा की स्वच्छता को धन उगाही या व्यावसायिक व औद्योगिक धंधे के भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता है।यह बेहद दुखद है कि देश की नदियों के 351 हिस्से प्रदूषित हैं।

Monday, November 18, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग 99

मेरी गंगा यात्रा भाग 99
एक प्रयास गंगा बचे
गंगा के अपार प्रदूषण, उसके व्यवसायीकरण और सफाई के एक के बाद एक सरकारी तथा गैर सके
सरकारी अभियानों के बीच केंद्र सरकार ने 2018 मे दावा था कि मार्च 2019 तक गंगा 80 फीसदी तक साफ हो जाएगी. पर ऐसा हुआ नही आज भी जब 2019 भी समाप्ति की ओर है गंगाजी की गंदगी को देखकर ये लक्ष्य उम्मीद से अधिक संदेह पैदा लगता हैं, लगता हैं कि गंगा जी 2024 तक भी प्रदूषण मुक्त नही हो सकती
वही केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी का कहना था गंगा 70-80 प्रतिशत साफ हो जाएगी. उनके मुताबिक ये कहना गलत है कि नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत कुछ खास काम नहीं हुआ क्योंकि चार साल में अभियान के नतीजे दिखने लगे हैं. पर मुझे लगता हैं नतीजे कागज़ो में दिख रहे है धरातल पर तो कुछ बदलाव नही आता,राष्ट्रीय गंगा सफाई मिशन (एनएमसीजी) के तहत करीब 21 हजार करोड़ रुपए की कुल 195 परियोजनाएं संबद्ध राज्यों में चलाई जा रही हैं. सरकार का दावा है कि सफाई के वृहद अभियान का ही नतीजा है कि गंगा के जलस्तर में उसकी सेहत का अंदाजा लगाने वाले तीन पैमानों पर सुधार हुआ है- बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी), डिसॉल्व्ड ऑक्सीजन (डीओ) और कोलिफोर्म. 2016 के मुकाबले 2017 में गंगा प्रवाह के 80 स्थानों पर जलस्तर में सुधार पाया गया. 33 जगहों पर डीओ स्तर बेहतर हुआ है तो 26 जगहों पर बीओडी लेवल सुधरा है. तीस जगहों पर कोलीफोर्म बैक्टीरिया काउंट में गिरावट आई है. लेकिन 2500 किलोमीटर लंबी नदी के लिए ये आंकड़ा पर्याप्त नहीं है.पर आज क्या सही स्थिति हैं वह अवगत नही हैं  कृपया मंत्री मेरी गंगा यात्रा का पिछले भाग को पढ़ तो सच से अवगत हो जायेंगे

मेरी गंगा यात्रा भाग 98

मेरी गंगा यात्रा भाग 98
इक प्रयास गंगा बचे
"यू तो कुछ नया नही गंगा की चर्चा के सिवा, 
बस पगला गया हूं मैं भी मजनूं की तरह,..
आप भी कहते होंगे कुछ और लेख या चर्चा करो पर, मित्रों यहाँ तो केवल गंगा और प्रदूषण की चर्चा ही होगी यह तो जीवन ही गंगा जी को समर्पित हो ,सच गर ऐसा हो फिर कोई ग़म नही, युगों से निर्मल बहती गंगा आज प्रतिकार कर रही हैं मिटती गंगा का आवाहन हैं कि मेरा मिटता अस्तित्व संस्कृति के एक सुंदर अध्याय का अंत होगा सौ वर्षों से लगातार बढ़ते प्रदूषण के कारण कई विषाक्त तत्वों का जहर गंगा नदी में लगातार घुल गया है। सौ वर्षों मे गंगा और नदियां नाला और मैला ढोने का जरिया रह गई हैं वही बीएचयू के वैज्ञानिकों ने अब एक अध्ययन में पाया है कि नदी के तलछट में मौजूद सूक्ष्मजीवों की एंजाइम क्रियाएं गंगा में भारी धातुओं के प्रदूषण का पता लगाने में मददगार हो सकती हैं।अगर ऐसा है तो यह अच्छी खबर हो सकती हैं वह कहते है कुल कार्बनिक कार्बन, नाइट्रेट, अमोनियम, फास्फेट जैसे पोषक तत्वों, कैडमियम, लेड, निकेल, क्रोमियम, जिंक एवं कॉपर जैसी भारी धातुओं और प्रोटिएज, फॉस्फेटेज, एफएडीएज, ग्लूकोसाइडेज जैसे सूक्ष्मजीव एंजाइमों के बीच अन्तरक्रियाओं की पड़ताल करने के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं।अध्ययनकर्ताओं के अनुसार पोषक तत्वों, भारी धातुओं और कुल कार्बनिक कार्बन की मात्राओं में विविधता का मुख्य कारण मानवजनित गतिविधियां हैं। नदी तलछटों में पोषक तत्वों और कार्बन के बढ़ने से जैविक एंजाइम गतिविधियां बढ़ जाती हैं। हांलाकि, कुछ ऐसे भी स्थल पाए गए हैं, जहां पोषक तत्व ज्यादा होने के बावजूद वहां एंजाइम क्रियाएं कम थीं। इसके लिए वहां भारी धातुओं की अत्यधिक मात्रा को जिम्मेदार माना जा रहा है, जो इन जैविक क्रियाओं को सीमित कर देती हैं। भारी धातुएं यहां पोषक तत्वों की जैव उपलब्धता को भी कम कर देती हैं। नदी तलछटों में सूक्ष्मजीव एंजाइम क्रियाओं पर भारी धातुओं के जैविक प्रभावों को समझना एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक चुनौती है। जलीय पारिस्थितिकी प्रणालियों में नदी तलछटों में सूक्ष्म जैविक समुदाय ऊर्जा के प्रवाह, पोषक चक्रों और कार्बनिक पदार्थों के विघटन को विनियमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः नदी के तलछटों में संचयित पदार्थों के साथ सूक्ष्मजीव क्रियाओं को जोड़ना क्षेत्रीय मानवजनित प्रदूषण के कारणों को समझने का एक संवेदनशील सूचक हो सकता है।

Saturday, November 2, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग 97

मेरी गंगा यात्रा भाग 97
एक प्रयास गंगा बचे
आज देश एक विकट परिस्थितियों से गुजर रहा है जिनका इतिहास वैदिक युग से भी पुराना हैं जिनके रीतिरिवाज लाखो वर्ष पुराने हैं जो हर खुशी को उत्सव त्यौहार की तरह मनाते हैं जो धरती,पेड़,नदियों सब मे दैव रूप देखते हो,आज वह अपने घर मे ही बंधक लगते है अपने रीतिरिवाज मनाने की मानो स्वतन्त्रता नही है विसर्जन रिवाज़ो का हिस्सा हैं क्या विसर्जन से ही नदियाँ प्रदूषित होती हैं..?कल को सरकारें स्नान पर भी प्रतिबंध लगा दे तो ,…?करोड़ों लोगों के स्नान से गंगा मैली हो रही हैं त्योहारी सीजन में यदि आपने गंगा या उससे जुड़ी किसी सहायक नदी में मूर्ति विसर्जन करने की योजना बनाई है तो इसका परिणाम 50 हजार रुपये का जुर्माना चुकाकर भुगतना पड़ सकता है। राष्ट्रीय क्लीन गंगा मिशन (एनएमसीजी) के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा ने ये दिशा-निर्देश 16 सितंबर 19 को जारी किए थे। इनमें कहा गया है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों में किसी भी तरह के मूर्ति विसर्जन की अनुमति नहीं दी जाएगी  हा यह आदेश केवल जनता पर ही लागू है सरकारी संस्था का कचरा नाले जा सकते है उसकी अनुमति हैं उसके लिये कोई कठोर कार्यवाही और जुर्माना नही है केंद्र सरकार ने गंगा और उसकी सहायक नदियों में प्रदूषण में बढ़ोतरी पर रोक लगाने के लिए राज्यों को 15 बिंदु वाला दिशा-निर्देश जारी किया है, जिसमें मूर्ति विसर्जन करने पर 50 हजार रुपये का जुर्माना वसूलने का आदेश दिया गया है। 
भई कोई ऐसा कानून भी लाओ की सरकारी तंत्र पर भी कार्यवाही हो, नियमों का अनुलंघ्न करने वालो पर शिकंजा कसै,

मेरी गंगा यात्रा भाग 96

मेरी गंगा यात्रा भाग 96
इक प्रयास गंगा बचे
अगर आप सोचते हैं कि बड़े शहरों की बजाय गंगा किनारे मैदानों में रहने वाले लोग वायु प्रदूषण से मुक्त हैं और लंबा जीवन जीते हैं। तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। गुरुवार को शिकागो यूनिवर्सिटी की शोध संस्था की तरफ से जारी रिपोर्ट ने हैरान करने वाला खुलासा किया है। यह रिपोर्ट ‘वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक’ (एक्यूएलआई) नाम से जारी की गई है। इसमें कहा गया है कि उत्तरी भारत, खासतौर पर गंगा के मैदानी इलाकों में बसे 48 करोड़ से अधिक लोगों का जीवनकाल वायु प्रदूषण के चलते सात वर्ष कम हो रहा है।वर्ष 1998 में लोगों के जीवन पर वायु प्रदूषण का प्रभाव आज के मुकाबले आधा होता, अगर वहां प्रदूषण की सघनता विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों के सापेक्ष रहती। उस स्थिति में गंगा के आसपास बसे लोगों का जीवन काल आज के मुकाबले आधा यानी 3.7 वर्ष की कमी हुई होती। लेकिन वायु प्रदूषण में 72 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी ने यहां के लोगों का जीवनकाल 7.1 वर्ष कम कर दिया है।
3.7 वर्ष की कम हुई लोगों की उम्र!
शिकागो विश्वविद्यालय, अमेरिका की शोध संस्था ‘एपिक’ का ‘वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक’ का नया विश्लेषण बताता है कि भारत के उत्तरी क्षेत्र यानी गंगा के मैदानी इलाकों में रह रहे लोगों की ‘जीवन प्रत्याशा’ करीब सात वर्ष कम होती जा रही है। इन जगहों के वायुमंडल में ‘प्रदूषित सूक्ष्म तत्वों और धूलकणों से होने वाला वायु प्रदूषण’ यानी पार्टिकुलेट पॉल्यूशन विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय दिशानिर्देशों को हासिल करने में विफल रहा है। शोध अध्ययनों के अनुसार इसकी वजह है कि वर्ष 1998 से 2016 में गंगा के मैदानी इलाकों में वायु प्रदूषण 72 प्रतिशत तक बढ़ गया है। यहां भारत की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है।

Tuesday, October 15, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग 95

मेरी गंगा यात्रा भाग 95
इक प्रयास गङ्गा बचे
कहते है कि गंगा जी का जल कभी ख़राब नहीं होता पर लगता हैं यह अब किताबी कहानी मात्र रह गई हैं जैसे कल्पना की कहानी अलिफ़ लैला हो, गंगा अपने पहले मैदानी तीर्थस्थान ऋषिकेश से ही प्रदूषित हो रही थी जैसा कि आप जानते ही हैं गंगा के लगभग 2525 कि.मी. लंबे सफर तय करती हैं कितनी सुन्दर गणना हैं मानो भगवान सदाशिव ने स्वयं गंगा जी का सफर मार्ग तय किया हो. कहते है ऋषिकेश पहला मैदानी पड़ाव है. यहां नाले और सीवर का पानी गिरने से गंगा में प्रदूषण शुरू हो जाता है. पर अब नज़ारा कुछ और हैं। गंगा मे पहला नाला उत्तराखंड के शहर उत्तरकाशी से आरम्भ हो जाता है कुछ साल पहले तक त्रीवेणी घाट में सरस्वती नदी, गंगा में मिलती थी जो अब विलुप्त हो चुकी है. यही रहा तो गंगा भी विलुप्त हो जायेगी.विलुप्त सरस्वती नदी की जगह सरस्वती नाला ने ले ली है. इसमें पूरे शहर की गंदगी बहायी जा रही है जो आगे चलकर गंगा में मिल जाती है. गंगा किनारे लगातार बसायी जा रही बस्तियों चन्द्रभागा, मायाकुंड, शीशम झाड़ी में शौचालय तक नहीं हैं. इसलिए ये गंदगी भी गंगा में मिल रही है.पहाड़ी गङ्गा प्रदूषण के लिये मैदानी आबादी को,और मैदानी लोग पहाड़ियों को दोषी बताते है पर कम कोई भी नही ऐसे मे नुकसान नदियों के नाश के साथ हमारी आने वाली नस्लो का हो रहा है जो प्रदूषित वायु,जल,थल,नभ, और अब अंतरिक्ष को पायेंगे अगर आने वाली पीढ़ी का चित्र बनाये तो कैसा होगा कमर पर आक्सीजन का सिलेंडर, नाक मे पाइप, पेट के अगर भाग पर वाटर फ़िल्टर औऱ पानी की ख़ोज में मारा मारा फिरता जीवन,..मैं कई बार लिख चुका हूं कि विश्व के सभी राष्ट्र को एक होना होगा और मिलकर प्रयास करने होंगे क्योंकि मनुष्य एक जाति हैं और उसकी रक्षा मिलकर हो सकती हैं आज मनुष्य के विकास क्रम को लाखों वर्ष हो गये हैं पर आज भी हम आपस मे भेद भाव से जीते है तो साहब विकास कैसा..?विकास ने मानव उन्नति से अधिक विनाश को जन्म दिया हैं

Monday, October 14, 2019

मेरी गङ्गा यात्रा भाग 94

मेरी गंगा यात्रा भाग 94
मित्रों ये तो अच्छा है कि नदियों के उथान के लिये विश्व के सभी देश प्रयासरत हैं वही भारत की नदियों की बात करे तो यह हमेशा से ही सरकार व समाज द्वारा अनदेखी का शिकार रही, या यूं कहे सरकार लापरवाह रही समाज नदियों की हत्या करता रहा और भूल गया कि जल ही जीवन हैं आज नदियों की अनदेखी का परिणाम आने लगा है प्रदूषित पानी बीमारियों का घर हो गया आज भारत मे कैंसर किड़नी फैलियर के मरीज क्यो बढ़ रहे है..? जिसका एक मुख्य कारण जल प्रदूषण नदियों की हत्या ही है ये मैं नही कहता ये WHO और सीपीसीबी की रिपोर्ट भी बताती है वही यह देखे साल 2013 के मुक़ाबले कई सारी जगहों पर गंगा के पानी का बीओडी लेवल बढ़ गया है, यानि पहले के मुकाबले गंगा और ज़्यादा दूषित हुई हैं साल 2017 की सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक 80 में से 36 जगहों पर गंगा नदी का बीओडी लेवल 3 मिलीग्राम/लीटर से ज़्यादा था और 30 जगहों पर बीओडी लेवल 2 से 3 मिलीग्राम/लीटर के बीच में था. वहीं साल 2013 में 31 जगहों पर गंगा का बीओडी लेवल 3 से ज़्यादा था और 24 जगहों पर 2 से 3 मिलीग्राम/लीटर के बीच में था.सीपीसीबी के मापदंडों के मुताबिक अगर पानी का बीओडी लेवल 2 मिलीग्राम/लीटर या इससे नीचे है और डीओ लेवल 6 मिलीग्राम/लीटर या इससे ज़्यादा है तो उस पानी को बगैर ट्रीटमेंट (मशीन द्वारा पानी साफ करने की प्रक्रिया) किए पिया जा सकता है.वहीं अगर पानी का बीओडी 2 से 3 मिलीग्राम/लीटर के बीच में है तो उसका ट्रीटमेंट करना बेहद ज़रूरी है. अगर ऐसी स्थिति में बगैर ट्रीट किए पानी पीया जाता है तो कई सारी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं.इसी तरह अगर पानी का बीओडी लेवल 3 से ज़्यादा और डीओ लेवल 5 मिलीग्राम/लीटर से कम है तो वो पानी नहाने के लिए भी सही नहीं है. इस पानी को पीने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता. और लोग आस्था के नाम पर आचमन कर रहे है और बोतलों मे बन्द कर घर ले जा रहे तो परिणाम क्या होगा हालांकि गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता रिपोर्ट के मुताबिक ज़्यादातर जगहों पर पानी की दशा ठीक नहीं है.केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) साल 1980 से भारत की नदियों के पानी की गुणवत्ता की जांच कर रहा है और इस समय ये 2,525 किलोमीटर लंबी गंगा नदी की 80 जगहों पर जांच करता है. इससे पहले सीपीसीबी 62 जगहों पर गंगा के पानी की जांच करता था.सीपीसीबी गंगोत्री, जो कि गंगा नदी का उद्गम स्थल है, से लेकर पश्चिम बंगाल तक गंगा के पानी की गुणवत्ता की जांच करता है. यह देखकर यही कह सकते है 2014 से उम्मीद हुई थी पर जय हो नमामि गङ्गे,.. निश्चित ही कठोर पर परिमाण आना बाकि के हैं मंगल पर जाने वाले भारत को नदियों की भी चिन्ता करनी होगी

मेरी गंगा यात्रा भाग 93

मेरी गंगा यात्रा भाग 93
इक प्रयास गंगा बचे
गंगाजी चेतन हैं और निरन्तर बहकर जहाँ जहाँ से गुजरती हैं उस भूमि को और वहाँ के रहने वाले सभी प्रणियों को भी चेतन कर देती हैं यही विशेषता गंगा जी को विश्व की अन्य नदियों से भिन्न करती हैं आप जानते ही हैं कि  झूठे-सच्चे प्रयास तो हो ही रहे गंगा जी को बचाने के लिये,,राजनीति हो या समाज हित की सोच, पर प्रयास तो नज़र आ रहे है कुछ वर्षों से केंद्र और राज्य सरकारें भी प्रयासरत हैं राष्ट्रहित के लिये किया गया वोट मोदी जी के रूप मे सार्थक जान पड़ता हैं..? अगर इच्छा शक्ति और डण्डा मजबूत हो सब हो जाता है पर लापरवाही किसी भी सार्थक प्रयास की हत्या कर सकती हैं जो हो सकता हैं,गंगा जी को लेकर नितिन गड़गरी जी कठोर कहै जाते है देखे उमाजी के बाद ये कितने सार्थक सिद्ध होते है पर अभी मेरी भेट नही हुई बरहाल यहाँ देखें कुछ समय पहले दिल्ली में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने अपने ताजा अध्ययन में बताया कि जिन 39 स्थानों से होकर गंगा नदी गुजरती है उनमें से सिर्फ एक स्थान पर इस साल मानसून के बाद गंगा का पानी साफ था...? कुछ समझै यह ‘गंगा नदी जैविक जल गुणवत्ता आकलन (2017-18)’ की रिपोर्ट के अनुसार हैं  रिपोर्ट कहती हैं गंगा बहाव वाले 41 स्थानों में से करीब 37 पर इस वर्ष मानसून से पहले जल प्रदूषण मध्यम से गंभीर श्रेणी में रहा नाश नही सवा सत्यानाश, वही.सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए सीपीसीबी ने हाल ही में यह रिपोर्ट जारी की है.माना जाये तो अभी तक नमामि गङ्गा के नाम का पैसा, पानी मे बह गया,.. क्या यही ठोस प्रयास हैं चार वर्षों के, यही तो राजीव गांधी के समय में हुआ था क्या समय वही हालत पैदा कर रहा है..? मानसून से पहले 41 में से केवल चार स्थानों पर पानी की गुणवत्ता साफ या मामूली प्रदूषित कही जा रही हैं और मानसून के बाद 39 में से केवल एक स्थान पर नदी का पानी साफ था. इसमें मानसून के बाद केवल ‘हरिद्वार’ में ही गंगा का पानी ‘साफ’ था ये तब जब ये सरकारी रिपोर्ट हैं यदि ये काम कोई समाजसेवी संस्था करती तो परिणाम और विकट नज़र आते क्योंकि हम सभी हरिद्वार की स्थिति से अवगत हैं वहाँ गंगा मे गिरने वाले नालों की संख्या कम नही है फिर कैसे कहै की हरिद्वार मे पानी साफ है,.सीपीसीबी के द्वारा गुणात्मक विश्लेषण के लिए मानसून से पहले और मानसून के बाद पानी के नमूने लिए गए. इन्हें पांच श्रेणियों में रखा गया, साफ (ए), मामूली प्रदूषित (बी), मध्यम प्रदूषित (सी), बेहद प्रदूषित (डी) और गंभीर प्रदूषित (ई).रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 मानसून पूर्व अवधि में 34 स्थान मध्यम रूप से प्रदूषित थे, जबकि तीन स्थान गंभीर रूप से प्रदूषित थे. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उत्तर प्रदेश की दो बड़ी सहायक नदियां, पांडु नदी और वरुणा नदी गंगा में प्रदूषण बढ़ रहा है जो गंगा जी को प्रदूषित कर रही हैं मैंने पहले भी लिखा गङ्गा जी की सहायक नदियों पर काम किये बिना गंगा को बचाना असम्भव हैं वही दूसरी और मित्रो मद्रास हाईकोर्टअध्ययन में ये भी कहा गया है कि गंगा नदी की मुख्यधारा पर कोई भी स्थान गंभीर रूप से प्रदूषित नहीं था लेकिन अधिकतर जगह मध्यम रूप से प्रदूषित पाए गए. रिपोर्ट में कहा गया कि गंगा बहाव वाले 41 स्थानों में से करीब 37 पर इस वर्ष मानसून से पहले जल प्रदूषण मध्यम से गंभीर श्रेणी में रहा.इसी अध्ययन रिपोर्ट के एक अन्य अंश, जिसका शीर्षक है गंगा नदी के जैविक जल की गुणवत्ता की तुलना (2014-18), में बताया गया है कि रामगंगा और गर्रा नदी के पानी में मानसून बाद 2017-18 में भारी मात्रा में प्रदूषण था.सीपीसीबी की ये रिपोर्ट दर्शाती है कि पिछले चार सालों में गंगा नदी का पानी किसी भी जगह पर साफ नहीं हुआ है. अध्ययन के मुताबिक उत्तराखंड के जगजीतपुर और उत्तर प्रदेश के कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी में गंगा नदी का पानी साल 2014-15 के मुकाबले साल 2017-18 में और ज्यादा दूषित हो गया है.साल 2017-18 में हरिद्वारा बैराज का पानी मानसून से पहले और मानसून के बाद दोनों समय साफ था हालांकि कानपुर और वाराणसी जैसे क्षेत्रों में नदी का पानी बहुत ही ज्यादा दूषित था. मालूम हो कि वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है.सीपीसीबी ने कहा, ‘प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए ताकि सभी स्थानों पर पानी की गुणवत्ता कम से कम ‘बी’ श्रेणी का हो सके.’ ‘बी’ श्रेणी के पानी की गुणवत्ता का मतलब है कि जलीय जीवन का समर्थन करने के लिए नदी का संरक्षण किया जाना चाहिए.बता दें कि गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता का आंकलन सीपीसीबी द्वारा दो तरीके से किया जाता है. एक तरीका होता है कि पानी का बीओडी  (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) , डीओ (डिज़ॉल्व्ड ऑक्सीजन), तापमान, पीएच और कोलिफॉर्म बैक्टीरिया इत्यादि मापने के बाद पानी के गुणवत्ता की जानकारी दी जाए.वहीं दूसरा तरीका होता है पानी की जैविक निगरानी यानि की बायोलॉजिकल मॉनिटरिंग की जाए. सीबीसीबी का मानना है कि बायोलॉजिकल मॉनिटरिंग प्रदूषण के स्तर को बताने का ज्यादा बेहद तरीका है.द वायर ने सीपीसीबी द्वारा मुहैया कराए गए बीओडी और डीओ लेवल के आधार पर रिपोर्ट किया जिसमें ये बताया गया था कि पहले की तुलना में किसी भी जगह पर गंगा साफ नहीं हुई है, बल्कि साल 2013 के मुकाबले गंगा नदी कई सारी जगहों पर और ज्यादा दूषित हो गई हैं.केंद्र की मोदी सरकार द्वारा गंगा सफाई के लिए ‘नमामि गंगे’ जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना चलाई जा रही है. जिसका को महत्व नही रह जाता,बस महत्वकांक्षी परियोजनाओ के नाम बदले गंगा जी हालत नही,या मैं तो यू ही कहूँगा राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप ढोते ढोते, गंगा साफ हुई हो या न हो पैसा साफ हो गया,गंगा के नाम पर 2014 से लेकर नवंबर 2018 तक में गंगा सफाई के लिए 4800 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं पर कहा ..? सब कागज की बावड़ी, कागज मे रह गई चोर माल ले गये सरकार सोती रह गई, मॉरल इस देश का कुछ नही हो सकता

Sunday, October 13, 2019

मेरी गंगा यात्रा 92

मेरी गङ्गा यात्रा भाग 92
इक प्रयास गंगा बचे
आपको लगा होगा  काफ़ी समय के बाद गंगा यात्रा पर लेख आया है कुम्भ 2019 मे काफ़ी समय बिता दिया भले कोई लेख नही लिखा पर गंगा जी पर चिंतन और प्रयास जारी था ये मरने के बाद ही समाप्त होगा या गङ्गा प्रदूषण मुक्त होने पर ,मित्रो कभी लगता हैं जीते जी गङ्गा पर प्रदूषण मुक्त देख लेंगे कभी लगता हैं अब के भी जीवन व्यर्थ गया
बड़े जोश के साथ इलाहाबाद मे सम्पन्न हुए धर्म संसद मे भी भाग लिया तीन दिवसीय कार्य कर्म में दो दिन ही रहे हम, आप कहेंगे क्यो, मेरी निगाह में धर्म संसद सुंदर ढोल पर शोर ही शोर रहा कोई सार्थक प्रयास नही था साहब बात है बातो का क्या है, बस्ता बन्द प्रस्ताव पारित हुए और कोई सार्थक प्रयास नही था
कुछ न हुआ
बस शोर हुआ
बस शोर हुआ
कहा हैं प्रयास
धरा तो खाली हैं
बह रही प्रदूषित
युही सब नदिया
कैसी है ये जिम्मेदारी
कैसी है ये रखवाली हैं
न धर्म ध्वजा उठा
तेरे बस की बात नही
चलो छोड़ो बात गंगा जी की करे यही तो कर्म हैं कुम्भ में सुंदर प्रयास रहे पर चोरी चोरी गङ्गा मे नाले भी गिरते रहे उस दौरान वाराणसी भी जाना हुआ वहाँ गंगा की स्थिति का क्या कहना काशी के विश्व सुंदरी पुल से लेकर वरुणा संगम स्थल तक गंगा काशी में ही रहती हैं। इस लगभग पांच किलोमीटर के क्षेत्र में शहर के 20 लाख आबादी वाले क्षेत्र के लिए करीब 832 किमी लंबी सीवर लाइन बिछाई गई करीब 350 एमएलडी मलजल और औद्योगिक प्रदूषित जल बाहर निकलता है, जबकि इसके शोधन के लिए केवल तीन प्लांट हैं। मै मन्दिर बाद में गया पर इनके दर्शन पहले हुए पता चला कि यह 9.8 एमएलडी क्षमता वाला भगवानपुर, 80 एमएलडी का दीनापुर और 12 एमएलडी का डीएलडब्लू सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट कुल 102 एमएलडी सीवेज ही ट्रीट कर पा रहा है। बाकी का 248 एमएलडी सीवेज प्रतिदिन गंगा में मिलता है। जाहिर है कि काशी में प्रवेश करते समय गंगा साफ-सुथरी होती है। इसमें गिरने वाले नालों की गंदगी से गंगा में प्रदूषण दोगुना तक बढ़ जाता है।

Saturday, October 12, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग-88

मेरी गंगा यात्रा भाग-88
इक प्रयास गंगा बचे
पहले गंगा जी इंसानो से कहती थी5 प्रदूषण न करें प्रकृति संसाधनों पर दया करे पर कोई सुनता ही नही था मानो कान मे रुई लगा कर घूम रहे हो अब गंगा जी ने कानों मे रुई लगा रखी हैं गंगा जी व उनकी सभी नदियों ने रौद्र रूप मे तांडव मचा रखा है पिछले भाग मे हमने हरिद्वार से वाराणसी तक बाढ़ की चर्चा की थी आज बिहार के राज्यों मे बाढ़ की क्या स्थिति हैं उसको देखेंगे बिहार में एक बार फिर कई नदियां उफान पर हैं. पिछले साल राज्य के 17 जिलों में बाढ़ आई थी. इससे करीब 1.71 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे. 8.5 लाख लोगों के घर टूट गए थे और करीब 8 लाख एकड़ फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई थी. क्षेत्रों में लगातार बारिश और बाणसागर व वाल्मिकीनगर बराज से भारी मात्रा में पानी छोड़े जाने के कारण सूबे की नदियां उफान पर हैं। कई जिलों के दर्जनों गांवों में बाढ़ का पानी घुस गया है। बक्सर, गोपालगंज, वैशाली, आरा, पटना से लेकर कटिहार तक कई जिलों में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। बक्सर में तो एक ओर कर्मनाशा उफान पर हैं वहीं गंगा भी खतरे के निशान से महज आधा मीटर नीचे है। वहीं वाल्मिकीनगर बराज से 2 लाख क्यूसेक पानी छोड़े जाने के कारण यहां के निचले इलाकों में पानी भर गया है। बक्सर में बांध की सतह के करीब पहुंचा पानी सोमवार सुबह से जलस्तर में जारी वृद्धि देर रात से तेज हो गई। मंझरियां और उमरपुर के बीच बांध की सतह के करीब पानी पहुंच गया है। गंगा की विकराल स्थिति को देखते हुए  प्रशासन ने अलर्ट जारी कर दिया।केंद्रीय जल आयोग के कनीय अभियंता कन्हैया कुमार ने बताया कि मंगलवार सुबह तीन बजे से जलस्तर बढऩे की रफ्तार तीन सेमी प्रति घंटा है। ये सुबह 6 बजे से पुन: घटकर एक सेमी हो गई। बक्सर में अपराह्न तीन बजे 59.81 मीटर है। यहां खतरे का निशान 60.32 मीटर है। यहां बनारपुर के दर्जनों घरों में पानी समा गया था। इलाहाबाद से वाराणसी तक बढ़ा जल-स्तर बाढ़ नियंत्रण विभाग के कार्यपालक अभियंता एजाज कलीम ने बताया कि इलाहाबाद से वाराणसी तक अभी भी पानी लगातार बढ़ रहा है। इलाहाबाद में रफ्तार आज थोड़ी कम हो गई है। उधर, वाराणसी में अभी समान गति से पानी बढऩे की सूचना है। बाणसागर से छोड़े गए पानी से भोजपुर में संभावित बाढ़ की भयावह स्थिति का खतरा टल गया है। गंगा नदी में मामूली वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन आधी रात के बाद से सोन नदी के जल स्तर में लगातार गिरावट जारी है। वाल्मीकिनगर बराज से पानी छोड़े जाने का सिलसिला फिर शुरू होने से गंडक नदी  का जलस्तर तेजी से बढऩे लगा है। मंगलवार को वाल्मिकी नगर बराज से दो लाख क्यूसेक पानी छोड़े जाने से निचले इलाके के गांवों में नदी का पानी फैलने से बाढ़ का खतरा मंडराने लगा है।जलस्तर बढऩे के साथ ही गंडक नदी का कटाव भी तेज हो गया है। नदी के कटाव से विशम्भरपुर, धुपसागर आदि गांव में स्थिति बिगड़ती जा रही है। कटाव रोकने के लिए हो रहा प्रशासनिक कवायद नाकाफी साबित हो रहा है। गंगा और कोसी नदी के जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि से कुर्सेला और मनिहारी प्रखंड के कई गांव जलमग्न हो गए हैं।कुर्सेला प्रखंड के सलमारी चांय टोला, मैहर मियां टोला, पचकुट्टी, बाघमारा, पत्थर टोला मलिनिया गांव में बाढ़ से परेशानी बढ़ गई है।कई घरों के भीतर भी पानी घुस गया है। फसल को भी नुकसान पहुंचा है। स्कूलों में पठन-पाठन बाधित है। चांय टोला, पत्थर टोला में सड़क के ऊपर से पानी बह रहा है। प्रखंड मुख्यालय सहित कुर्सेला स्वास्थ्य केंद्र पहुंचना असंभव-सा हो गया है।गोबराही दियारा, घाट टोला, कैंप टोला रानी दियारा के ग्रामीण घरों में पानी प्रवेश कर जाने से नाव पर खाने पीने की सामग्री, जलावन लाद कर ऊंचे स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। बाढ़ का पानी सड़क पर बहने के कारण पत्थर टोला में सड़क पर कटाव हो रहा हैं गंगा के जलस्तर में वृद्धि से मनिहारी प्रखंड के उतरी कांटाकोश, दक्षिणी कांटाकोश के अधिकांश हिस्से में बाढ़ का पानी  प्रवेश कर गया है। धुरियाही पंचायत की हालत ज्यादा खराब है। अंचाधिकारी संजीव कुमार ने बताया कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है। आवागमन के लिए प्रशासनिक स्तर से नाव भी उपलब्ध कराए जा रहे

Thursday, February 21, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग-91

मेरी गंगा यात्रा भाग -91
इक प्रयास है गंगा बचे
गंगा जी की महिमा अपरंपार हैं गंगे वह मॉ जो हर हाल मे अपने बच्चों का हित ही चाहती हैं चाहे उसके बच्चे कितने न समझ हो जो मॉ का हर पल अपमान ही करते हैं फिर भी गंगे सब का हित ही करती थी करती है औऱ भविष्य मे करती रहेगी सब रोग पाप को हर ने वाली गंगे पतित पावनी हैं मित्रों पिछले वर्ष से ही प्रयागराज इलाहाबाद में कुंभ की तैयारियां जोरों पर हैं। यहाँ करोड़ों लोगों का स्नान करना दुनिया के लिए अचंभे से कम नहीं,वह भी बिना किसी निमन्त्रण पत्र के, लेकिन गंगा और कुंभ ने हमेसा ही वैज्ञानिकों को भी अचंभित किया है बीते कुंभ 2013 में किए गए शोध से इस बात की पुष्टि हो गई हैं कि गंगा में कुंभ के दौरान स्नान से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। है न आश्चर्य की बात,देश विदेश के चिंतकों का यह माना जाता है कि कुंभ के दौरान संक्रामक बीमारियों का अंदेशा रहता है। वर्ष 2013 में देश की विभिन्न संस्थाओं के करीब 31 वैज्ञानिक एकजुट हुए। वैज्ञानिकों ने पुष्टि की कि कुंभ में कल्पवास से जिस अमरत्व की प्राप्ति की बात कही जाती है, वह दरअसल निरोगी जीवन है। वाराणसी के प्रो. एसएन त्रिपाठी मेमोरियल फाउंडेशन के महासचिव डॉ. वाचस्पति त्रिपाठी बताते हैं कि कुंभ में करोड़ों लोग गंगा में डुबकी लगाते हैं और जिससे संक्रमण की आशंका बहुत बढ़ जानी चाहिए, पर देखा गया है कि यहां स्नान व कल्पवास करने वालों को किसी तरह का संक्रमण नहीं होता।स्नान कर कोई व्यक्ति बीमार नही हुआ इसकी वैज्ञानिकता परखने के लिए 2013 के कुंभ के दौरान गंगा, यमुना व संगम से जल के लगभग 760 नमूने एकत्र किए गए। एक हजार कल्पवासियों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया, जिसमें रक्त, रोग प्रतिरोधक क्षमता, किडनी व लीवर की जांच हुई। शोध में पाया गया कि कल्पवासियों को संक्रमण होना तो दूर बल्कि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी हुई थी। वे पहले की अपेक्षा ज्यादा स्वस्थ पाए गए। उनका किडनी फंक्शन, लीवर फंक्शन सामान्य रहा।
सीएसआइआर-एनबीआरआइ के डॉ. संजय द्विवेदी व डॉ. आरडी त्रिपाठी बताते हैं कि कुंभ 2013 में मौनी अमावस्या के दिन तीन करोड़ लोगों ने गंगा में डुबकी लगाई थी। इस दिन संगम से जल के नमूने एकत्र किए गए थे, उनमें कई तरह के बैक्टीरियो फास्फेज मौजूद हैं। बैक्टीरियो फास्फेज टाइफाइड, कालरा व ई-कोलाई के संक्रमण के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया को मार देते हैं। इन्हीं बैक्टीरियो फास्फेज की ही वजह से गंगा का पानी खराब नहीं होता। जैसे ही बैक्टीरिया का स्तर दो लॉग से ऊपर जाता है बैक्टीरियो फास्फेज काम शुरू कर देते हैं।
शोध में शामिल संस्थाएं
राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआइ), बीएचयू चिकित्सा विज्ञान संस्थान, मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज इलाहाबाद, सामाजिक वानिकी संस्थान इलाहाबाद, प्रो. एसएन त्रिपाठी मेमोरियल फाउंडेशन वाराणसी, सूर्या फार्मास्यूटिकल्स एवं शंकर विमान गंडपम् आदि। शोध एनबीआरआइ के तत्कालीन निदेशक डॉ. सीएस नौटियाल व वर्तमान निदेशक डॉ. एसके बारिक के निर्देशन में किया गया है। शोध एक प्रतिष्ठित जर्नल द्वारा स्वीकारा गया है।