Thursday, February 21, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग-91

मेरी गंगा यात्रा भाग -91
इक प्रयास है गंगा बचे
गंगा जी की महिमा अपरंपार हैं गंगे वह मॉ जो हर हाल मे अपने बच्चों का हित ही चाहती हैं चाहे उसके बच्चे कितने न समझ हो जो मॉ का हर पल अपमान ही करते हैं फिर भी गंगे सब का हित ही करती थी करती है औऱ भविष्य मे करती रहेगी सब रोग पाप को हर ने वाली गंगे पतित पावनी हैं मित्रों पिछले वर्ष से ही प्रयागराज इलाहाबाद में कुंभ की तैयारियां जोरों पर हैं। यहाँ करोड़ों लोगों का स्नान करना दुनिया के लिए अचंभे से कम नहीं,वह भी बिना किसी निमन्त्रण पत्र के, लेकिन गंगा और कुंभ ने हमेसा ही वैज्ञानिकों को भी अचंभित किया है बीते कुंभ 2013 में किए गए शोध से इस बात की पुष्टि हो गई हैं कि गंगा में कुंभ के दौरान स्नान से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। है न आश्चर्य की बात,देश विदेश के चिंतकों का यह माना जाता है कि कुंभ के दौरान संक्रामक बीमारियों का अंदेशा रहता है। वर्ष 2013 में देश की विभिन्न संस्थाओं के करीब 31 वैज्ञानिक एकजुट हुए। वैज्ञानिकों ने पुष्टि की कि कुंभ में कल्पवास से जिस अमरत्व की प्राप्ति की बात कही जाती है, वह दरअसल निरोगी जीवन है। वाराणसी के प्रो. एसएन त्रिपाठी मेमोरियल फाउंडेशन के महासचिव डॉ. वाचस्पति त्रिपाठी बताते हैं कि कुंभ में करोड़ों लोग गंगा में डुबकी लगाते हैं और जिससे संक्रमण की आशंका बहुत बढ़ जानी चाहिए, पर देखा गया है कि यहां स्नान व कल्पवास करने वालों को किसी तरह का संक्रमण नहीं होता।स्नान कर कोई व्यक्ति बीमार नही हुआ इसकी वैज्ञानिकता परखने के लिए 2013 के कुंभ के दौरान गंगा, यमुना व संगम से जल के लगभग 760 नमूने एकत्र किए गए। एक हजार कल्पवासियों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया, जिसमें रक्त, रोग प्रतिरोधक क्षमता, किडनी व लीवर की जांच हुई। शोध में पाया गया कि कल्पवासियों को संक्रमण होना तो दूर बल्कि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी हुई थी। वे पहले की अपेक्षा ज्यादा स्वस्थ पाए गए। उनका किडनी फंक्शन, लीवर फंक्शन सामान्य रहा।
सीएसआइआर-एनबीआरआइ के डॉ. संजय द्विवेदी व डॉ. आरडी त्रिपाठी बताते हैं कि कुंभ 2013 में मौनी अमावस्या के दिन तीन करोड़ लोगों ने गंगा में डुबकी लगाई थी। इस दिन संगम से जल के नमूने एकत्र किए गए थे, उनमें कई तरह के बैक्टीरियो फास्फेज मौजूद हैं। बैक्टीरियो फास्फेज टाइफाइड, कालरा व ई-कोलाई के संक्रमण के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया को मार देते हैं। इन्हीं बैक्टीरियो फास्फेज की ही वजह से गंगा का पानी खराब नहीं होता। जैसे ही बैक्टीरिया का स्तर दो लॉग से ऊपर जाता है बैक्टीरियो फास्फेज काम शुरू कर देते हैं।
शोध में शामिल संस्थाएं
राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआइ), बीएचयू चिकित्सा विज्ञान संस्थान, मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज इलाहाबाद, सामाजिक वानिकी संस्थान इलाहाबाद, प्रो. एसएन त्रिपाठी मेमोरियल फाउंडेशन वाराणसी, सूर्या फार्मास्यूटिकल्स एवं शंकर विमान गंडपम् आदि। शोध एनबीआरआइ के तत्कालीन निदेशक डॉ. सीएस नौटियाल व वर्तमान निदेशक डॉ. एसके बारिक के निर्देशन में किया गया है। शोध एक प्रतिष्ठित जर्नल द्वारा स्वीकारा गया है।