Wednesday, November 20, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग 100

मेरी गंगा यात्रा भाग 100
इक प्रयास गंगा बचे
आज मेरी यात्रा अपने 100 कदम पर है पर अफसोस कि गंगा प्रदूषित ही रही, 100 वर्षो से मैला ढोती गंगा बत से बतर हो गई ओर हमने भी 50 वे वर्ष की ओर कदम बढ़ा दिया आज से 30 वर्ष पूर्व आरम्भ प्रयास जारी है ताजा स्थिति मोदी काल मे यह हैं कि आज भी नालों के जरिये गंगा जल में घुल गए मानव मल में ई. कॉलि जैसा फीकल कॉलिफॉर्म बैक्टीरिया पाया जाता है। इसका उच्चस्तर पानी में बीमारी पैदा करने वाले रोगाणु की मौजूदगी को बढ़ाता है। FC की अनुमति प्राप्त सीमा प्रति 100 मिलीलीटर पानी में 2500 एमपीएन है। इसका अपेक्षित स्तर प्रति 100 मिलीलीटर में 500 एमपीएन है। सबसे ज्यादा एफसी पश्चिम बंगाल के बहरामपुर में खाग्रा में पाया गया है। यहां प्रति मिलीलीटर 30,000 एमपीएन मिला है जो अनुमति प्राप्त स्तर से 12 गुना और अपेक्षित स्तर से 60 गुना ज्यादा है। तब जब आज गंगा पर विशेष ध्यान दिया जा है मोदी जी आने के बाद एक मंत्री का तबादला कर नया भार गड़गड़ी जी दिया गया पर प्रयास राजनीति से प्रेरित ही नजर आये सरकार ने गंगा को लेकर शोर मचाया तो मीडिया भी चिंतित दिखा यू लगा समाज मे परिवर्तन आ गया पर ,..? सब शेर कुछ दिन दहाड़े फिर सो गये आज न सरकार न समाज न मीडिया मे कोई चर्चा है न हलचल,..
क्या गंगा पर कार्यक्रम बना कर गंगा प्रदूषण मुक्त होगी सदियों से सबसे पवित्र मानी जाने वाली गंगा नदी का जल नालों से आने वाली गंदगी की वजह से और प्रदूषित हो गया है।  ,उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड से गुजरने वाली नौ अंतर-राज्यीय सीमाओं पर पानी की गुणवत्ता के आंकड़ा बताते गंगा प्रदूषण मुक्त नही प्रदूषण युक्त हुई । गंगा की स्वच्छता को धन उगाही या व्यावसायिक व औद्योगिक धंधे के भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता है।यह बेहद दुखद है कि देश की नदियों के 351 हिस्से प्रदूषित हैं।

Monday, November 18, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग 99

मेरी गंगा यात्रा भाग 99
एक प्रयास गंगा बचे
गंगा के अपार प्रदूषण, उसके व्यवसायीकरण और सफाई के एक के बाद एक सरकारी तथा गैर सके
सरकारी अभियानों के बीच केंद्र सरकार ने 2018 मे दावा था कि मार्च 2019 तक गंगा 80 फीसदी तक साफ हो जाएगी. पर ऐसा हुआ नही आज भी जब 2019 भी समाप्ति की ओर है गंगाजी की गंदगी को देखकर ये लक्ष्य उम्मीद से अधिक संदेह पैदा लगता हैं, लगता हैं कि गंगा जी 2024 तक भी प्रदूषण मुक्त नही हो सकती
वही केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी का कहना था गंगा 70-80 प्रतिशत साफ हो जाएगी. उनके मुताबिक ये कहना गलत है कि नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत कुछ खास काम नहीं हुआ क्योंकि चार साल में अभियान के नतीजे दिखने लगे हैं. पर मुझे लगता हैं नतीजे कागज़ो में दिख रहे है धरातल पर तो कुछ बदलाव नही आता,राष्ट्रीय गंगा सफाई मिशन (एनएमसीजी) के तहत करीब 21 हजार करोड़ रुपए की कुल 195 परियोजनाएं संबद्ध राज्यों में चलाई जा रही हैं. सरकार का दावा है कि सफाई के वृहद अभियान का ही नतीजा है कि गंगा के जलस्तर में उसकी सेहत का अंदाजा लगाने वाले तीन पैमानों पर सुधार हुआ है- बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी), डिसॉल्व्ड ऑक्सीजन (डीओ) और कोलिफोर्म. 2016 के मुकाबले 2017 में गंगा प्रवाह के 80 स्थानों पर जलस्तर में सुधार पाया गया. 33 जगहों पर डीओ स्तर बेहतर हुआ है तो 26 जगहों पर बीओडी लेवल सुधरा है. तीस जगहों पर कोलीफोर्म बैक्टीरिया काउंट में गिरावट आई है. लेकिन 2500 किलोमीटर लंबी नदी के लिए ये आंकड़ा पर्याप्त नहीं है.पर आज क्या सही स्थिति हैं वह अवगत नही हैं  कृपया मंत्री मेरी गंगा यात्रा का पिछले भाग को पढ़ तो सच से अवगत हो जायेंगे

मेरी गंगा यात्रा भाग 98

मेरी गंगा यात्रा भाग 98
इक प्रयास गंगा बचे
"यू तो कुछ नया नही गंगा की चर्चा के सिवा, 
बस पगला गया हूं मैं भी मजनूं की तरह,..
आप भी कहते होंगे कुछ और लेख या चर्चा करो पर, मित्रों यहाँ तो केवल गंगा और प्रदूषण की चर्चा ही होगी यह तो जीवन ही गंगा जी को समर्पित हो ,सच गर ऐसा हो फिर कोई ग़म नही, युगों से निर्मल बहती गंगा आज प्रतिकार कर रही हैं मिटती गंगा का आवाहन हैं कि मेरा मिटता अस्तित्व संस्कृति के एक सुंदर अध्याय का अंत होगा सौ वर्षों से लगातार बढ़ते प्रदूषण के कारण कई विषाक्त तत्वों का जहर गंगा नदी में लगातार घुल गया है। सौ वर्षों मे गंगा और नदियां नाला और मैला ढोने का जरिया रह गई हैं वही बीएचयू के वैज्ञानिकों ने अब एक अध्ययन में पाया है कि नदी के तलछट में मौजूद सूक्ष्मजीवों की एंजाइम क्रियाएं गंगा में भारी धातुओं के प्रदूषण का पता लगाने में मददगार हो सकती हैं।अगर ऐसा है तो यह अच्छी खबर हो सकती हैं वह कहते है कुल कार्बनिक कार्बन, नाइट्रेट, अमोनियम, फास्फेट जैसे पोषक तत्वों, कैडमियम, लेड, निकेल, क्रोमियम, जिंक एवं कॉपर जैसी भारी धातुओं और प्रोटिएज, फॉस्फेटेज, एफएडीएज, ग्लूकोसाइडेज जैसे सूक्ष्मजीव एंजाइमों के बीच अन्तरक्रियाओं की पड़ताल करने के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं।अध्ययनकर्ताओं के अनुसार पोषक तत्वों, भारी धातुओं और कुल कार्बनिक कार्बन की मात्राओं में विविधता का मुख्य कारण मानवजनित गतिविधियां हैं। नदी तलछटों में पोषक तत्वों और कार्बन के बढ़ने से जैविक एंजाइम गतिविधियां बढ़ जाती हैं। हांलाकि, कुछ ऐसे भी स्थल पाए गए हैं, जहां पोषक तत्व ज्यादा होने के बावजूद वहां एंजाइम क्रियाएं कम थीं। इसके लिए वहां भारी धातुओं की अत्यधिक मात्रा को जिम्मेदार माना जा रहा है, जो इन जैविक क्रियाओं को सीमित कर देती हैं। भारी धातुएं यहां पोषक तत्वों की जैव उपलब्धता को भी कम कर देती हैं। नदी तलछटों में सूक्ष्मजीव एंजाइम क्रियाओं पर भारी धातुओं के जैविक प्रभावों को समझना एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक चुनौती है। जलीय पारिस्थितिकी प्रणालियों में नदी तलछटों में सूक्ष्म जैविक समुदाय ऊर्जा के प्रवाह, पोषक चक्रों और कार्बनिक पदार्थों के विघटन को विनियमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः नदी के तलछटों में संचयित पदार्थों के साथ सूक्ष्मजीव क्रियाओं को जोड़ना क्षेत्रीय मानवजनित प्रदूषण के कारणों को समझने का एक संवेदनशील सूचक हो सकता है।

Saturday, November 2, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग 97

मेरी गंगा यात्रा भाग 97
एक प्रयास गंगा बचे
आज देश एक विकट परिस्थितियों से गुजर रहा है जिनका इतिहास वैदिक युग से भी पुराना हैं जिनके रीतिरिवाज लाखो वर्ष पुराने हैं जो हर खुशी को उत्सव त्यौहार की तरह मनाते हैं जो धरती,पेड़,नदियों सब मे दैव रूप देखते हो,आज वह अपने घर मे ही बंधक लगते है अपने रीतिरिवाज मनाने की मानो स्वतन्त्रता नही है विसर्जन रिवाज़ो का हिस्सा हैं क्या विसर्जन से ही नदियाँ प्रदूषित होती हैं..?कल को सरकारें स्नान पर भी प्रतिबंध लगा दे तो ,…?करोड़ों लोगों के स्नान से गंगा मैली हो रही हैं त्योहारी सीजन में यदि आपने गंगा या उससे जुड़ी किसी सहायक नदी में मूर्ति विसर्जन करने की योजना बनाई है तो इसका परिणाम 50 हजार रुपये का जुर्माना चुकाकर भुगतना पड़ सकता है। राष्ट्रीय क्लीन गंगा मिशन (एनएमसीजी) के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा ने ये दिशा-निर्देश 16 सितंबर 19 को जारी किए थे। इनमें कहा गया है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों में किसी भी तरह के मूर्ति विसर्जन की अनुमति नहीं दी जाएगी  हा यह आदेश केवल जनता पर ही लागू है सरकारी संस्था का कचरा नाले जा सकते है उसकी अनुमति हैं उसके लिये कोई कठोर कार्यवाही और जुर्माना नही है केंद्र सरकार ने गंगा और उसकी सहायक नदियों में प्रदूषण में बढ़ोतरी पर रोक लगाने के लिए राज्यों को 15 बिंदु वाला दिशा-निर्देश जारी किया है, जिसमें मूर्ति विसर्जन करने पर 50 हजार रुपये का जुर्माना वसूलने का आदेश दिया गया है। 
भई कोई ऐसा कानून भी लाओ की सरकारी तंत्र पर भी कार्यवाही हो, नियमों का अनुलंघ्न करने वालो पर शिकंजा कसै,

मेरी गंगा यात्रा भाग 96

मेरी गंगा यात्रा भाग 96
इक प्रयास गंगा बचे
अगर आप सोचते हैं कि बड़े शहरों की बजाय गंगा किनारे मैदानों में रहने वाले लोग वायु प्रदूषण से मुक्त हैं और लंबा जीवन जीते हैं। तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। गुरुवार को शिकागो यूनिवर्सिटी की शोध संस्था की तरफ से जारी रिपोर्ट ने हैरान करने वाला खुलासा किया है। यह रिपोर्ट ‘वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक’ (एक्यूएलआई) नाम से जारी की गई है। इसमें कहा गया है कि उत्तरी भारत, खासतौर पर गंगा के मैदानी इलाकों में बसे 48 करोड़ से अधिक लोगों का जीवनकाल वायु प्रदूषण के चलते सात वर्ष कम हो रहा है।वर्ष 1998 में लोगों के जीवन पर वायु प्रदूषण का प्रभाव आज के मुकाबले आधा होता, अगर वहां प्रदूषण की सघनता विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों के सापेक्ष रहती। उस स्थिति में गंगा के आसपास बसे लोगों का जीवन काल आज के मुकाबले आधा यानी 3.7 वर्ष की कमी हुई होती। लेकिन वायु प्रदूषण में 72 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी ने यहां के लोगों का जीवनकाल 7.1 वर्ष कम कर दिया है।
3.7 वर्ष की कम हुई लोगों की उम्र!
शिकागो विश्वविद्यालय, अमेरिका की शोध संस्था ‘एपिक’ का ‘वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक’ का नया विश्लेषण बताता है कि भारत के उत्तरी क्षेत्र यानी गंगा के मैदानी इलाकों में रह रहे लोगों की ‘जीवन प्रत्याशा’ करीब सात वर्ष कम होती जा रही है। इन जगहों के वायुमंडल में ‘प्रदूषित सूक्ष्म तत्वों और धूलकणों से होने वाला वायु प्रदूषण’ यानी पार्टिकुलेट पॉल्यूशन विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय दिशानिर्देशों को हासिल करने में विफल रहा है। शोध अध्ययनों के अनुसार इसकी वजह है कि वर्ष 1998 से 2016 में गंगा के मैदानी इलाकों में वायु प्रदूषण 72 प्रतिशत तक बढ़ गया है। यहां भारत की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है।