Saturday, November 2, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग 96

मेरी गंगा यात्रा भाग 96
इक प्रयास गंगा बचे
अगर आप सोचते हैं कि बड़े शहरों की बजाय गंगा किनारे मैदानों में रहने वाले लोग वायु प्रदूषण से मुक्त हैं और लंबा जीवन जीते हैं। तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। गुरुवार को शिकागो यूनिवर्सिटी की शोध संस्था की तरफ से जारी रिपोर्ट ने हैरान करने वाला खुलासा किया है। यह रिपोर्ट ‘वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक’ (एक्यूएलआई) नाम से जारी की गई है। इसमें कहा गया है कि उत्तरी भारत, खासतौर पर गंगा के मैदानी इलाकों में बसे 48 करोड़ से अधिक लोगों का जीवनकाल वायु प्रदूषण के चलते सात वर्ष कम हो रहा है।वर्ष 1998 में लोगों के जीवन पर वायु प्रदूषण का प्रभाव आज के मुकाबले आधा होता, अगर वहां प्रदूषण की सघनता विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों के सापेक्ष रहती। उस स्थिति में गंगा के आसपास बसे लोगों का जीवन काल आज के मुकाबले आधा यानी 3.7 वर्ष की कमी हुई होती। लेकिन वायु प्रदूषण में 72 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी ने यहां के लोगों का जीवनकाल 7.1 वर्ष कम कर दिया है।
3.7 वर्ष की कम हुई लोगों की उम्र!
शिकागो विश्वविद्यालय, अमेरिका की शोध संस्था ‘एपिक’ का ‘वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक’ का नया विश्लेषण बताता है कि भारत के उत्तरी क्षेत्र यानी गंगा के मैदानी इलाकों में रह रहे लोगों की ‘जीवन प्रत्याशा’ करीब सात वर्ष कम होती जा रही है। इन जगहों के वायुमंडल में ‘प्रदूषित सूक्ष्म तत्वों और धूलकणों से होने वाला वायु प्रदूषण’ यानी पार्टिकुलेट पॉल्यूशन विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय दिशानिर्देशों को हासिल करने में विफल रहा है। शोध अध्ययनों के अनुसार इसकी वजह है कि वर्ष 1998 से 2016 में गंगा के मैदानी इलाकों में वायु प्रदूषण 72 प्रतिशत तक बढ़ गया है। यहां भारत की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है।

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