Monday, October 19, 2020

मेरी गंगा यात्रा भाग 115

मेरी गंगा यात्रा भाग 115
एक प्रयास गंगा बचे 
#गंगाआंदोलन #anhadyog मित्रो आपको मालूम ही होगा कि इस वर्ष 2020 कोरोना संक्रमण के चलते चारधाम यात्रा और सावनमास में होने वाली कांवड़ यात्रा नहीं हुई थी।जिसके चलते 2 करोड़ से अधिक श्रद्धालु हरिद्वार और अन्य गंगा स्थानों पर पूछते थे  जो मन मारकर घर ही रहे,वही चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु भी नही आये जो गंतव्य पर पहुँचने से पहले यहाँ स्नान करते थे पता नही किसने ये कुकर्म आरम्भ किया होगा, तो यह लोग अपने पुराने कपड़ों को गंगा में बहा देते हैं। इसी तरह शिव भक्त भी कांवड़ यात्रा शुरू करने पर पुराने कपड़ों को गंगा में बहाते हैं। इतना ही नहीं बड़ी संख्या में ऐसे शिवभक्त भी आते थे जो अपनी पुरानी कांवड़ लाते थे। इसको भी गंगा में प्रवाहित किया जाता था। तो सोच कर देखो कितनी बड़ी संख्या में यह कचरा गंगा को प्रदूषित करता होगा,इस साल दोनों यात्रा नहीं होने पर गंगा घाटों पर यह गंदगी नहीं दिखाई दी,
गंगा के घाट और गंगा की धारा निर्मल बहती रही , परन्तु कितने दिन यह चमत्कार नज़र आयेगा,क्योकि प्रकृति तो अपना काम कर रही हैं नही कर रहे तो हम,हम जानते है शीध्र ही वही स्थिति हो जाएगी क्योकि हम मान जाये हो ही नही सकता, बहुत जल्दी कचरे के ढ़ेर गंगा घाटों पर होंगे क्योंकि हमने गंगा को आस्था से अधिक पर्यटन का केंद्र मान लिया है, गंगा तटों पर ऐ.सी रूम की चाह ने गंगा के किनारों को खा लिया है भारतीय कानून के अंतर्गत 200 मीटर तक किसी भी नदी का अतिक्रमण निषेध हैं पर क्या सरकार यह जानती हैं क्या गंगा अवैध कब्जों से मुक्त है..? अवैध कब्जे आस्था और धर्म की देन हैं धर्म की आड़ मे व्यपार,साधुओ के राजा महाराजा से महल,ये त्याग है या वासना मैं आप पर छोड़ता हू गंगा को प्रदूषित करने मे इनके आश्रमो का भी हाथ है जब तक गंगा स्वतन्त्र नही बहती गंगा प्रदूषण मुक्त नही होगी

Sunday, October 18, 2020

मेरी गंगा यात्रा भाग 114

मेरी गंगा यात्रा भाग 114
इक प्रयास गंगा बचे
#गंगाआंदोलन हमारी शोध और गंगा यात्रा का  किसी सरकार या व्यक्ति विशेष से विरोध नही है हमारा काम सरकार को सत्य बताना और सही मार्ग दर्शन करना है कांग्रेस हो या भाजपा की केंद्र सरकार हम निष्पक्ष अपनी राय देते आ रहे और भविष्य मे जब तक गङ्गा प्रदूषण मुक्त या हम देहमुक्त न हो जाये प्रयास जारी रहेगा ,जिसने गंगा के प्रति सहानुभूति रखी या प्रयास किये या कोशिश भी की उन्हें सरहाया भी गया वर्तमान मे राजीव गांधी,मनमोहन सिंह,नरेंद्रमोदी जी ,उमा भारती,नितिन गडकरी  आदि के प्रयास को उत्तम कहा गया परन्तु कुछ संगठन और व्यक्ति भी हैं जो केवल मोदी जी प्रति घृणा ही रखते है मैं ऐसे जो लोगो का विरोध करता हु क्योंकि किसी भी विषय को लेकर निजी दुश्मनी न निकाले,आज ऐसे ही एक लेख को देखा हमारी शोध को लेकर उसे मोदी विरोधी रूप मे प्रयोग किया हँसी आती हैं उन पर,हमने पिछले भाग मे कहा गंगा जल से कोरोना वायरस संक्रमण का इलाज किया जा सकता है वही किसी संगठन ने इसका का खण्डन कर दिया उनकी शोध का आधार क्या है हरि ही जाने,पर हम मानते है  पिछले दशकों से गंगा जल जिसमें, एक शोध के मुताबिक, मान्य स्तर से अधिक बैक्टीरिया और दूसरे पैथोजेन होते हैं वही गंगा जल जिसके बारे में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कह चुका है कि वह पीने के लायक भी नहीं है वही गंगा जल जो बुरी तरह प्रदूषित है इडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी ने कहा है कि गंगा में इस तरह के बैक्टीरिया की बहुत बड़ी तादाद है, जो असामान्य है। इसने यह भी कहा है कि गंगोत्री से 100 किलोमीटर बाद ही गंगा में इस तरह के बैक्टीरिया पाए जाने लगे 
एंटी बायोटिक बैक्टीरिया मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है। तक ऐसे बैक्टीरिया से पूरी दुनिया में सालाना लगभग 7 लाख लोगों की मौत का कारण बन चुके हैं
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के एक शोध के अनुसार, वाराणसी शहर के अस्सी, भदायिणी, हरिश्चंद्र, राजेंद्र प्रसाद और राजघाट घाटों से लिए गए नमूनों में बड़ी मात्रा में जो बैक्टीरिया पाए गए, उनके जीन में बीटा लैक्टम, एंडेलफेमाइसिन जैसे एंटीबायोटिक रोधी गुण पाए गए। यह बेहद ख़तरनाक स्थिति है। 
तो यह निश्चित है कि प्रदूषण ने चलते मनुष्य ने गंगा को मैला किया हैं गंगाजल शुद्ध हो तो अमृत हैं

Friday, October 16, 2020

मेरी गङ्गा यात्रा भाग 113

मेरी गंगा यात्रा भाग 113
इक प्रयास गंगा बचे
#गंगाआंदोलन इतिहास की खोज करते बहुत से लेख मिले जो हैरान करते हैं, परन्तु आम लोगो को इसकी कोई जानकारी नही है और हो भी कैसे आजादी के बाद सरकार ने कभी सत्य प्रकाश मे आये कोशिश ही नही की,स्कूलों बहुत कुछ ऐसा है जो मिथक हैं परंतु वो कहानी हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गया, क्या किया जा सकता हैं जिसकी लाठी उसकी भैस उसका दूध,इतिहास कहता है कि अकबर गंगाजल ही पीता था या अंग्रेज समुद्र यात्रा में गंगा जल ले जाते थे ताकि महीनों पीने का पानी खराब न हो वगैरहा – वगैरह. पर कही यह अपने स्कूलों मे पढा..? ऐसा ही बहुत कुछ है जो गंगाजल की महिमा का बखान करता हैं परंतु कहि गंगा नदी न होकर कुछ और हो जाये आस्था कहि राजनीतिक और व्यवसाय से पर भारी न पड़े इतिहास से छेड़छाड़ होती रही,और गंगाजल जो कृषि और पूर्व के लोगो के लिये वरदान था उसे मिटाने का मुहिम गुप्त रूप से चल गया,गंगा के अस्तित्व को खतरे मे डालने के लिये गंगा किनारे बसै शहरों मे चमड़ा, रँगाई, रासायनिक उद्योगों को बढ़ावा दिया गया,जिसका परिणाम 100 वर्षो बाद दिखने लगा ,मैकाले की शिक्षापद्धति हो या आजादी के बाद नेहरू जी विकासनीति हिन्दू धर्म का नाश ही करने के लिये थी,परिणाम आपके सामने है वोट की राजनीति के चलते हमारी संस्कृति का ह्रास होता रहा गङ्गा मैली, गौ पेट मे, गीता केवल कसम खाने को,गायत्री,..?आपके सामने हैं परन्तु वो आस्था को नही मिटा पाये पिछले 100 वर्षों मे गंगाजल के वैज्ञानिक पहलुओं पर चर्चा कम ही हुई है. कोरोना के साए में इसके वैज्ञानिक पक्ष को समझने की कोशिश करते हैं. शोध में पाया गया है कि गंगा जल में करीब 20-25 वायरस ऐसे हैं, जिनका इस्तेमाल ट्यूबरोक्लोसिस (टीबी), टॉयफॉयड, न्यूमोनिया, हैजा-डायरिया, पेचिश, मेनिन्जाइटिस जैसे अन्य कई रोगों के इलाज के लिए किया जा सकता है.
गंगाजल पर किए अपने प्रयोगों में पाया कि यहां के पानी में डायरिया, खूनी पेचिश और टायफायड पैदा करने वाले बैक्टेरिया तेजी से पैदा हो रहे हैं. लेकिन ये संकेत वहीं मिल रहे हैं जहां नदी सर्वाधिक प्रदूषित है और ठहरी हुई है.
जो गंगा जल सुखकर्ता रोगहर्ता था अब रोग कर्ता होने वाला हो सकता है भविष्य क्या होगा आपके हाथ मे ही हैं

Tuesday, October 13, 2020

मेरी गंगा यात्रा भाग 112

मेरी गंगा यात्रा भाग 112
इक प्रयास गंगा बचे
भाग न 111 मे आपने पढ़ा कि 2013, से प्रदूषण के आंकड़े क्या हैं  और स्थिति मे सुधार की जगह स्थिति बिगड़ी ही है जो कि तब है जब कि मोदी जी की नमामि गङ्गा परियोजना चल रही हैं आपको बताया कि अब तक कितना खर्च हुआ चलो अब आगे की रिपोर्ट देखते हैं और बीच बीच अपनी राय भी देते है बात करते है बी डीओ की, बीओडी ऑक्सीजन की वह मात्रा है जो पानी में रहने वाले जीवों को तमाम गैर-जरूरी ऑर्गेनिक पदार्थों को नष्ट करने के लिए चाहिए. बीओडी जितनी ज्यादा होगी पानी का ऑक्सीजन उतनी तेजी से खत्म होगा और बाकी जीवों पर उतना ही बुरा असर पड़ेगा.डीओ (डिज़ॉल्व्ड ऑक्सीजन) का मतलब है कि पानी में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा.आप जानते ही हैं आपने स्कुल टाइम मे जीवविज्ञान पढ़ा होगा कि जल मे रहने वाले जीव जल से ही पर्याप्त मात्रा मे आक्सीजन लेते है परन्तु ऐसी अवस्था मे क्या होगा जब जल ही दूषित होगा ऎसा मे जल से आक्सीजन की मात्रा का कम होना जीवो मरने के लिये मजबूर कर देगा  पानी में मिलने वाले प्रदूषण को दूर करने के लिए छोटे जीव-जंतुओं को ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है. अगर डीओ की मात्रा ज़्यादा है तो इसका मतलब है कि पानी में प्रदूषण कम है. बीडीओ हैं तो हानि कारक है क्योंकि जब प्रदूषण बढ़ता है तो इसे ख़त्म करने के लिए पानी वाले ऑर्गनिज़्म को ज़्यादा ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है, इससे डीओ की मात्रा घट जाती है.केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) साल 1980 से भारत की सम्पूर्ण नदियों के जल की गुणवत्ता की जांच करता आ रहा है गौरतलब हैं इस समय ये संगठन 2,525 किलोमीटर लंबी गंगा नदी की 80 जगहों पर जांच करता है. इससे पहले सीपीसीबी 62 जगहों पर गंगा के पानी की जांच करता था.परन्तु जो पर्याप्त नही था फिर इसे बढ़ा कर 80 कर दिया गया अब सीपीसीबी भी क्या कर सकता हैं जब समाज जागरूक होना ही नही चाहता,सभी दायत्व सरकार का जो हैं,.?साल 2017 की सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक 80 में से 36 जगहों पर गंगा नदी का बीओडी लेवल 3 मिलीग्राम/लीटर से ज़्यादा था और 30 जगहों पर बीओडी लेवल 2 से 3 मिलीग्राम/लीटर के बीच में था. वहीं साल 2013 में 31 जगहों पर गंगा का बीओडी लेवल 3 से ज़्यादा था और 24 जगहों पर 2 से 3 मिलीग्राम/लीटर के बीच में था.
आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, गंगोत्री, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग और ऋषिकेश के ऊपर ही  गंगा का पानी शुद्ध है. यहां पर बीओडी लेवल 1 मिलीग्राम/लीटर है और डीओ लेवल 9 से 10 मिलीग्राम/लीटर के बीच में है जो अच्छी ख़बर हो सकती हैं. हालांकि जैसे-जैसे गंगा आगे का रास्ता तय करती हैं,गंगाजी नरकीय सफर आरम्भ हो जाता हैं मित्रो जैसे जैसे पानी में प्रदूषण की मात्रा बढ़ती जाती है.उत्तराखंड के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हरिद्वार में गंगा की हालत बहुत ज़्यादा ख़राब हो जाती हैं.आगे कुम्भ आने वाला ऐसे में स्थिति चिंता जनक हो सकती हैं यहां हरिद्वार के पानी का अधिकतम बीओडी लेवल 6.6 मिलीग्राम/लीटर है, जो कि नहाने के लिए भी सही नहीं है. इसी तरह के हालात बनारस, इलाहाबाद, कन्नौज, कानपुर, पटना, राजमहल, दक्षिणेश्वर, हावड़ा, पटना के दरभंगा घाट इत्यादी जगहों के हैं.कई सारे जगहों पर साल 2013 के मुकाबले गंगा और ज़्यादा दूषित हुई है.तो सोचने पर हम मजबूर है क्या गंगा प्रदूषण को लेकर हम सही बढ़ रहे है,..? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जहां 2013 में गंगा नदी का अधिकतम बीओडी लेवल 5.1 पर था, वहीं साल 2017 में ये बढ़कर 6.1 मिलीग्राम/लीटर पर पहुंच गया है.तो सोचो प्रधानमंत्री की नाक के नीचे यह स्थिति है तो बाकी क्या बचा,बाकी नमामि गंगे पर विपक्ष उंगली उठायें तो गलत होगा..?
इसी तरह साल 2013 में इलाहाबाद का बीओडी लेवल 4.4 था और अब ये बढ़कर 5.7 मिलीग्राम/लीटर पर पहुंच गया है.
साल 2013 में हरिद्वार का बीओडी लेवल 7.8 था और 2017 में यह 6.6 मिलीग्राम/लीटर पर पहुंच गया. इसके अलावा उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ और बुलंदशहर के अलावा पश्चिम बंगाल में त्रिबेनी, डायमंड हार्बर और अन्य जगहों पर भी बीओडी लेवल बढ़ गया है.यह तो पुरानी बात भी कह सकते है 2013,2017 पर 2020 की रिपोर्ट का क्या हालत होगा..?
(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

Monday, October 12, 2020

मेरी गंगा यात्रा भाग 111

मेरी गंगा यात्रा भाग 111
एक प्रयास गंगा बचे
मित्रो आज की यात्रा को सुचारू बनाने के लिये कुछ समाचार पत्रों, और समाचार एजंसियों का सहारा भी लिया है मैने, मेरी प्राथमिकता रही हैं कि सत्य को जनता जनार्दन तक लेकर आया जाये, वो भी सत्य से अनभिज्ञ न रहे,क्योकि गंगा की बर्बादी मे सबसे बड़ा हाथ जनता जनार्दन का ही तो है बहुत खोजने पर मुझे गंगा प्रदूषण सम्बंधित ताजे आंकड़े प्राप्त हुए जिसका मैंने उल्लेख किया है आज के इस पड़ाव को दो भागों मे लिया जायेगा क्योंकि रिपोर्ट लम्बी होगी और लम्बे लेख आप पड़ते नही इस लिये दो भाग,.. यह रिपोर्ट 2019 के आंकड़ों को दिखाती हैं साथ ही आज हम पुराने आंकड़ों का विश्लेषण कर तुलनात्मक भेद भी करने की कोशिश करेंगे हमारी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने कहा है कि गंगा नदी का पानी सीधे पीने के लिए अनुपयुक्त है पर आप कहेंगे यह तो हमें पता है नया क्या हैं, सही भी हैं पर बात आंकड़ो की है जनाब, और वो भी सरकारी तंत्र के आंकड़ों की, जो कभी कभी ही सही होते है  गंगा और उसके गुजरने वाले स्थान में केवल सात जगहें ऐसी हैं, जहां का पानी शुद्धिकरण के बाद पीया जा,सकता हैं केवल सात जगह पर ही ये याद रहे..? सबसे लम्बी नदी और स्थान सात, हैं न बड़ी नाइंसाफी, सीपीसीबी के ताजा आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक गंगा नदी का पानी पीने एवं नहाने के लिए ठीक नहीं है.क्योकि उतर प्रदेश मे पहुचते हैं गंगा मैला होना आरम्भ जो जाती हैं और कानपुर तक नाला सी दर्शय होती हैं सीपीसीबी द्वारा जारी एक मानचित्र में नदी में ‘कोलीफार्म’ जीवाणु का स्तर बहुत बढ़ा हुआ दिखाया गया है कुल 86 स्थानों पर स्थापित किए गए लाइव निरीक्षण केंद्रों में से केवल सात क्षेत्र ऐसे पाए गए, जहां का पानी शुद्ध करने की प्रक्रिया के बाद पीने योग्य है जबकि 78 अयोग्य पाए गए. नदी के पानी की गुणवत्ता को जांचने के लिए देश भर में गंगा नदी घाटी में लाइव निरीक्षण केंद्रों की ओर से डेटा एकत्रित किए गए.सीपीसीबी के अनुसार, उत्तराखंड में गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक लगभग सभी शहरों में गंगाजल पीने योग्य है. हालांकि ये मानक पूरे होने के बावजूद यहां पानी को छानकर तथा स्वच्छ करके पीना चाहिए.
मालूम हो कि एनजीटी ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और सीपीबीसी को निर्देश दिया था कि वह हर 100 किलोमीटर की दूरी पर बोर्ड लगाकर यह बताएं कि गंगा का पानी पीने और नहाने योग्य है या नहीं. इसी के बाद सीपीबीसी ने यह सूचना अपनी वेबसाइट पर डाली है.
सीपीबीसी के मापदंडों के आधार पर जल में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा एक लीटर जल में 6 मिलीग्राम से अधिक और बॉयो-केमिकल ऑक्सीजन डिमांड प्रति लीटर जल में दो मिली ग्राम होनी चाहिए.
इसी तरह कोलीफार्म की संख्या प्रति 100 एमएल में 5000 से कम और पीएच वैल्यू 6.5 से 8.5 के बीच होनी चाहिए.
सीपीसीबी के मुताबिक इन मानदंडों पर खरा उतरने के बावजूद पानी परंपरागत तरीके से छानकर और अशुद्धियों को दूर करने पर ही पीने योग्य होगा.
ऐसा देश जहां सैकड़ों लोग भारत की जीवनरेखा मानी जाने वाली गंगा में डुबकी लगाने के लिए एकत्रित होते हैं, सीपीसीबी ने कहा कि नदी का पानी इतना प्रदूषित है कि यह पीने तो क्या नहाने के लिए भी अनुपयुक्त है.पिछले साल द वायर को सूचना का अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक पहले की तुलना में किसी भी जगह पर गंगा साफ नहीं हुई है, बल्कि साल 2013 के मुकाबले गंगा नदी कई सारी जगहों पर और ज्यादा दूषित हो गई हैं. जबकि 2014 से लेकर जून 2018 तक में गंगा सफाई के लिए 5,523 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिसमें से 3,867 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं.पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन आने वाली संस्था केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा आरटीआई के तहत मुहैया कराई गई सूचना के मुताबिक साल 2017 में गंगा नदी में बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) की मात्रा बहुत ज़्यादा थी. इतना ही नहीं, नदी के पानी में डीओ (डिज़ॉल्व्ड ऑक्सीजन) की मात्रा ज़्यादातर जगहों पर लगातार घट रही है.वैज्ञानिक मापदंडों के मुताबिक स्वच्छ नदी में बीओडी का स्तर 3 मिलीग्राम/लीटर से कम होनी चाहिए. वहीं डीओ लेवल 4 मिलीग्राम/लीटर से ज़्यादा होनी चाहिए. अगर बीओडी लेवल 3 से ज्यादा है तो इसका मतलब ये है कि वो पानी नहाने, धोने के लिए भी सही नहीं है.

Wednesday, October 7, 2020

मेरी गंगा यात्रा भाग 110

मेरी गंगा यात्रा भाग 110
इक प्रयास गङ्गा बचे
मित्रों क्या आप जानते है अब तक गंगा की सफाई हेतु विभिन्न परियोजनाओं हेतु लगभग 20,000 करोड़ रुपये खर्च हो चुके है।क्यो आ रही हैं न हंसी, परिणाम आपके सामने हैं कुछ दिनों पहले मैं टी वी पर एक फ़िल्म देख रहा था जब कि मैं फ़िल्म विलम नही देखता पर उसका विषय ही ऐसा था बमन ईरानी का डबल रोल कुछ बावड़ियों को लेकर हास्य विषय था कागजो मे ही बावड़ी बनती हैं, फिर चोरी होती हैं बहुत सुंदर चित्रण हँसते हँसते बड़ी गम्भीर बात कह दी, वही स्थिति गंगाजी की भी हैं 90 प्रतिशत यही होता हैं कागज़ो में गंगा साफ होती हैं और फिर साफ ही हो जाता हैं सब कुछ..?आप हिसाब मांगों अधिकारियों के पास सब हिसाब पूरा होगा यानि एकाउंट मेन्टेन होगा,पर गंगा वैसे के वैसी मैली समस्या जस की तस कुछ अधिकारी और नेता काम भी करना चाहते है पर उन्हें भी या तो भृष्ट कर दिया या काम ही नही करने दिया,इसी लिये  सरकारों ने कई योजनाएँ बनाई। इन योजनाओं के तहत करोड़ों रुपए प्रदान किये गए हैं।और भविष्य मे होते भी रहेंगे क्योंकि गंगा केवल नंदी नही आस्था का प्रश्न है, पर गंगा के कीड़े मरे या न मरे इनके पेट के कीड़े जरूर मर जायेगे,ध्यान देने वाली बात है कि अकेले वाराणसी मेें ही गंगा को स्वच्छ करने के लिये काफी खर्चा किया गया,पर गंगा प्रदूषण से अधिक घाटों के सौन्दर्यकरण पर,ताकि विदेशी पर्यटक प्रसन्न रहे, चाहे गंगा जी नाला हो जाये,लेकिन इतने खर्चे के बावजूद भी गंगा के पानी में प्रदूषण की मात्रा कम नहीं हुई। पर्यावरणविदों एवं वैज्ञानिकों के अनुसार जब तक गन्दे नालों का पानी, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरा, सीवेज, घरेलू कूड़ा-करकट पदार्थ आदि गंगा में गिरते रहेंगे तब तक गंगा का साफ रहना मुश्किल है। जल आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार गंगा का पानी तो प्रदूषित हो ही रहा है साथ ही बहाव भी कम होता जा रहा है। यदि यही स्थिति रही तो गंगा में पानी की मात्रा बहुत कम व प्रदूषित हो जाएगी। देश के प्रमुख धार्मिक शहर वाराणसी की पहचान गंगा के निर्मल जल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। गंगा का जलस्तर इस तेजी से गिर रहा है कि विगत एक वर्ष के भीतर गंगा में ढाई फिट पानी घट गया है। जिन घाटों पर बैठकर कभी लोग गंगा के निर्मल जल में स्नान कर पापों का नाश किया करते थे उन घाटों से गंगा का जल दूर हो गया है। गंगा के घटते जलस्तर से सभी परेशान हैं। गंगा नदी में आक्सीजन की मात्रा भी सामान्य से कम हो गई है। जो पानी आप देख रहे है वह कानपुर की मेहरबानी हैं क्योंकि वहाँ से निकलने वाला औद्योगिक इकाइयों के मैला पानी हैं जोबड़ी मात्रा मे गंगा मे विलय होता हैं वही स्थिति यमुना जी की भी हैं

Tuesday, October 6, 2020

मेरी गंगा यात्रा भाग 109

मेरी गंगा यात्रा भाग 109
इक प्रयास गंगा बचे
चलिये आज उतर प्रदेश के पूर्वी भाग की बात करते है मैंने कुम्भ 2019 के अंतर्गत अपने तीन माह इलाहाबाद प्रयागराज में बिताये, और गंगाजी की स्थिति को भी देखा मात्र जहाँ कुम्भ क्षेत्र था वहां गंगा यमुना की स्थिति उत्तम नजर आती थी परंतु थोड़ा दूर हटते ही स्थिति जस की तस थी, केवल उच्च अधिकारियों और नेताओं के आने पर गंगा की,और घाटों की स्थिति प्रशंसनीय थी, नाले प्रयागराज मे भी खुले आम गंगा में छोड जाते थे उसके एक साल बाद 2020 में जब से कोरोना काल आया स्थिति ही विपरीत हो गई, सम्पूर्ण प्रदेश मे शान्ति, प्रदूषण मुक्त वातावरण दिखने लगा जिले में भी वायु प्रदूषण अपने निचले स्तर पर  था लॉकडाउन लागू होने के एक दिन पहले 24 मार्च को लखनऊ का “एयर क्वालिटी इंडेस्क” (एक्यूआइ) 204 था वह 31 मार्च को 80 के भी नीचे पहुंच गया था। ग्रेटर नोएडा का एयर क्वॉलिटी इंडेक्स 178 से घटकर 90 के नीचे आ गया था। कानपुर शहर को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2018 में विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल किया था। यहां भी एयर क्वॉलिटी इंडेक्स लॉकडाउन में 50 से नीचे जा चुका था। गोरखपुर में बीते एक सप्ताह का एक्यूआइ 100 से 50 माइक्रोग्राम घनमीटर के बीच सिमट गया था, जबकि लॉकडाउन से पहले यह आंकड़ा ज्यादातर 200 के करीब रहता था। इसी प्रकार यूपी के मेरठ, गाजियाबाद, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर जिले जिनका नाम वर्ष 2019 में प्रदेश के सबसे प्रदूषित शहरों में आया था जहां हवा की गुणवत्ता सबसे खराब थी, यहां भी पहली बाद एयरक्वालिटी इंडेक्स अपने न्यूनतम स्तर पर आ गया।लॉकडाउन की वजह से प्रदेश की हवा जहां शुद्ध हो रही थी वहीं गंगा-गोमती के पानी का रंग बदल गया। अब गंगा और गोमती के जल का आचमन करने से लोग घबरा नहीं रहे हैं नाले से भी बतर दिखने वाली नदियाँ अब शीशे दिख रही गत 15-16 मार्च की बरसात से गंगा का जलस्तर भी बढ़ गया। अगर हम लॉकडाउन के पहले और बाद के हालात पर नजर डालें तो बदलाव साफतौर पर देखा जा सकता है।कानपुर व वाराणसी की जनता ने खुशी जाहिर की एक शिष्य के अनुसार  लॉकडाउन की वजह से गंगा का पानी बहुत साफ नजर आ रहा हैं कानपुर, प्रयागराज, आदिगंगा गोमती का साफ पानी देख चेहरे पर आ रही हैं यही हाल लखनऊ से लेकर जौनपुर तक आदि नदी गोमती का था। आदिगंगा गोमती नदी का जल लॉक डाउन के अंतर्गत निर्मल होकर स्नान, आचमन करने व पानी की गुणवत्ता जलजीवों और मछलियों के लिए उपयुक्त हो गई थी।वही लॉकडाउन की वजह से कचरे को गोमती में फेंकने में काफी कमी आई थी। लखनऊ से लेकर सुलतानपुर तक गोमती नदी के पानी मे काफी निर्मलता दिखी, इसके पहले लखनऊ से लेकर सुलतानपुर तक पूरे गोमती नदी के सफर में नदी का पानी नहाने के लिए भी ठीक नहीं था। लॉकडाउन में आदिगंगा गोमती नदी के जल की अच्छी सेहत दिखाई दे रही है।पर गंगा का पानी कानपुर और वाराणसी में 40 से 50 फ़ीसदी तक निर्मल और स्वच्छ हो गया था। कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी तीनों शहरों में गंगा के स्वच्छ होने की वजह साफ था लॉकडाउन में हर आदमी घर के अंदर था। न सड़कों पर वाहन चल रहे था न फैक्ट्रियां चल रही था सब बंद था तो प्रदेश भी प्रदूषण मुक्त हो गया जो काम कोई सरकार नही कर पाई वह कोविड 19 के डर ने कर दिया यानि डर होना चाहिए, हम मनुष्य बिना डर के कुछ नही करने वाले, 100 वर्ष बाद ही सही गंगा निर्मल और स्वछ नजर तो आई, वरना जो हाल 5,000 वर्षो में नही हुआ वो गंगा का नाश 100 वर्षो मे हमने कर दिया अभी समय है हमें नदियों को बचाना होगा अन्यथा आने वाली पीढ़िया गंगा को वीडियो और तस्वीरों मे ही देखेगी, जैसे हम आज डायनासोर की बात करते हैं