मेरी गंगा यात्रा भाग 110
इक प्रयास गङ्गा बचे
मित्रों क्या आप जानते है अब तक गंगा की सफाई हेतु विभिन्न परियोजनाओं हेतु लगभग 20,000 करोड़ रुपये खर्च हो चुके है।क्यो आ रही हैं न हंसी, परिणाम आपके सामने हैं कुछ दिनों पहले मैं टी वी पर एक फ़िल्म देख रहा था जब कि मैं फ़िल्म विलम नही देखता पर उसका विषय ही ऐसा था बमन ईरानी का डबल रोल कुछ बावड़ियों को लेकर हास्य विषय था कागजो मे ही बावड़ी बनती हैं, फिर चोरी होती हैं बहुत सुंदर चित्रण हँसते हँसते बड़ी गम्भीर बात कह दी, वही स्थिति गंगाजी की भी हैं 90 प्रतिशत यही होता हैं कागज़ो में गंगा साफ होती हैं और फिर साफ ही हो जाता हैं सब कुछ..?आप हिसाब मांगों अधिकारियों के पास सब हिसाब पूरा होगा यानि एकाउंट मेन्टेन होगा,पर गंगा वैसे के वैसी मैली समस्या जस की तस कुछ अधिकारी और नेता काम भी करना चाहते है पर उन्हें भी या तो भृष्ट कर दिया या काम ही नही करने दिया,इसी लिये सरकारों ने कई योजनाएँ बनाई। इन योजनाओं के तहत करोड़ों रुपए प्रदान किये गए हैं।और भविष्य मे होते भी रहेंगे क्योंकि गंगा केवल नंदी नही आस्था का प्रश्न है, पर गंगा के कीड़े मरे या न मरे इनके पेट के कीड़े जरूर मर जायेगे,ध्यान देने वाली बात है कि अकेले वाराणसी मेें ही गंगा को स्वच्छ करने के लिये काफी खर्चा किया गया,पर गंगा प्रदूषण से अधिक घाटों के सौन्दर्यकरण पर,ताकि विदेशी पर्यटक प्रसन्न रहे, चाहे गंगा जी नाला हो जाये,लेकिन इतने खर्चे के बावजूद भी गंगा के पानी में प्रदूषण की मात्रा कम नहीं हुई। पर्यावरणविदों एवं वैज्ञानिकों के अनुसार जब तक गन्दे नालों का पानी, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरा, सीवेज, घरेलू कूड़ा-करकट पदार्थ आदि गंगा में गिरते रहेंगे तब तक गंगा का साफ रहना मुश्किल है। जल आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार गंगा का पानी तो प्रदूषित हो ही रहा है साथ ही बहाव भी कम होता जा रहा है। यदि यही स्थिति रही तो गंगा में पानी की मात्रा बहुत कम व प्रदूषित हो जाएगी। देश के प्रमुख धार्मिक शहर वाराणसी की पहचान गंगा के निर्मल जल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। गंगा का जलस्तर इस तेजी से गिर रहा है कि विगत एक वर्ष के भीतर गंगा में ढाई फिट पानी घट गया है। जिन घाटों पर बैठकर कभी लोग गंगा के निर्मल जल में स्नान कर पापों का नाश किया करते थे उन घाटों से गंगा का जल दूर हो गया है। गंगा के घटते जलस्तर से सभी परेशान हैं। गंगा नदी में आक्सीजन की मात्रा भी सामान्य से कम हो गई है। जो पानी आप देख रहे है वह कानपुर की मेहरबानी हैं क्योंकि वहाँ से निकलने वाला औद्योगिक इकाइयों के मैला पानी हैं जोबड़ी मात्रा मे गंगा मे विलय होता हैं वही स्थिति यमुना जी की भी हैं
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