मेरी गंगा यात्रा भाग 111
एक प्रयास गंगा बचे
मित्रो आज की यात्रा को सुचारू बनाने के लिये कुछ समाचार पत्रों, और समाचार एजंसियों का सहारा भी लिया है मैने, मेरी प्राथमिकता रही हैं कि सत्य को जनता जनार्दन तक लेकर आया जाये, वो भी सत्य से अनभिज्ञ न रहे,क्योकि गंगा की बर्बादी मे सबसे बड़ा हाथ जनता जनार्दन का ही तो है बहुत खोजने पर मुझे गंगा प्रदूषण सम्बंधित ताजे आंकड़े प्राप्त हुए जिसका मैंने उल्लेख किया है आज के इस पड़ाव को दो भागों मे लिया जायेगा क्योंकि रिपोर्ट लम्बी होगी और लम्बे लेख आप पड़ते नही इस लिये दो भाग,.. यह रिपोर्ट 2019 के आंकड़ों को दिखाती हैं साथ ही आज हम पुराने आंकड़ों का विश्लेषण कर तुलनात्मक भेद भी करने की कोशिश करेंगे हमारी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने कहा है कि गंगा नदी का पानी सीधे पीने के लिए अनुपयुक्त है पर आप कहेंगे यह तो हमें पता है नया क्या हैं, सही भी हैं पर बात आंकड़ो की है जनाब, और वो भी सरकारी तंत्र के आंकड़ों की, जो कभी कभी ही सही होते है गंगा और उसके गुजरने वाले स्थान में केवल सात जगहें ऐसी हैं, जहां का पानी शुद्धिकरण के बाद पीया जा,सकता हैं केवल सात जगह पर ही ये याद रहे..? सबसे लम्बी नदी और स्थान सात, हैं न बड़ी नाइंसाफी, सीपीसीबी के ताजा आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक गंगा नदी का पानी पीने एवं नहाने के लिए ठीक नहीं है.क्योकि उतर प्रदेश मे पहुचते हैं गंगा मैला होना आरम्भ जो जाती हैं और कानपुर तक नाला सी दर्शय होती हैं सीपीसीबी द्वारा जारी एक मानचित्र में नदी में ‘कोलीफार्म’ जीवाणु का स्तर बहुत बढ़ा हुआ दिखाया गया है कुल 86 स्थानों पर स्थापित किए गए लाइव निरीक्षण केंद्रों में से केवल सात क्षेत्र ऐसे पाए गए, जहां का पानी शुद्ध करने की प्रक्रिया के बाद पीने योग्य है जबकि 78 अयोग्य पाए गए. नदी के पानी की गुणवत्ता को जांचने के लिए देश भर में गंगा नदी घाटी में लाइव निरीक्षण केंद्रों की ओर से डेटा एकत्रित किए गए.सीपीसीबी के अनुसार, उत्तराखंड में गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक लगभग सभी शहरों में गंगाजल पीने योग्य है. हालांकि ये मानक पूरे होने के बावजूद यहां पानी को छानकर तथा स्वच्छ करके पीना चाहिए.
मालूम हो कि एनजीटी ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और सीपीबीसी को निर्देश दिया था कि वह हर 100 किलोमीटर की दूरी पर बोर्ड लगाकर यह बताएं कि गंगा का पानी पीने और नहाने योग्य है या नहीं. इसी के बाद सीपीबीसी ने यह सूचना अपनी वेबसाइट पर डाली है.
सीपीबीसी के मापदंडों के आधार पर जल में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा एक लीटर जल में 6 मिलीग्राम से अधिक और बॉयो-केमिकल ऑक्सीजन डिमांड प्रति लीटर जल में दो मिली ग्राम होनी चाहिए.
इसी तरह कोलीफार्म की संख्या प्रति 100 एमएल में 5000 से कम और पीएच वैल्यू 6.5 से 8.5 के बीच होनी चाहिए.
सीपीसीबी के मुताबिक इन मानदंडों पर खरा उतरने के बावजूद पानी परंपरागत तरीके से छानकर और अशुद्धियों को दूर करने पर ही पीने योग्य होगा.
ऐसा देश जहां सैकड़ों लोग भारत की जीवनरेखा मानी जाने वाली गंगा में डुबकी लगाने के लिए एकत्रित होते हैं, सीपीसीबी ने कहा कि नदी का पानी इतना प्रदूषित है कि यह पीने तो क्या नहाने के लिए भी अनुपयुक्त है.पिछले साल द वायर को सूचना का अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक पहले की तुलना में किसी भी जगह पर गंगा साफ नहीं हुई है, बल्कि साल 2013 के मुकाबले गंगा नदी कई सारी जगहों पर और ज्यादा दूषित हो गई हैं. जबकि 2014 से लेकर जून 2018 तक में गंगा सफाई के लिए 5,523 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिसमें से 3,867 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं.पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन आने वाली संस्था केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा आरटीआई के तहत मुहैया कराई गई सूचना के मुताबिक साल 2017 में गंगा नदी में बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) की मात्रा बहुत ज़्यादा थी. इतना ही नहीं, नदी के पानी में डीओ (डिज़ॉल्व्ड ऑक्सीजन) की मात्रा ज़्यादातर जगहों पर लगातार घट रही है.वैज्ञानिक मापदंडों के मुताबिक स्वच्छ नदी में बीओडी का स्तर 3 मिलीग्राम/लीटर से कम होनी चाहिए. वहीं डीओ लेवल 4 मिलीग्राम/लीटर से ज़्यादा होनी चाहिए. अगर बीओडी लेवल 3 से ज्यादा है तो इसका मतलब ये है कि वो पानी नहाने, धोने के लिए भी सही नहीं है.
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