Tuesday, June 27, 2017

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-16

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-16
"गंगा में गंदा पानी नहीं जाने देंगे" मोदी
कितना अच्छा जुममला है सुनते सुनते कान भी पक गये मानो, मोदी जी से न नराजगी है न रोष हाँ है तो शिकायत और कुछ करने की आशा, कुछ सार्थक, जो नजर आये परिणाम दिखै कुछ कड़े कदम उठाये जाये , जुर्माना लगाना हल नही है हल समाज जाग्रति ओर प्रदुषण मुक्त नदियां और भारत है पश्चिमी सभ्यता की और ताकने वाले समाज को चाहिये कि केवल पश्चिम का फैशन खाना ही न अपनाये उनसे रहन सहन देश प्रेम सही जाग्रति भी सीखे वे शहर अपनी नदियों को साफ रखना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं क्योंकि वह देश और देश की संम्पत्ति को अपना मानते है और हम.? सारी जिम्मेदारी सरकार की .? क्योंकि हम चुन कर लाये हैं किन्हें चुना है वो कहा से आये है है कहि बाहर से आये हैं.? है तो वो भी हम ही मे से एक हम जैसे निक्कमे, और हो भी क्यो न करोड़ों रुपये खर्च कर सत्ता मे आये हैं राजनीति बिजनेस है कोई मज़ाक थोड़े है बिजनेस में सेवा कैसी..?
चोर चोर मोसेरे भाई, सभी अपनी अपनी बॉल को दूसरे के पाले मे फैक देते , हम अपनी जिम्मेदारी को समझना नही चाहते जनता सरकार को दोष देती है सरकारे जनता को पर सुधरना कोई नही चाहता भारत सरकार हर बार कहती है कि गंगा नदी में प्रदूषित जल के प्रवाह पर पूरी तरह से रोक लगाई जाएगी और सिर्फ जलशोधन संयंत्र से साफ किए गए पानी को ही नदी में छोड़ा जाएगा.
इस हकीकत से किसी को सरोकार नहीं कि अब भारत में नदियों के नाम पर नाले बहते हैं. जीवनदायिनी गंगा भी इस त्रासदी की शिकार है. गंगा को मां कहकर सत्ता में आई केन्द्र सरकार ने अब गंगा और अन्य नदियों की सफाई का बीड़ा उठाया है.भारतीय संस्कारों में गंगा महज एक नदी नहीं है बल्कि आत्मा के परमात्मा से मिलन का माध्यम है. ऐसा माध्यम जिसे मृत्युलोक पर मोक्षदायिनी बनाने के लिए कठोर तप कर भागीरथ स्वर्ग से धरती पर उतार लाए थे. सदियों तक करोड़ों लोगों को मोक्ष का अहसास दिलाने वाली गंगा आज खुद अपनी ही संतानों से अपने वजूद को बचाने की प्राथर्ना कर रही है. यह विडंबना सिर्फ गंगा की नहीं बल्कि उसकी अपनी सहोदरा यमुना और देश के तमाम भागों में अपना आंचल खोलकर करोड़ों जीवन संवार रही अन्य नदियों की भी है. हिमालय से धवल रुप में उतरकर मैदान तक आते आते गंगा और यमुना सड़ांध मारते उस गंदे नाले के रूप मे परिवर्तित हो जाती हैं जिसके किनारे सिर्फ दो पल ठहरना भी दूभर हो गया है, उसके चुल्लू भर पानी में आचमन की तो बात ही छोड़िए.साहब ,

Saturday, June 17, 2017

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-15

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-15

नदियों के किनारों पर पर्याय कब्जा करने की साजिश होती रही है सँस्कृति के आरम्भ से ही नदियों के किनारों पर शहरों का निर्माण किया जाता था क्योंकि मानव को पता था जल ही जीवन है नदियों ने कई सँस्कृति को जन्म दिया आज भी इतिहास मे उन्हें सन्मान से जाना जाता है तब से आज तक नदियों ने मानव को अपने जल से पोषित किया है पर मानव है अहसान फरामोश उसने अपनी जीवनदायिनी नदियों को ही धोखा दिया है नदियों का अंत करने पर उतारू है आज भारत मे गङ्गा आदि नदियों के मल, कचरा, नालो का जल ढोने वाले जल मार्ग मात्र रह गये है शहरों का सारा कूड़ा नदियों मे बहाया जाता हैं नदियां स्लम क्षेत्र बन गई, इतना ही नही आज नदियों की हत्या के बाद भी हम बेशर्म लोग उन नदियों पर ही निभर है दिल्ली, की यमुना हो या गङ्गा के किनारे बसे कानपुर, इलाहाबाद, आदि नालो के पानी को ही साफ कर पीते है है न कमाल, नदियों का जल है मल वो पेट मे, पेट का मल जल वो नदियों मे, सब से अधिक परेशानी प्लास्टिक के प्रयोग से है जो जल के मार्ग को अवरुद्ध करता हैं मुझे याद है कुछ वर्ष पूर्व नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने हरिद्वार जिले में पॉलीथिन की बिक्री और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात की थी । इसके लिए एनजीटी ने जिला प्रशासन व नगर निगम को निर्देश दिए थे कि पॉलीथिन को बेचने वालों पर पांच हजार का जुर्माना लगाएं। एनजीटी ने यह आदेश लोकल कमिश्नर शारिक जैदी की रिपोर्ट के आधार पर दिया था कूड़ा प्रबंधन, गंगा किनारे खुले होटल, गंगा घाटों पर फैले अतिक्रमण के मामले में एनजीटी ने सुनवाई की तिथि 22 जुलाई 14 तय की थी
हरिद्वार में जगह-जगह बिखरी पॉलीथिन, कूड़ा निस्तारण व्यवस्था, गंगा किनारे अतिक्रमण गंगा घाटों की सफाई व्यवस्था की वस्तुस्थिति देखने के लिए एनजीटी लोकल कमीश्नर शारिक जैदी को 19 जून को हरिद्वार भेजा था। हरकी पैड़ी क्षेत्र में गंदगी, अतिक्रमण को देखकर लोकल कमिश्नर ने नाराजगी जताई थी। इसके बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट एनजीटी को सौंपी थी। गुरुवार को इस पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने हरिद्वार जिले में पॉलीथिन की बिक्री व उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना था प्रेस को
कमिश्नर शारिक जैदी ने बताया था कि एनजीटी ने हरिद्वार जिले में पॉलीथिन की बिक्री व उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। आदेश का पालन करने के लिए एनजीटी ने जिला प्रशासन व नगर निगम को निर्देश दिए हैं। पर हुआ क्या सब दो दिन का शोर बनकर रह गया दो दिन बाद ही वही हाल था जो पहले था मैं भी कहा कम था मैंने भी हरिद्वार की फ़ोटो खीचकर लगा दी प्रशासन हर जगह एक सा ही है, क्यो न हो है तो वो भी इंसान,न पालीथिन का प्रयोग बंद हुआ न प्रदूषण,शहर के व्यापारी भी नही चाहते कि प्रदूषण पर सख्त कदम उठाये क्योकि इससे उनका नुकसान होता, प्रात गङ्गा जल का आचमन करने वाले तिलकदारी व्यपारी भी मानते हैं धर्म अपनी जगह है और व्यपार अपनी जगह है हरिद्वार के किनारे बने बाजारों, आश्रमों का सीधा मल गङ्गा मे जाता है कूड़ा गङ्गा किनारों पर, या पानी के साथ गङ्गा मे,

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-14

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-14

मित्रो अब तक आप जान चुके हैं कि कितना जरुरी है गंगा को बचाना, गङ्गा नही तो हिन्दू धर्म, हिन्दू सँस्कृति नही , सँस्कृति का स्तम्भ है गंगा , मेरे जीवन माँ गङ्गा का जो महत्व है वो मैं ही जनता हूं हर पल गंगा के पावन किनारे मुझे अपनी और आकर्षित करते हैं जब भी मै अपनी यात्रा के दौरान उदास होता तो गङ्गा के किनारे मन का हौसला बढ़ाते, अध्यात्म की ऊर्जा है गंगा, लहरों के संगीत अंहद की नाड हो मानो,पूर्ण ब्रह्म रूप है गंगा, इसलिए सन्त समाज कहता है गंगा को औद्योगिक कचरे, गन्दे नालो से बचाना जरुरी है......
सरकारे गंगा को बचाने के अपने दायित्व से विरक्त हो गई है
सदा नीरा माँ गंगा को बचाना हमारा कर्तव्य ही नहीं, हमारे अस्तित्व के लिये भी अत्यन्त जरुरी है.सभी एक स्वर से भारत सरकार से मांग करते रहे कि गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के उद्देश्य से गंगा एक्ट पास किया जाय गङ्गा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया जाये नदियों के लिये कड़े नियम बनाये जाये, गङ्गा जी को जीव होने दर्जा हो तभी कुछ हो सकता है अन्यथा सब प्रयास विफल ही रहेंगे क्योकि गङ्गा जी को नदी मान कर
गंगानदी में प्रदूषण भार को कम करने के लिए 1985 मे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा गंगा कार्य योजना या गैप (GAP) का शुभारंभ किया गया था। कार्यक्रम खूब धूमधाम के साथ शुरू किया गया था, लेकिन यह 15 वर्ष की अवधि में 901.71 करोड़ (लगभग 1010) रुपये व्यय करने के बाद नदी में प्रदूषण का स्तर कम करने में विफल रहा और आज जहां से चले वही ही, बस प्रयास डोल की आवाज ही रह गये दिसंबर 2009 में, गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक £ 6000 लाख ($1 अरब) उधार देने पर सहमत हुआ था। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन का अंत करने की पहल का हिस्सा है। इससे पहले 1989 तक इसके पानी को पीने योग्य बनाने सहित, नदी को साफ करने के प्रयास विफल रहे थे क्योकि भ्र्ष्टाचार यहाँ भी हावी रहा, सरकार बदली पर भ्रष्टाचार वही रहा,2010 मे भी कुंभमेला के दौरान गंगा को साफ रखने के नाम पर बड़ी रकम निपटा दी गई,
गंगा सफाई अभियान के नाम पर 'गंगा एक्शन प्लान' के तहत हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। गंगा में प्रदूषण कम होने के बजाय गंगा और ज्यादा प्रदूषित हुई है। गंगा के नाम पर रोज नई-नई योजना-परियोजना बनाना एक तमाशा बनता जा रहा है। गंगा की सफाई पिछले 30 वर्षों से जारी है और अनुमानों के मुताबिक़ अब तक इस पर दो हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च किए जा चुके हैं मुझे याद हैं कोर्ट ने कहा था, सरकार से कहा था आपको ऐसे क़दम उठाने चाहिए ताकि गंगा अपनी 'प्रिस्टीन ग्लोरी' (पुरानी भव्यता) दोबारा हासिल करे कोर्ट हर बार कहती गई सरकारे सुनती रही परिणाम वही, जो हर बार होता है

मेरी गङ्गा यात्रा-13

मेरी गङ्गा यात्रा-13

मित्रों पिछले भागो मे आपको गङ्गा जी के दर्द से अवगत करने की मैंने कोशिश की है पर गङ्गा जी का दर्द असहनीय है जो उनके अपने ही पूजने वाले समाज की देन है ऐसे मे गङ्गा किस
को कुछ नही करती, माँ जो ठहरी, गङ्गा जी का घाव अब नासूर होने की ओर बढ़ रहा है अभी प्रयास नही हुआ तो गङ्गा जी अमृत से मृत हो जायेगी बिना परिश्रम के मिली गङ्गा का मूल्य हम क्या जाने ,इतिहास मे कृपया पूर्व मे जाकर भगीरथ और उसके पूर्वजों से पुछो, क्या है गङ्गा का मोल..? गङ्गा जी की एक एक बूंद को तरसते मृत परिजनों से पूछो या अपने ही मृत पूर्वजो से पूछो क्या है गङ्गा , जिसके बिना न जीवित की गति है न मृत की सत गति है फिर भी न जाने कौन सी हींन भावना है जो सत्य से मुख मोड़ रहे हैं ऐसा भी क्या सैक्युलर होना जो नदियों ही निगल जाये, कैसे है धर्म के जानकार , गङ्गा के पूजने वाले जो मिटती गङ्गा को देख रहे हैं या गङ्गा पुत्र 
पूत कपूत हो पर माता कुमाता कभी न कहलावै.......
पिछले वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को ऐसे संयंत्रों की संख्या, इनके लिए मंगाई गई निविदाओं और मौजूदा संयंत्रों की स्थिति पर रिपोर्ट देने के लिए भी कहा था इस बेंच में जस्टिस ठाकुर के अलावा जस्टिस आरके अग्रवाल और ए के गोयल भी शामिल थे मैंने अखबारों मे पढ़ा कि न्यायालय में पर्यावरणविद एम सी मेहता की ओर से गंगा की सफाई के बारे में डाली गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई हो रही हैं 
2500 किलोमीटर लंबी गंगा की सफाई के लिए नदी के तट पर बसे 118 नगरपालिकाओं की शनाख्त की जा रही है जो प्रदूषण के कारक है जहां वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सहित पूरी साफ सफाई का लक्ष्य हासिल किया जाये वही खबर यह थी कि मकर संक्रांति के दिन गंगा नदी में सौ से अधिक लाशें मिलने के बाद सामने आया है कि कुछ समुदायों के लोग मृतकों को जलाने के बदले लाशें नदी में बहा देते हैं. केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश की सरकार से गंगा नदी में मिली उन लाशों पर रिपोर्ट भी मांगी थी पर हुआ क्या .? सब गोलम गोल,कौन खोले पोल, चार पहर का शोर मात्र रहा फिर गहरी खामोशी , और गङ्गा अपने दर्द के साथ अकेली 
इस बीच एक बार फिर कोई जागा, आवाज उठी,गंगा के अलावा दूसरी नदियों को भी साफ रखने के लिए कदम उठाए जाने की बात हुई नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी ने यमुना में पूजा और निर्माण सामग्री तथा अन्य कचरा डाले जाने पर 50 हजार रूपये तक का जुर्माना लगाने का निर्देश दिया है आपको लगता है यह उचित कदम है मेरी निगाह मैं कोरी मूर्खतापूर्ण पर्यास है.नदियाँ पूजा के कचरे से नही नालो और आधोगिक कचरे से प्रदूषित है , प्रदूषित है सरकार की अनदेखी से,..
जुर्माना सरकारों पर भी लगे जिन शहरों से नदियो मैं मल मूत्र, आधोगिक कचरा नदियों को प्रदूषित कर रहा है यदि सामान्य जन पर जुर्माना 50 हज़ार है तो सरकार पर 50 करोड़ हो वही पएनजीटी ने कड़े निर्देश देते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से औद्योगिक इकाईयों को नदी में कचरा बहाने की इजाजत नहीं देने को कहा था पर आज भी प्रदूषण बा-दस्तूर जारी है देश के बेडा गर्क की तैयारी है 
पिछले 10वर्षो मे गङ्गा बचाने के लिये आम भारतीय बहुत हद तक जाग्रत हो चूका लगता हैं कुछ जाग्रति आती लगती हैं पर लोग सामर्थ वान नही है पर जाग्रत है नही जागे तो हमारे चुने सांसद व् विधायक ये सामर्थवान है पर जागरूक नही.,,
1986-1992 के दौरान भारतीय विषाक्तता अनुसंधान केंद्र (ITRC), लखनऊ द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला कि ऋषिकेश, इलाहाबाद जिला और दक्षिणेश्वर में गंगा नदी के जल में पारे की वार्षिक सघनता क्रमशः 0.081, 0.043, तथा 0.012 और पीपीबी (ppb) थी।
मैं हरिहर वेला...
सोचा,जीवन ये कुछ काम में आवे..
माँ गंगा ने पुखे तारे..
हम काे गंगा बचाये
, हम गंगा काे बचाये
आओ संकल्प ले हम गंगा काे

मेरी गङ्गा यात्रा-12

मेरी गङ्गा यात्रा-12 

मोदी सरकार के बनते ही आनन फानन मे सरकार ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाने की सोच पर अमल करते हुए जल संसाधन मंत्रालये ने इसे जन आंदोलन का रूप देने के लिए जुलाई माह में 'गंगा मंथन' कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनाई थी और बहन उमा जी ने बड़े ही जोश के साथ दो वर्षों मे गङ्गा को प्रदूषण मुक्त करने की बात की थी तभी हम बड़ी हैरान , और आश्चर्य हुआ कि बहन जी के पास कोई जिन, दिव्य शक्ति आ गईं लगती हैं शायद, जो काम 100 वर्षो मे नही हुआ वो दो वर्षों मे हो जाये, गङ्गा जी के लिये संकल्प बद्ध उमा जी को सरकारी तंत्र की अवसर शाही का नही पता,..?गङ्गा आंदोलन मैं रिश्वत खोरी सबसे बड़ा रोड़ा है
किस देश मे बिना रिश्वत के कागज की फाइल आगे नही बढ़ती वहा गङ्गा जी का पावन कार्य कैसे आगे बढ़ेगा उमा समय समय पर गङ्गा के लिये आवाज़ उठाई है भूख हड़ताले भी की है तब शायद बात और थी, सत्ता और थी आज तो सत्ता और भता सब आप और आप के सहयोगियों का है गङ्गा प्रदूषण मुक्त हो पर कागजो मे केवल न हो, केवल टी वी और सभाओ मे न हो,
तीन वर्ष मे केवल सभाये, और नामांकरण ही हुआ है ठोस कुछ है तो कहै,
साबरमती की तरह गंगा को साफ करके उसकी सूरत बदलने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं, ... राष्ट्रीय गंगा बेसिन अथॉरिटी की चार साल में संपन्न हुई तीन बैठक नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चरितार्थ करती नजर आती रही, शायद आगे भी ऐसा ही होगा
बात पर गौर करें तो गंगा की बदहाली के लिए न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकारों की उदासीनता भी उतनी ही जिम्मेदार है।जो प्रायः यहाँ मौन रहे अपनी जिम्मेदारी की बॉल केंद्र सरकार की ओर उछलते रहे गङ्गा के प्रदूषण के लिये एक दूसरे को दोषी बनाकर खुद को गङ्गा पुत्र मानते रहे
पश्चिम की गंगा यानी दमन गंगा अब अरब सागर के पानी में जहर घोल रही है जिसके चलते उथले समुद्र की मछलियां खत्म हो चुकी हैं। ... पर नदी और समुद्र के पानी में जहर घुलने के बाद मछुआरे बदहाली के शिकार हो चुके हैं। मछुवारो की माने तो बरसात में तो समुद्र में भी मरी हुई मछलियां उतराई नज़र आती हैं वही पटना शहर का बेहिसाब कचरा गंगा जी में आंखें मूंदकर बहाया जा रहा है. बड़ी शर्म की बात है 20 लाख लोगों की गंदगी से गंगा रोज़ मैली हो रही हैं और आस्था शर्मसारः
नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों की अलग से आयोजित कार्यशाला में गंगा सफाई में लगी 14 अलग-अलग एजेंसियों है पर उनके बीच समन्वय का अभाव नजर आता है ऐसा न हो कि रिटायर होने के बाद वह किताब लिखकर कहे कि ऐसा होना चाहिए था, ऐसा नहीं। हमने सरकारों को सेंकडो सुझाव दिये पर किसी ने सुनी नही अगर ऐसा ही है तो उनकी जय हो

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-11

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-11

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गंगा की जो धाराएं हैं वह अपनी 
बाल्यकाल और किशोर अवस्था मे है.वैज्ञानिकों की माने तो नदियों से ऐसी स्थिति में छेड़छाड़ करना उनकी हत्या के समान है.गङ्गा जी पर बनने वाले बांध , बिजली परियोजना, ये सभी कार्य गङ्गा हत्या है इसके लिये कानून मे प्रवधान होना चाहिए विकास के नाम पर किसी की हत्या करने की छूट किसी को नही होनी चाहिए , जहाँ एक और गङ्गा को माँ दर्जा दिया जाता हैं वही पहले उसे निर्मल बहने और जीवन जीने का अधिकार होना चाहिये, भारत की जीवनदायी नदी गंगा भले ही असंख्य भारतीय मन में माता का दर्जा पाती हो लेकिन जब उसके प्रति प्यार और संवेदना के साथ सोचने की ... जब उद्गम पर ही गंगा को उत्पीड़ित किया जाएगा तो नदी का भविष्य क्या होगा!
गंगा नदी को एक राष्ट्रीय नदी के रूप में घोषित किया जाए और जिस तरह से राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार गंगा को सम्मान एवं सुरक्षा प्रदान की जाए.ऐसी मेरी सोच है
यदि हम वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो गंगा क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी अपने जीवन के लिए गंगा पर निर्भर रहती है. यही कारण है कि गंगा को सभी धर्मो में भारत की भाग्य रेखा भी कहा गया है.इसलिये भी गङ्गा को बचाना अति आवश्यक है कोई भी हिन्दू धर्म मे जन्म व्यक्ति गङ्गा के महत्व से अनभिज्ञ नही है गङ्गा जीवन और मरण, सभी कार्य मे आवश्यक है यदि गङ्गा मिटी तो सोचे आप अपने पितरों का विसर्जन कहा करेंगे .? नालो मे, आचमन करना होगा तो नाले के मल युक्त जल से करेंगे, और 30 वर्षो मे गङ्गा का रूप यमुना की तरह बदरंग नालो सा हो जायेगा, न लगे तो मेरे आदरणीय मित्र दिल्ली में यमुना जी को देख तसल्ली कर सकते हैं असज से 20 वर्ष पहले गङ्गा जी तरह यमुना जी भी निर्मल बहती थीं ओर अब..? दिल्ली के विकास ने यमुना की हत्या ,विनाश कर दिया, अब गङ्गा और उनकी सहायक नदियां की बारी है कौन दोषी है सरकारे या जनता,या दोनों हॉ सभी जो मूक हो कर नदियों को मिटाता देख रहे हैं
आंकड़ों की माने तो ,1981 में अध्ययनों से पता चला कि वाराणसी से ऊर्ध्वाधर प्रवाह में, नदी के साथ-साथ प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक में जैवरासायनिक ऑक्सीजन की मांग तथा मल कोलिफोर्म गणना कम थी। पटना में गंगा के दाहिने तट से लिए गए नमूनों के 1983 में किए गए अध्ययन पुष्टि करते हैं कि एशरिकिआ कोली (escherichia coli) (ई. कोलि (E.Coli)), फीकल स्ट्रेप्टोकोकाई (Fecal streptococci) और विब्रियो कोलेरी (vibrio cholerae) जीव सोन तथा गंडक नदियों, उसी क्षेत्र में खुदे हुए कुओं और नलकूपों से लिेए गए पानी की अपेक्षा गंगा के पानी में दो से तीन गुना तेजी से मर जाते हैं और आज के आंकड़े देखै तो .?30 वर्षो मैं स्थिति नाज़ुक हो गईं हैं नदियों अंतिम साँसे ले रही, बस वेंटिलेटर पर ही माने, अब हद हो गई अब गंगा के लिए अलग मंत्रालय के साथ कड़े कानून और उनका सख्ती से पालन भी जरूरी है। मंत्रालय के तहत ऐसी एक समिति होनी चाहिए, जिसमें वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और आध्यात्मिक गुरु समाज सेवी सदस्य हों।

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-10

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-10

हिमालय के शिखर गोमुख से निकलकर बंगाल की खाड़ी में मिलने वाली माँ गंगा भारतवासियों के लिए धार्मिक एकता, श्रद्धा, सनातन महत्व, आध्यात्मिक,मुक्ति दायनी और पतितपावनी के रूप में परम् पूज्य है. इसमें दो राय नहीं कि इसके तट पर हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का विकास हुआ है गङ्गा जी के तट पर इतिहास की नामी हस्तियों ने जन्म लिया,
पतित पावनी गङ्गा जी ने अपनी धारा से अपने क्षेत्रो उपजाऊ बना दिया , जहाँ जहाँ से गङ्गा जी गुजरी वहां की सँस्कृति का इतिहास मे अपना नाम था, वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो गंगा क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी अपने जीवन के लिए गंगा पर निर्भर रहती है. यही कारण है कि गंगा को सभी धर्मो में भारत की भाग्य रेखा भी कहा गया है. दूसरे शब्दों मे ''गङ्गा है तो हम है गङ्गा नही तो हमारा अस्तित्व भी नही,,
यदि गङ्गा व उनकी सहायक नदियों युही प्रदूषित होती रही तो निश्चित ही 35 करोड़ लोगों का अस्तित्व भी मिटा जायेगा, सभी शहरों का अस्तित्व गङ्गा जी के दम पर है सभी तीर्थ स्थलों की महत्ता गङ्गा जी के कारण है गङ्गा जी नही तो तीर्थ नही, पर्यटन नही, व्यापार नही, क्या आपको नही लगता मित्रों ऐसी अनमोल दैव्य धरोहर को बचाना चाहिये कागजो मे नही,प्रयास हो सार्थक, सच्ची से, यदि मोदी जी की सेना के 300 संसद व छै छै विधायक अगर एक एक जिला को भी सम्भाले तो गङ्गा प्रदूषण की समस्या 2 वर्ष मे ठीक हो जायेगी, पर राज नेता कहा गङ्गा जी का दर्द समझते हैं वो तो वही समझेगा जो गङ्गा को ह्रदय से माँ मानता होगा गङ्गा जी को नदी मानने वाले कहा गङ्गा जी पीड़ा समझेगे,
गंगा के तट अमीरो के लिये पिकनिक स्पोर्ट है
खाओ पियो गंद मचाओ, मस्ती मौज मनाओ
गरीब भी कहा कम है तीर्थ के नाम पर
कपडे धोओ गङ्गा मे मैल मिलाओ
गंगा के तट मल-मूत्र का डेर लगाओ
जूठन,उतरन गंगा मे छोड़ पाप मिटाओ
हो गई गंगा मैली दोष गंगा पर लगाओ
है ग़र शर्म थोड़ी तो डूब चुल्लू मर् जाओ,.....
अब तो बस गंगा संरक्षण कानून बना चाहिये, इसके लिये कठोर कदम उठाने होंगे गंगा में गिरने वाले सभी गंदे नाले, मल-मूत्र और औद्योगिक प्रदूषण को तुरंत प्रभाव से रोका जाए. गंगा संरक्षण हेतु राष्ट्रीय गंगा आयोग गठित किया जाए. गंगा का शोषण किसी भी रूप में नहीं किया जाए.