मेरी गङ्गा यात्रा भाग-14
मित्रो अब तक आप जान चुके हैं कि कितना जरुरी है गंगा को बचाना, गङ्गा नही तो हिन्दू धर्म, हिन्दू सँस्कृति नही , सँस्कृति का स्तम्भ है गंगा , मेरे जीवन माँ गङ्गा का जो महत्व है वो मैं ही जनता हूं हर पल गंगा के पावन किनारे मुझे अपनी और आकर्षित करते हैं जब भी मै अपनी यात्रा के दौरान उदास होता तो गङ्गा के किनारे मन का हौसला बढ़ाते, अध्यात्म की ऊर्जा है गंगा, लहरों के संगीत अंहद की नाड हो मानो,पूर्ण ब्रह्म रूप है गंगा, इसलिए सन्त समाज कहता है गंगा को औद्योगिक कचरे, गन्दे नालो से बचाना जरुरी है......
सरकारे गंगा को बचाने के अपने दायित्व से विरक्त हो गई है
सदा नीरा माँ गंगा को बचाना हमारा कर्तव्य ही नहीं, हमारे अस्तित्व के लिये भी अत्यन्त जरुरी है.सभी एक स्वर से भारत सरकार से मांग करते रहे कि गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के उद्देश्य से गंगा एक्ट पास किया जाय गङ्गा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया जाये नदियों के लिये कड़े नियम बनाये जाये, गङ्गा जी को जीव होने दर्जा हो तभी कुछ हो सकता है अन्यथा सब प्रयास विफल ही रहेंगे क्योकि गङ्गा जी को नदी मान कर
गंगानदी में प्रदूषण भार को कम करने के लिए 1985 मे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा गंगा कार्य योजना या गैप (GAP) का शुभारंभ किया गया था। कार्यक्रम खूब धूमधाम के साथ शुरू किया गया था, लेकिन यह 15 वर्ष की अवधि में 901.71 करोड़ (लगभग 1010) रुपये व्यय करने के बाद नदी में प्रदूषण का स्तर कम करने में विफल रहा और आज जहां से चले वही ही, बस प्रयास डोल की आवाज ही रह गये दिसंबर 2009 में, गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक £ 6000 लाख ($1 अरब) उधार देने पर सहमत हुआ था। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन का अंत करने की पहल का हिस्सा है। इससे पहले 1989 तक इसके पानी को पीने योग्य बनाने सहित, नदी को साफ करने के प्रयास विफल रहे थे क्योकि भ्र्ष्टाचार यहाँ भी हावी रहा, सरकार बदली पर भ्रष्टाचार वही रहा,2010 मे भी कुंभमेला के दौरान गंगा को साफ रखने के नाम पर बड़ी रकम निपटा दी गई,
गंगा सफाई अभियान के नाम पर 'गंगा एक्शन प्लान' के तहत हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। गंगा में प्रदूषण कम होने के बजाय गंगा और ज्यादा प्रदूषित हुई है। गंगा के नाम पर रोज नई-नई योजना-परियोजना बनाना एक तमाशा बनता जा रहा है। गंगा की सफाई पिछले 30 वर्षों से जारी है और अनुमानों के मुताबिक़ अब तक इस पर दो हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च किए जा चुके हैं मुझे याद हैं कोर्ट ने कहा था, सरकार से कहा था आपको ऐसे क़दम उठाने चाहिए ताकि गंगा अपनी 'प्रिस्टीन ग्लोरी' (पुरानी भव्यता) दोबारा हासिल करे कोर्ट हर बार कहती गई सरकारे सुनती रही परिणाम वही, जो हर बार होता है
मित्रो अब तक आप जान चुके हैं कि कितना जरुरी है गंगा को बचाना, गङ्गा नही तो हिन्दू धर्म, हिन्दू सँस्कृति नही , सँस्कृति का स्तम्भ है गंगा , मेरे जीवन माँ गङ्गा का जो महत्व है वो मैं ही जनता हूं हर पल गंगा के पावन किनारे मुझे अपनी और आकर्षित करते हैं जब भी मै अपनी यात्रा के दौरान उदास होता तो गङ्गा के किनारे मन का हौसला बढ़ाते, अध्यात्म की ऊर्जा है गंगा, लहरों के संगीत अंहद की नाड हो मानो,पूर्ण ब्रह्म रूप है गंगा, इसलिए सन्त समाज कहता है गंगा को औद्योगिक कचरे, गन्दे नालो से बचाना जरुरी है......
सरकारे गंगा को बचाने के अपने दायित्व से विरक्त हो गई है
सदा नीरा माँ गंगा को बचाना हमारा कर्तव्य ही नहीं, हमारे अस्तित्व के लिये भी अत्यन्त जरुरी है.सभी एक स्वर से भारत सरकार से मांग करते रहे कि गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के उद्देश्य से गंगा एक्ट पास किया जाय गङ्गा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया जाये नदियों के लिये कड़े नियम बनाये जाये, गङ्गा जी को जीव होने दर्जा हो तभी कुछ हो सकता है अन्यथा सब प्रयास विफल ही रहेंगे क्योकि गङ्गा जी को नदी मान कर
गंगानदी में प्रदूषण भार को कम करने के लिए 1985 मे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा गंगा कार्य योजना या गैप (GAP) का शुभारंभ किया गया था। कार्यक्रम खूब धूमधाम के साथ शुरू किया गया था, लेकिन यह 15 वर्ष की अवधि में 901.71 करोड़ (लगभग 1010) रुपये व्यय करने के बाद नदी में प्रदूषण का स्तर कम करने में विफल रहा और आज जहां से चले वही ही, बस प्रयास डोल की आवाज ही रह गये दिसंबर 2009 में, गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक £ 6000 लाख ($1 अरब) उधार देने पर सहमत हुआ था। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन का अंत करने की पहल का हिस्सा है। इससे पहले 1989 तक इसके पानी को पीने योग्य बनाने सहित, नदी को साफ करने के प्रयास विफल रहे थे क्योकि भ्र्ष्टाचार यहाँ भी हावी रहा, सरकार बदली पर भ्रष्टाचार वही रहा,2010 मे भी कुंभमेला के दौरान गंगा को साफ रखने के नाम पर बड़ी रकम निपटा दी गई,
गंगा सफाई अभियान के नाम पर 'गंगा एक्शन प्लान' के तहत हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। गंगा में प्रदूषण कम होने के बजाय गंगा और ज्यादा प्रदूषित हुई है। गंगा के नाम पर रोज नई-नई योजना-परियोजना बनाना एक तमाशा बनता जा रहा है। गंगा की सफाई पिछले 30 वर्षों से जारी है और अनुमानों के मुताबिक़ अब तक इस पर दो हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च किए जा चुके हैं मुझे याद हैं कोर्ट ने कहा था, सरकार से कहा था आपको ऐसे क़दम उठाने चाहिए ताकि गंगा अपनी 'प्रिस्टीन ग्लोरी' (पुरानी भव्यता) दोबारा हासिल करे कोर्ट हर बार कहती गई सरकारे सुनती रही परिणाम वही, जो हर बार होता है

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