मेरी गङ्गा यात्रा भाग-11
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गंगा की जो धाराएं हैं वह अपनी
बाल्यकाल और किशोर अवस्था मे है.वैज्ञानिकों की माने तो नदियों से ऐसी स्थिति में छेड़छाड़ करना उनकी हत्या के समान है.गङ्गा जी पर बनने वाले बांध , बिजली परियोजना, ये सभी कार्य गङ्गा हत्या है इसके लिये कानून मे प्रवधान होना चाहिए विकास के नाम पर किसी की हत्या करने की छूट किसी को नही होनी चाहिए , जहाँ एक और गङ्गा को माँ दर्जा दिया जाता हैं वही पहले उसे निर्मल बहने और जीवन जीने का अधिकार होना चाहिये, भारत की जीवनदायी नदी गंगा भले ही असंख्य भारतीय मन में माता का दर्जा पाती हो लेकिन जब उसके प्रति प्यार और संवेदना के साथ सोचने की ... जब उद्गम पर ही गंगा को उत्पीड़ित किया जाएगा तो नदी का भविष्य क्या होगा!
गंगा नदी को एक राष्ट्रीय नदी के रूप में घोषित किया जाए और जिस तरह से राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार गंगा को सम्मान एवं सुरक्षा प्रदान की जाए.ऐसी मेरी सोच है
यदि हम वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो गंगा क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी अपने जीवन के लिए गंगा पर निर्भर रहती है. यही कारण है कि गंगा को सभी धर्मो में भारत की भाग्य रेखा भी कहा गया है.इसलिये भी गङ्गा को बचाना अति आवश्यक है कोई भी हिन्दू धर्म मे जन्म व्यक्ति गङ्गा के महत्व से अनभिज्ञ नही है गङ्गा जीवन और मरण, सभी कार्य मे आवश्यक है यदि गङ्गा मिटी तो सोचे आप अपने पितरों का विसर्जन कहा करेंगे .? नालो मे, आचमन करना होगा तो नाले के मल युक्त जल से करेंगे, और 30 वर्षो मे गङ्गा का रूप यमुना की तरह बदरंग नालो सा हो जायेगा, न लगे तो मेरे आदरणीय मित्र दिल्ली में यमुना जी को देख तसल्ली कर सकते हैं असज से 20 वर्ष पहले गङ्गा जी तरह यमुना जी भी निर्मल बहती थीं ओर अब..? दिल्ली के विकास ने यमुना की हत्या ,विनाश कर दिया, अब गङ्गा और उनकी सहायक नदियां की बारी है कौन दोषी है सरकारे या जनता,या दोनों हॉ सभी जो मूक हो कर नदियों को मिटाता देख रहे हैं
आंकड़ों की माने तो ,1981 में अध्ययनों से पता चला कि वाराणसी से ऊर्ध्वाधर प्रवाह में, नदी के साथ-साथ प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक में जैवरासायनिक ऑक्सीजन की मांग तथा मल कोलिफोर्म गणना कम थी। पटना में गंगा के दाहिने तट से लिए गए नमूनों के 1983 में किए गए अध्ययन पुष्टि करते हैं कि एशरिकिआ कोली (escherichia coli) (ई. कोलि (E.Coli)), फीकल स्ट्रेप्टोकोकाई (Fecal streptococci) और विब्रियो कोलेरी (vibrio cholerae) जीव सोन तथा गंडक नदियों, उसी क्षेत्र में खुदे हुए कुओं और नलकूपों से लिेए गए पानी की अपेक्षा गंगा के पानी में दो से तीन गुना तेजी से मर जाते हैं और आज के आंकड़े देखै तो .?30 वर्षो मैं स्थिति नाज़ुक हो गईं हैं नदियों अंतिम साँसे ले रही, बस वेंटिलेटर पर ही माने, अब हद हो गई अब गंगा के लिए अलग मंत्रालय के साथ कड़े कानून और उनका सख्ती से पालन भी जरूरी है। मंत्रालय के तहत ऐसी एक समिति होनी चाहिए, जिसमें वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और आध्यात्मिक गुरु समाज सेवी सदस्य हों।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गंगा की जो धाराएं हैं वह अपनी
बाल्यकाल और किशोर अवस्था मे है.वैज्ञानिकों की माने तो नदियों से ऐसी स्थिति में छेड़छाड़ करना उनकी हत्या के समान है.गङ्गा जी पर बनने वाले बांध , बिजली परियोजना, ये सभी कार्य गङ्गा हत्या है इसके लिये कानून मे प्रवधान होना चाहिए विकास के नाम पर किसी की हत्या करने की छूट किसी को नही होनी चाहिए , जहाँ एक और गङ्गा को माँ दर्जा दिया जाता हैं वही पहले उसे निर्मल बहने और जीवन जीने का अधिकार होना चाहिये, भारत की जीवनदायी नदी गंगा भले ही असंख्य भारतीय मन में माता का दर्जा पाती हो लेकिन जब उसके प्रति प्यार और संवेदना के साथ सोचने की ... जब उद्गम पर ही गंगा को उत्पीड़ित किया जाएगा तो नदी का भविष्य क्या होगा!
गंगा नदी को एक राष्ट्रीय नदी के रूप में घोषित किया जाए और जिस तरह से राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार गंगा को सम्मान एवं सुरक्षा प्रदान की जाए.ऐसी मेरी सोच है
यदि हम वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो गंगा क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी अपने जीवन के लिए गंगा पर निर्भर रहती है. यही कारण है कि गंगा को सभी धर्मो में भारत की भाग्य रेखा भी कहा गया है.इसलिये भी गङ्गा को बचाना अति आवश्यक है कोई भी हिन्दू धर्म मे जन्म व्यक्ति गङ्गा के महत्व से अनभिज्ञ नही है गङ्गा जीवन और मरण, सभी कार्य मे आवश्यक है यदि गङ्गा मिटी तो सोचे आप अपने पितरों का विसर्जन कहा करेंगे .? नालो मे, आचमन करना होगा तो नाले के मल युक्त जल से करेंगे, और 30 वर्षो मे गङ्गा का रूप यमुना की तरह बदरंग नालो सा हो जायेगा, न लगे तो मेरे आदरणीय मित्र दिल्ली में यमुना जी को देख तसल्ली कर सकते हैं असज से 20 वर्ष पहले गङ्गा जी तरह यमुना जी भी निर्मल बहती थीं ओर अब..? दिल्ली के विकास ने यमुना की हत्या ,विनाश कर दिया, अब गङ्गा और उनकी सहायक नदियां की बारी है कौन दोषी है सरकारे या जनता,या दोनों हॉ सभी जो मूक हो कर नदियों को मिटाता देख रहे हैं
आंकड़ों की माने तो ,1981 में अध्ययनों से पता चला कि वाराणसी से ऊर्ध्वाधर प्रवाह में, नदी के साथ-साथ प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक में जैवरासायनिक ऑक्सीजन की मांग तथा मल कोलिफोर्म गणना कम थी। पटना में गंगा के दाहिने तट से लिए गए नमूनों के 1983 में किए गए अध्ययन पुष्टि करते हैं कि एशरिकिआ कोली (escherichia coli) (ई. कोलि (E.Coli)), फीकल स्ट्रेप्टोकोकाई (Fecal streptococci) और विब्रियो कोलेरी (vibrio cholerae) जीव सोन तथा गंडक नदियों, उसी क्षेत्र में खुदे हुए कुओं और नलकूपों से लिेए गए पानी की अपेक्षा गंगा के पानी में दो से तीन गुना तेजी से मर जाते हैं और आज के आंकड़े देखै तो .?30 वर्षो मैं स्थिति नाज़ुक हो गईं हैं नदियों अंतिम साँसे ले रही, बस वेंटिलेटर पर ही माने, अब हद हो गई अब गंगा के लिए अलग मंत्रालय के साथ कड़े कानून और उनका सख्ती से पालन भी जरूरी है। मंत्रालय के तहत ऐसी एक समिति होनी चाहिए, जिसमें वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और आध्यात्मिक गुरु समाज सेवी सदस्य हों।

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