मेरी गङ्गा यात्रा-12
मोदी सरकार के बनते ही आनन फानन मे सरकार ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाने की सोच पर अमल करते हुए जल संसाधन मंत्रालये ने इसे जन आंदोलन का रूप देने के लिए जुलाई माह में 'गंगा मंथन' कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनाई थी और बहन उमा जी ने बड़े ही जोश के साथ दो वर्षों मे गङ्गा को प्रदूषण मुक्त करने की बात की थी तभी हम बड़ी हैरान , और आश्चर्य हुआ कि बहन जी के पास कोई जिन, दिव्य शक्ति आ गईं लगती हैं शायद, जो काम 100 वर्षो मे नही हुआ वो दो वर्षों मे हो जाये, गङ्गा जी के लिये संकल्प बद्ध उमा जी को सरकारी तंत्र की अवसर शाही का नही पता,..?गङ्गा आंदोलन मैं रिश्वत खोरी सबसे बड़ा रोड़ा है
किस देश मे बिना रिश्वत के कागज की फाइल आगे नही बढ़ती वहा गङ्गा जी का पावन कार्य कैसे आगे बढ़ेगा उमा समय समय पर गङ्गा के लिये आवाज़ उठाई है भूख हड़ताले भी की है तब शायद बात और थी, सत्ता और थी आज तो सत्ता और भता सब आप और आप के सहयोगियों का है गङ्गा प्रदूषण मुक्त हो पर कागजो मे केवल न हो, केवल टी वी और सभाओ मे न हो,
तीन वर्ष मे केवल सभाये, और नामांकरण ही हुआ है ठोस कुछ है तो कहै,
साबरमती की तरह गंगा को साफ करके उसकी सूरत बदलने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं, ... राष्ट्रीय गंगा बेसिन अथॉरिटी की चार साल में संपन्न हुई तीन बैठक नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चरितार्थ करती नजर आती रही, शायद आगे भी ऐसा ही होगा
बात पर गौर करें तो गंगा की बदहाली के लिए न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकारों की उदासीनता भी उतनी ही जिम्मेदार है।जो प्रायः यहाँ मौन रहे अपनी जिम्मेदारी की बॉल केंद्र सरकार की ओर उछलते रहे गङ्गा के प्रदूषण के लिये एक दूसरे को दोषी बनाकर खुद को गङ्गा पुत्र मानते रहे
पश्चिम की गंगा यानी दमन गंगा अब अरब सागर के पानी में जहर घोल रही है जिसके चलते उथले समुद्र की मछलियां खत्म हो चुकी हैं। ... पर नदी और समुद्र के पानी में जहर घुलने के बाद मछुआरे बदहाली के शिकार हो चुके हैं। मछुवारो की माने तो बरसात में तो समुद्र में भी मरी हुई मछलियां उतराई नज़र आती हैं वही पटना शहर का बेहिसाब कचरा गंगा जी में आंखें मूंदकर बहाया जा रहा है. बड़ी शर्म की बात है 20 लाख लोगों की गंदगी से गंगा रोज़ मैली हो रही हैं और आस्था शर्मसारः
नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों की अलग से आयोजित कार्यशाला में गंगा सफाई में लगी 14 अलग-अलग एजेंसियों है पर उनके बीच समन्वय का अभाव नजर आता है ऐसा न हो कि रिटायर होने के बाद वह किताब लिखकर कहे कि ऐसा होना चाहिए था, ऐसा नहीं। हमने सरकारों को सेंकडो सुझाव दिये पर किसी ने सुनी नही अगर ऐसा ही है तो उनकी जय हो
मोदी सरकार के बनते ही आनन फानन मे सरकार ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाने की सोच पर अमल करते हुए जल संसाधन मंत्रालये ने इसे जन आंदोलन का रूप देने के लिए जुलाई माह में 'गंगा मंथन' कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनाई थी और बहन उमा जी ने बड़े ही जोश के साथ दो वर्षों मे गङ्गा को प्रदूषण मुक्त करने की बात की थी तभी हम बड़ी हैरान , और आश्चर्य हुआ कि बहन जी के पास कोई जिन, दिव्य शक्ति आ गईं लगती हैं शायद, जो काम 100 वर्षो मे नही हुआ वो दो वर्षों मे हो जाये, गङ्गा जी के लिये संकल्प बद्ध उमा जी को सरकारी तंत्र की अवसर शाही का नही पता,..?गङ्गा आंदोलन मैं रिश्वत खोरी सबसे बड़ा रोड़ा है
किस देश मे बिना रिश्वत के कागज की फाइल आगे नही बढ़ती वहा गङ्गा जी का पावन कार्य कैसे आगे बढ़ेगा उमा समय समय पर गङ्गा के लिये आवाज़ उठाई है भूख हड़ताले भी की है तब शायद बात और थी, सत्ता और थी आज तो सत्ता और भता सब आप और आप के सहयोगियों का है गङ्गा प्रदूषण मुक्त हो पर कागजो मे केवल न हो, केवल टी वी और सभाओ मे न हो,
तीन वर्ष मे केवल सभाये, और नामांकरण ही हुआ है ठोस कुछ है तो कहै,
साबरमती की तरह गंगा को साफ करके उसकी सूरत बदलने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं, ... राष्ट्रीय गंगा बेसिन अथॉरिटी की चार साल में संपन्न हुई तीन बैठक नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चरितार्थ करती नजर आती रही, शायद आगे भी ऐसा ही होगा
बात पर गौर करें तो गंगा की बदहाली के लिए न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकारों की उदासीनता भी उतनी ही जिम्मेदार है।जो प्रायः यहाँ मौन रहे अपनी जिम्मेदारी की बॉल केंद्र सरकार की ओर उछलते रहे गङ्गा के प्रदूषण के लिये एक दूसरे को दोषी बनाकर खुद को गङ्गा पुत्र मानते रहे
पश्चिम की गंगा यानी दमन गंगा अब अरब सागर के पानी में जहर घोल रही है जिसके चलते उथले समुद्र की मछलियां खत्म हो चुकी हैं। ... पर नदी और समुद्र के पानी में जहर घुलने के बाद मछुआरे बदहाली के शिकार हो चुके हैं। मछुवारो की माने तो बरसात में तो समुद्र में भी मरी हुई मछलियां उतराई नज़र आती हैं वही पटना शहर का बेहिसाब कचरा गंगा जी में आंखें मूंदकर बहाया जा रहा है. बड़ी शर्म की बात है 20 लाख लोगों की गंदगी से गंगा रोज़ मैली हो रही हैं और आस्था शर्मसारः
नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों की अलग से आयोजित कार्यशाला में गंगा सफाई में लगी 14 अलग-अलग एजेंसियों है पर उनके बीच समन्वय का अभाव नजर आता है ऐसा न हो कि रिटायर होने के बाद वह किताब लिखकर कहे कि ऐसा होना चाहिए था, ऐसा नहीं। हमने सरकारों को सेंकडो सुझाव दिये पर किसी ने सुनी नही अगर ऐसा ही है तो उनकी जय हो

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