Monday, October 2, 2017
Tuesday, June 27, 2017
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-16
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-16
"गंगा में गंदा पानी नहीं जाने देंगे" मोदी
कितना अच्छा जुममला है सुनते सुनते कान भी पक गये मानो, मोदी जी से न नराजगी है न रोष हाँ है तो शिकायत और कुछ करने की आशा, कुछ सार्थक, जो नजर आये परिणाम दिखै कुछ कड़े कदम उठाये जाये , जुर्माना लगाना हल नही है हल समाज जाग्रति ओर प्रदुषण मुक्त नदियां और भारत है पश्चिमी सभ्यता की और ताकने वाले समाज को चाहिये कि केवल पश्चिम का फैशन खाना ही न अपनाये उनसे रहन सहन देश प्रेम सही जाग्रति भी सीखे वे शहर अपनी नदियों को साफ रखना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं क्योंकि वह देश और देश की संम्पत्ति को अपना मानते है और हम.? सारी जिम्मेदारी सरकार की .? क्योंकि हम चुन कर लाये हैं किन्हें चुना है वो कहा से आये है है कहि बाहर से आये हैं.? है तो वो भी हम ही मे से एक हम जैसे निक्कमे, और हो भी क्यो न करोड़ों रुपये खर्च कर सत्ता मे आये हैं राजनीति बिजनेस है कोई मज़ाक थोड़े है बिजनेस में सेवा कैसी..?
चोर चोर मोसेरे भाई, सभी अपनी अपनी बॉल को दूसरे के पाले मे फैक देते , हम अपनी जिम्मेदारी को समझना नही चाहते जनता सरकार को दोष देती है सरकारे जनता को पर सुधरना कोई नही चाहता भारत सरकार हर बार कहती है कि गंगा नदी में प्रदूषित जल के प्रवाह पर पूरी तरह से रोक लगाई जाएगी और सिर्फ जलशोधन संयंत्र से साफ किए गए पानी को ही नदी में छोड़ा जाएगा.
इस हकीकत से किसी को सरोकार नहीं कि अब भारत में नदियों के नाम पर नाले बहते हैं. जीवनदायिनी गंगा भी इस त्रासदी की शिकार है. गंगा को मां कहकर सत्ता में आई केन्द्र सरकार ने अब गंगा और अन्य नदियों की सफाई का बीड़ा उठाया है.भारतीय संस्कारों में गंगा महज एक नदी नहीं है बल्कि आत्मा के परमात्मा से मिलन का माध्यम है. ऐसा माध्यम जिसे मृत्युलोक पर मोक्षदायिनी बनाने के लिए कठोर तप कर भागीरथ स्वर्ग से धरती पर उतार लाए थे. सदियों तक करोड़ों लोगों को मोक्ष का अहसास दिलाने वाली गंगा आज खुद अपनी ही संतानों से अपने वजूद को बचाने की प्राथर्ना कर रही है. यह विडंबना सिर्फ गंगा की नहीं बल्कि उसकी अपनी सहोदरा यमुना और देश के तमाम भागों में अपना आंचल खोलकर करोड़ों जीवन संवार रही अन्य नदियों की भी है. हिमालय से धवल रुप में उतरकर मैदान तक आते आते गंगा और यमुना सड़ांध मारते उस गंदे नाले के रूप मे परिवर्तित हो जाती हैं जिसके किनारे सिर्फ दो पल ठहरना भी दूभर हो गया है, उसके चुल्लू भर पानी में आचमन की तो बात ही छोड़िए.साहब ,
"गंगा में गंदा पानी नहीं जाने देंगे" मोदी
कितना अच्छा जुममला है सुनते सुनते कान भी पक गये मानो, मोदी जी से न नराजगी है न रोष हाँ है तो शिकायत और कुछ करने की आशा, कुछ सार्थक, जो नजर आये परिणाम दिखै कुछ कड़े कदम उठाये जाये , जुर्माना लगाना हल नही है हल समाज जाग्रति ओर प्रदुषण मुक्त नदियां और भारत है पश्चिमी सभ्यता की और ताकने वाले समाज को चाहिये कि केवल पश्चिम का फैशन खाना ही न अपनाये उनसे रहन सहन देश प्रेम सही जाग्रति भी सीखे वे शहर अपनी नदियों को साफ रखना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं क्योंकि वह देश और देश की संम्पत्ति को अपना मानते है और हम.? सारी जिम्मेदारी सरकार की .? क्योंकि हम चुन कर लाये हैं किन्हें चुना है वो कहा से आये है है कहि बाहर से आये हैं.? है तो वो भी हम ही मे से एक हम जैसे निक्कमे, और हो भी क्यो न करोड़ों रुपये खर्च कर सत्ता मे आये हैं राजनीति बिजनेस है कोई मज़ाक थोड़े है बिजनेस में सेवा कैसी..?
चोर चोर मोसेरे भाई, सभी अपनी अपनी बॉल को दूसरे के पाले मे फैक देते , हम अपनी जिम्मेदारी को समझना नही चाहते जनता सरकार को दोष देती है सरकारे जनता को पर सुधरना कोई नही चाहता भारत सरकार हर बार कहती है कि गंगा नदी में प्रदूषित जल के प्रवाह पर पूरी तरह से रोक लगाई जाएगी और सिर्फ जलशोधन संयंत्र से साफ किए गए पानी को ही नदी में छोड़ा जाएगा.
इस हकीकत से किसी को सरोकार नहीं कि अब भारत में नदियों के नाम पर नाले बहते हैं. जीवनदायिनी गंगा भी इस त्रासदी की शिकार है. गंगा को मां कहकर सत्ता में आई केन्द्र सरकार ने अब गंगा और अन्य नदियों की सफाई का बीड़ा उठाया है.भारतीय संस्कारों में गंगा महज एक नदी नहीं है बल्कि आत्मा के परमात्मा से मिलन का माध्यम है. ऐसा माध्यम जिसे मृत्युलोक पर मोक्षदायिनी बनाने के लिए कठोर तप कर भागीरथ स्वर्ग से धरती पर उतार लाए थे. सदियों तक करोड़ों लोगों को मोक्ष का अहसास दिलाने वाली गंगा आज खुद अपनी ही संतानों से अपने वजूद को बचाने की प्राथर्ना कर रही है. यह विडंबना सिर्फ गंगा की नहीं बल्कि उसकी अपनी सहोदरा यमुना और देश के तमाम भागों में अपना आंचल खोलकर करोड़ों जीवन संवार रही अन्य नदियों की भी है. हिमालय से धवल रुप में उतरकर मैदान तक आते आते गंगा और यमुना सड़ांध मारते उस गंदे नाले के रूप मे परिवर्तित हो जाती हैं जिसके किनारे सिर्फ दो पल ठहरना भी दूभर हो गया है, उसके चुल्लू भर पानी में आचमन की तो बात ही छोड़िए.साहब ,
Saturday, June 17, 2017
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-15
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-15
नदियों के किनारों पर पर्याय कब्जा करने की साजिश होती रही है सँस्कृति के आरम्भ से ही नदियों के किनारों पर शहरों का निर्माण किया जाता था क्योंकि मानव को पता था जल ही जीवन है नदियों ने कई सँस्कृति को जन्म दिया आज भी इतिहास मे उन्हें सन्मान से जाना जाता है तब से आज तक नदियों ने मानव को अपने जल से पोषित किया है पर मानव है अहसान फरामोश उसने अपनी जीवनदायिनी नदियों को ही धोखा दिया है नदियों का अंत करने पर उतारू है आज भारत मे गङ्गा आदि नदियों के मल, कचरा, नालो का जल ढोने वाले जल मार्ग मात्र रह गये है शहरों का सारा कूड़ा नदियों मे बहाया जाता हैं नदियां स्लम क्षेत्र बन गई, इतना ही नही आज नदियों की हत्या के बाद भी हम बेशर्म लोग उन नदियों पर ही निभर है दिल्ली, की यमुना हो या गङ्गा के किनारे बसे कानपुर, इलाहाबाद, आदि नालो के पानी को ही साफ कर पीते है है न कमाल, नदियों का जल है मल वो पेट मे, पेट का मल जल वो नदियों मे, सब से अधिक परेशानी प्लास्टिक के प्रयोग से है जो जल के मार्ग को अवरुद्ध करता हैं मुझे याद है कुछ वर्ष पूर्व नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने हरिद्वार जिले में पॉलीथिन की बिक्री और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात की थी । इसके लिए एनजीटी ने जिला प्रशासन व नगर निगम को निर्देश दिए थे कि पॉलीथिन को बेचने वालों पर पांच हजार का जुर्माना लगाएं। एनजीटी ने यह आदेश लोकल कमिश्नर शारिक जैदी की रिपोर्ट के आधार पर दिया था कूड़ा प्रबंधन, गंगा किनारे खुले होटल, गंगा घाटों पर फैले अतिक्रमण के मामले में एनजीटी ने सुनवाई की तिथि 22 जुलाई 14 तय की थी
हरिद्वार में जगह-जगह बिखरी पॉलीथिन, कूड़ा निस्तारण व्यवस्था, गंगा किनारे अतिक्रमण गंगा घाटों की सफाई व्यवस्था की वस्तुस्थिति देखने के लिए एनजीटी लोकल कमीश्नर शारिक जैदी को 19 जून को हरिद्वार भेजा था। हरकी पैड़ी क्षेत्र में गंदगी, अतिक्रमण को देखकर लोकल कमिश्नर ने नाराजगी जताई थी। इसके बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट एनजीटी को सौंपी थी। गुरुवार को इस पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने हरिद्वार जिले में पॉलीथिन की बिक्री व उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना था प्रेस को
कमिश्नर शारिक जैदी ने बताया था कि एनजीटी ने हरिद्वार जिले में पॉलीथिन की बिक्री व उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। आदेश का पालन करने के लिए एनजीटी ने जिला प्रशासन व नगर निगम को निर्देश दिए हैं। पर हुआ क्या सब दो दिन का शोर बनकर रह गया दो दिन बाद ही वही हाल था जो पहले था मैं भी कहा कम था मैंने भी हरिद्वार की फ़ोटो खीचकर लगा दी प्रशासन हर जगह एक सा ही है, क्यो न हो है तो वो भी इंसान,न पालीथिन का प्रयोग बंद हुआ न प्रदूषण,शहर के व्यापारी भी नही चाहते कि प्रदूषण पर सख्त कदम उठाये क्योकि इससे उनका नुकसान होता, प्रात गङ्गा जल का आचमन करने वाले तिलकदारी व्यपारी भी मानते हैं धर्म अपनी जगह है और व्यपार अपनी जगह है हरिद्वार के किनारे बने बाजारों, आश्रमों का सीधा मल गङ्गा मे जाता है कूड़ा गङ्गा किनारों पर, या पानी के साथ गङ्गा मे,
नदियों के किनारों पर पर्याय कब्जा करने की साजिश होती रही है सँस्कृति के आरम्भ से ही नदियों के किनारों पर शहरों का निर्माण किया जाता था क्योंकि मानव को पता था जल ही जीवन है नदियों ने कई सँस्कृति को जन्म दिया आज भी इतिहास मे उन्हें सन्मान से जाना जाता है तब से आज तक नदियों ने मानव को अपने जल से पोषित किया है पर मानव है अहसान फरामोश उसने अपनी जीवनदायिनी नदियों को ही धोखा दिया है नदियों का अंत करने पर उतारू है आज भारत मे गङ्गा आदि नदियों के मल, कचरा, नालो का जल ढोने वाले जल मार्ग मात्र रह गये है शहरों का सारा कूड़ा नदियों मे बहाया जाता हैं नदियां स्लम क्षेत्र बन गई, इतना ही नही आज नदियों की हत्या के बाद भी हम बेशर्म लोग उन नदियों पर ही निभर है दिल्ली, की यमुना हो या गङ्गा के किनारे बसे कानपुर, इलाहाबाद, आदि नालो के पानी को ही साफ कर पीते है है न कमाल, नदियों का जल है मल वो पेट मे, पेट का मल जल वो नदियों मे, सब से अधिक परेशानी प्लास्टिक के प्रयोग से है जो जल के मार्ग को अवरुद्ध करता हैं मुझे याद है कुछ वर्ष पूर्व नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने हरिद्वार जिले में पॉलीथिन की बिक्री और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात की थी । इसके लिए एनजीटी ने जिला प्रशासन व नगर निगम को निर्देश दिए थे कि पॉलीथिन को बेचने वालों पर पांच हजार का जुर्माना लगाएं। एनजीटी ने यह आदेश लोकल कमिश्नर शारिक जैदी की रिपोर्ट के आधार पर दिया था कूड़ा प्रबंधन, गंगा किनारे खुले होटल, गंगा घाटों पर फैले अतिक्रमण के मामले में एनजीटी ने सुनवाई की तिथि 22 जुलाई 14 तय की थी
हरिद्वार में जगह-जगह बिखरी पॉलीथिन, कूड़ा निस्तारण व्यवस्था, गंगा किनारे अतिक्रमण गंगा घाटों की सफाई व्यवस्था की वस्तुस्थिति देखने के लिए एनजीटी लोकल कमीश्नर शारिक जैदी को 19 जून को हरिद्वार भेजा था। हरकी पैड़ी क्षेत्र में गंदगी, अतिक्रमण को देखकर लोकल कमिश्नर ने नाराजगी जताई थी। इसके बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट एनजीटी को सौंपी थी। गुरुवार को इस पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने हरिद्वार जिले में पॉलीथिन की बिक्री व उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना था प्रेस को
कमिश्नर शारिक जैदी ने बताया था कि एनजीटी ने हरिद्वार जिले में पॉलीथिन की बिक्री व उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। आदेश का पालन करने के लिए एनजीटी ने जिला प्रशासन व नगर निगम को निर्देश दिए हैं। पर हुआ क्या सब दो दिन का शोर बनकर रह गया दो दिन बाद ही वही हाल था जो पहले था मैं भी कहा कम था मैंने भी हरिद्वार की फ़ोटो खीचकर लगा दी प्रशासन हर जगह एक सा ही है, क्यो न हो है तो वो भी इंसान,न पालीथिन का प्रयोग बंद हुआ न प्रदूषण,शहर के व्यापारी भी नही चाहते कि प्रदूषण पर सख्त कदम उठाये क्योकि इससे उनका नुकसान होता, प्रात गङ्गा जल का आचमन करने वाले तिलकदारी व्यपारी भी मानते हैं धर्म अपनी जगह है और व्यपार अपनी जगह है हरिद्वार के किनारे बने बाजारों, आश्रमों का सीधा मल गङ्गा मे जाता है कूड़ा गङ्गा किनारों पर, या पानी के साथ गङ्गा मे,
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-14
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-14
मित्रो अब तक आप जान चुके हैं कि कितना जरुरी है गंगा को बचाना, गङ्गा नही तो हिन्दू धर्म, हिन्दू सँस्कृति नही , सँस्कृति का स्तम्भ है गंगा , मेरे जीवन माँ गङ्गा का जो महत्व है वो मैं ही जनता हूं हर पल गंगा के पावन किनारे मुझे अपनी और आकर्षित करते हैं जब भी मै अपनी यात्रा के दौरान उदास होता तो गङ्गा के किनारे मन का हौसला बढ़ाते, अध्यात्म की ऊर्जा है गंगा, लहरों के संगीत अंहद की नाड हो मानो,पूर्ण ब्रह्म रूप है गंगा, इसलिए सन्त समाज कहता है गंगा को औद्योगिक कचरे, गन्दे नालो से बचाना जरुरी है......
सरकारे गंगा को बचाने के अपने दायित्व से विरक्त हो गई है
सदा नीरा माँ गंगा को बचाना हमारा कर्तव्य ही नहीं, हमारे अस्तित्व के लिये भी अत्यन्त जरुरी है.सभी एक स्वर से भारत सरकार से मांग करते रहे कि गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के उद्देश्य से गंगा एक्ट पास किया जाय गङ्गा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया जाये नदियों के लिये कड़े नियम बनाये जाये, गङ्गा जी को जीव होने दर्जा हो तभी कुछ हो सकता है अन्यथा सब प्रयास विफल ही रहेंगे क्योकि गङ्गा जी को नदी मान कर
गंगानदी में प्रदूषण भार को कम करने के लिए 1985 मे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा गंगा कार्य योजना या गैप (GAP) का शुभारंभ किया गया था। कार्यक्रम खूब धूमधाम के साथ शुरू किया गया था, लेकिन यह 15 वर्ष की अवधि में 901.71 करोड़ (लगभग 1010) रुपये व्यय करने के बाद नदी में प्रदूषण का स्तर कम करने में विफल रहा और आज जहां से चले वही ही, बस प्रयास डोल की आवाज ही रह गये दिसंबर 2009 में, गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक £ 6000 लाख ($1 अरब) उधार देने पर सहमत हुआ था। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन का अंत करने की पहल का हिस्सा है। इससे पहले 1989 तक इसके पानी को पीने योग्य बनाने सहित, नदी को साफ करने के प्रयास विफल रहे थे क्योकि भ्र्ष्टाचार यहाँ भी हावी रहा, सरकार बदली पर भ्रष्टाचार वही रहा,2010 मे भी कुंभमेला के दौरान गंगा को साफ रखने के नाम पर बड़ी रकम निपटा दी गई,
गंगा सफाई अभियान के नाम पर 'गंगा एक्शन प्लान' के तहत हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। गंगा में प्रदूषण कम होने के बजाय गंगा और ज्यादा प्रदूषित हुई है। गंगा के नाम पर रोज नई-नई योजना-परियोजना बनाना एक तमाशा बनता जा रहा है। गंगा की सफाई पिछले 30 वर्षों से जारी है और अनुमानों के मुताबिक़ अब तक इस पर दो हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च किए जा चुके हैं मुझे याद हैं कोर्ट ने कहा था, सरकार से कहा था आपको ऐसे क़दम उठाने चाहिए ताकि गंगा अपनी 'प्रिस्टीन ग्लोरी' (पुरानी भव्यता) दोबारा हासिल करे कोर्ट हर बार कहती गई सरकारे सुनती रही परिणाम वही, जो हर बार होता है
मित्रो अब तक आप जान चुके हैं कि कितना जरुरी है गंगा को बचाना, गङ्गा नही तो हिन्दू धर्म, हिन्दू सँस्कृति नही , सँस्कृति का स्तम्भ है गंगा , मेरे जीवन माँ गङ्गा का जो महत्व है वो मैं ही जनता हूं हर पल गंगा के पावन किनारे मुझे अपनी और आकर्षित करते हैं जब भी मै अपनी यात्रा के दौरान उदास होता तो गङ्गा के किनारे मन का हौसला बढ़ाते, अध्यात्म की ऊर्जा है गंगा, लहरों के संगीत अंहद की नाड हो मानो,पूर्ण ब्रह्म रूप है गंगा, इसलिए सन्त समाज कहता है गंगा को औद्योगिक कचरे, गन्दे नालो से बचाना जरुरी है......
सरकारे गंगा को बचाने के अपने दायित्व से विरक्त हो गई है
सदा नीरा माँ गंगा को बचाना हमारा कर्तव्य ही नहीं, हमारे अस्तित्व के लिये भी अत्यन्त जरुरी है.सभी एक स्वर से भारत सरकार से मांग करते रहे कि गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के उद्देश्य से गंगा एक्ट पास किया जाय गङ्गा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया जाये नदियों के लिये कड़े नियम बनाये जाये, गङ्गा जी को जीव होने दर्जा हो तभी कुछ हो सकता है अन्यथा सब प्रयास विफल ही रहेंगे क्योकि गङ्गा जी को नदी मान कर
गंगानदी में प्रदूषण भार को कम करने के लिए 1985 मे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा गंगा कार्य योजना या गैप (GAP) का शुभारंभ किया गया था। कार्यक्रम खूब धूमधाम के साथ शुरू किया गया था, लेकिन यह 15 वर्ष की अवधि में 901.71 करोड़ (लगभग 1010) रुपये व्यय करने के बाद नदी में प्रदूषण का स्तर कम करने में विफल रहा और आज जहां से चले वही ही, बस प्रयास डोल की आवाज ही रह गये दिसंबर 2009 में, गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक £ 6000 लाख ($1 अरब) उधार देने पर सहमत हुआ था। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन का अंत करने की पहल का हिस्सा है। इससे पहले 1989 तक इसके पानी को पीने योग्य बनाने सहित, नदी को साफ करने के प्रयास विफल रहे थे क्योकि भ्र्ष्टाचार यहाँ भी हावी रहा, सरकार बदली पर भ्रष्टाचार वही रहा,2010 मे भी कुंभमेला के दौरान गंगा को साफ रखने के नाम पर बड़ी रकम निपटा दी गई,
गंगा सफाई अभियान के नाम पर 'गंगा एक्शन प्लान' के तहत हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। गंगा में प्रदूषण कम होने के बजाय गंगा और ज्यादा प्रदूषित हुई है। गंगा के नाम पर रोज नई-नई योजना-परियोजना बनाना एक तमाशा बनता जा रहा है। गंगा की सफाई पिछले 30 वर्षों से जारी है और अनुमानों के मुताबिक़ अब तक इस पर दो हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च किए जा चुके हैं मुझे याद हैं कोर्ट ने कहा था, सरकार से कहा था आपको ऐसे क़दम उठाने चाहिए ताकि गंगा अपनी 'प्रिस्टीन ग्लोरी' (पुरानी भव्यता) दोबारा हासिल करे कोर्ट हर बार कहती गई सरकारे सुनती रही परिणाम वही, जो हर बार होता है
मेरी गङ्गा यात्रा-13
मेरी गङ्गा यात्रा-13
मित्रों पिछले भागो मे आपको गङ्गा जी के दर्द से अवगत करने की मैंने कोशिश की है पर गङ्गा जी का दर्द असहनीय है जो उनके अपने ही पूजने वाले समाज की देन है ऐसे मे गङ्गा किस
को कुछ नही करती, माँ जो ठहरी, गङ्गा जी का घाव अब नासूर होने की ओर बढ़ रहा है अभी प्रयास नही हुआ तो गङ्गा जी अमृत से मृत हो जायेगी बिना परिश्रम के मिली गङ्गा का मूल्य हम क्या जाने ,इतिहास मे कृपया पूर्व मे जाकर भगीरथ और उसके पूर्वजों से पुछो, क्या है गङ्गा का मोल..? गङ्गा जी की एक एक बूंद को तरसते मृत परिजनों से पूछो या अपने ही मृत पूर्वजो से पूछो क्या है गङ्गा , जिसके बिना न जीवित की गति है न मृत की सत गति है फिर भी न जाने कौन सी हींन भावना है जो सत्य से मुख मोड़ रहे हैं ऐसा भी क्या सैक्युलर होना जो नदियों ही निगल जाये, कैसे है धर्म के जानकार , गङ्गा के पूजने वाले जो मिटती गङ्गा को देख रहे हैं या गङ्गा पुत्र
पूत कपूत हो पर माता कुमाता कभी न कहलावै.......
पिछले वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को ऐसे संयंत्रों की संख्या, इनके लिए मंगाई गई निविदाओं और मौजूदा संयंत्रों की स्थिति पर रिपोर्ट देने के लिए भी कहा था इस बेंच में जस्टिस ठाकुर के अलावा जस्टिस आरके अग्रवाल और ए के गोयल भी शामिल थे मैंने अखबारों मे पढ़ा कि न्यायालय में पर्यावरणविद एम सी मेहता की ओर से गंगा की सफाई के बारे में डाली गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई हो रही हैं
2500 किलोमीटर लंबी गंगा की सफाई के लिए नदी के तट पर बसे 118 नगरपालिकाओं की शनाख्त की जा रही है जो प्रदूषण के कारक है जहां वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सहित पूरी साफ सफाई का लक्ष्य हासिल किया जाये वही खबर यह थी कि मकर संक्रांति के दिन गंगा नदी में सौ से अधिक लाशें मिलने के बाद सामने आया है कि कुछ समुदायों के लोग मृतकों को जलाने के बदले लाशें नदी में बहा देते हैं. केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश की सरकार से गंगा नदी में मिली उन लाशों पर रिपोर्ट भी मांगी थी पर हुआ क्या .? सब गोलम गोल,कौन खोले पोल, चार पहर का शोर मात्र रहा फिर गहरी खामोशी , और गङ्गा अपने दर्द के साथ अकेली
इस बीच एक बार फिर कोई जागा, आवाज उठी,गंगा के अलावा दूसरी नदियों को भी साफ रखने के लिए कदम उठाए जाने की बात हुई नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी ने यमुना में पूजा और निर्माण सामग्री तथा अन्य कचरा डाले जाने पर 50 हजार रूपये तक का जुर्माना लगाने का निर्देश दिया है आपको लगता है यह उचित कदम है मेरी निगाह मैं कोरी मूर्खतापूर्ण पर्यास है.नदियाँ पूजा के कचरे से नही नालो और आधोगिक कचरे से प्रदूषित है , प्रदूषित है सरकार की अनदेखी से,..
जुर्माना सरकारों पर भी लगे जिन शहरों से नदियो मैं मल मूत्र, आधोगिक कचरा नदियों को प्रदूषित कर रहा है यदि सामान्य जन पर जुर्माना 50 हज़ार है तो सरकार पर 50 करोड़ हो वही पएनजीटी ने कड़े निर्देश देते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से औद्योगिक इकाईयों को नदी में कचरा बहाने की इजाजत नहीं देने को कहा था पर आज भी प्रदूषण बा-दस्तूर जारी है देश के बेडा गर्क की तैयारी है
पिछले 10वर्षो मे गङ्गा बचाने के लिये आम भारतीय बहुत हद तक जाग्रत हो चूका लगता हैं कुछ जाग्रति आती लगती हैं पर लोग सामर्थ वान नही है पर जाग्रत है नही जागे तो हमारे चुने सांसद व् विधायक ये सामर्थवान है पर जागरूक नही.,,
1986-1992 के दौरान भारतीय विषाक्तता अनुसंधान केंद्र (ITRC), लखनऊ द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला कि ऋषिकेश, इलाहाबाद जिला और दक्षिणेश्वर में गंगा नदी के जल में पारे की वार्षिक सघनता क्रमशः 0.081, 0.043, तथा 0.012 और पीपीबी (ppb) थी।
मैं हरिहर वेला...
सोचा,जीवन ये कुछ काम में आवे..
माँ गंगा ने पुखे तारे..
हम काे गंगा बचाये
, हम गंगा काे बचाये
आओ संकल्प ले हम गंगा काे
मित्रों पिछले भागो मे आपको गङ्गा जी के दर्द से अवगत करने की मैंने कोशिश की है पर गङ्गा जी का दर्द असहनीय है जो उनके अपने ही पूजने वाले समाज की देन है ऐसे मे गङ्गा किस
को कुछ नही करती, माँ जो ठहरी, गङ्गा जी का घाव अब नासूर होने की ओर बढ़ रहा है अभी प्रयास नही हुआ तो गङ्गा जी अमृत से मृत हो जायेगी बिना परिश्रम के मिली गङ्गा का मूल्य हम क्या जाने ,इतिहास मे कृपया पूर्व मे जाकर भगीरथ और उसके पूर्वजों से पुछो, क्या है गङ्गा का मोल..? गङ्गा जी की एक एक बूंद को तरसते मृत परिजनों से पूछो या अपने ही मृत पूर्वजो से पूछो क्या है गङ्गा , जिसके बिना न जीवित की गति है न मृत की सत गति है फिर भी न जाने कौन सी हींन भावना है जो सत्य से मुख मोड़ रहे हैं ऐसा भी क्या सैक्युलर होना जो नदियों ही निगल जाये, कैसे है धर्म के जानकार , गङ्गा के पूजने वाले जो मिटती गङ्गा को देख रहे हैं या गङ्गा पुत्र
पूत कपूत हो पर माता कुमाता कभी न कहलावै.......
पिछले वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को ऐसे संयंत्रों की संख्या, इनके लिए मंगाई गई निविदाओं और मौजूदा संयंत्रों की स्थिति पर रिपोर्ट देने के लिए भी कहा था इस बेंच में जस्टिस ठाकुर के अलावा जस्टिस आरके अग्रवाल और ए के गोयल भी शामिल थे मैंने अखबारों मे पढ़ा कि न्यायालय में पर्यावरणविद एम सी मेहता की ओर से गंगा की सफाई के बारे में डाली गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई हो रही हैं
2500 किलोमीटर लंबी गंगा की सफाई के लिए नदी के तट पर बसे 118 नगरपालिकाओं की शनाख्त की जा रही है जो प्रदूषण के कारक है जहां वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सहित पूरी साफ सफाई का लक्ष्य हासिल किया जाये वही खबर यह थी कि मकर संक्रांति के दिन गंगा नदी में सौ से अधिक लाशें मिलने के बाद सामने आया है कि कुछ समुदायों के लोग मृतकों को जलाने के बदले लाशें नदी में बहा देते हैं. केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश की सरकार से गंगा नदी में मिली उन लाशों पर रिपोर्ट भी मांगी थी पर हुआ क्या .? सब गोलम गोल,कौन खोले पोल, चार पहर का शोर मात्र रहा फिर गहरी खामोशी , और गङ्गा अपने दर्द के साथ अकेली
इस बीच एक बार फिर कोई जागा, आवाज उठी,गंगा के अलावा दूसरी नदियों को भी साफ रखने के लिए कदम उठाए जाने की बात हुई नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी ने यमुना में पूजा और निर्माण सामग्री तथा अन्य कचरा डाले जाने पर 50 हजार रूपये तक का जुर्माना लगाने का निर्देश दिया है आपको लगता है यह उचित कदम है मेरी निगाह मैं कोरी मूर्खतापूर्ण पर्यास है.नदियाँ पूजा के कचरे से नही नालो और आधोगिक कचरे से प्रदूषित है , प्रदूषित है सरकार की अनदेखी से,..
जुर्माना सरकारों पर भी लगे जिन शहरों से नदियो मैं मल मूत्र, आधोगिक कचरा नदियों को प्रदूषित कर रहा है यदि सामान्य जन पर जुर्माना 50 हज़ार है तो सरकार पर 50 करोड़ हो वही पएनजीटी ने कड़े निर्देश देते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से औद्योगिक इकाईयों को नदी में कचरा बहाने की इजाजत नहीं देने को कहा था पर आज भी प्रदूषण बा-दस्तूर जारी है देश के बेडा गर्क की तैयारी है
पिछले 10वर्षो मे गङ्गा बचाने के लिये आम भारतीय बहुत हद तक जाग्रत हो चूका लगता हैं कुछ जाग्रति आती लगती हैं पर लोग सामर्थ वान नही है पर जाग्रत है नही जागे तो हमारे चुने सांसद व् विधायक ये सामर्थवान है पर जागरूक नही.,,
1986-1992 के दौरान भारतीय विषाक्तता अनुसंधान केंद्र (ITRC), लखनऊ द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला कि ऋषिकेश, इलाहाबाद जिला और दक्षिणेश्वर में गंगा नदी के जल में पारे की वार्षिक सघनता क्रमशः 0.081, 0.043, तथा 0.012 और पीपीबी (ppb) थी।
मैं हरिहर वेला...
सोचा,जीवन ये कुछ काम में आवे..
माँ गंगा ने पुखे तारे..
हम काे गंगा बचाये
, हम गंगा काे बचाये
आओ संकल्प ले हम गंगा काे
मेरी गङ्गा यात्रा-12
मेरी गङ्गा यात्रा-12
मोदी सरकार के बनते ही आनन फानन मे सरकार ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाने की सोच पर अमल करते हुए जल संसाधन मंत्रालये ने इसे जन आंदोलन का रूप देने के लिए जुलाई माह में 'गंगा मंथन' कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनाई थी और बहन उमा जी ने बड़े ही जोश के साथ दो वर्षों मे गङ्गा को प्रदूषण मुक्त करने की बात की थी तभी हम बड़ी हैरान , और आश्चर्य हुआ कि बहन जी के पास कोई जिन, दिव्य शक्ति आ गईं लगती हैं शायद, जो काम 100 वर्षो मे नही हुआ वो दो वर्षों मे हो जाये, गङ्गा जी के लिये संकल्प बद्ध उमा जी को सरकारी तंत्र की अवसर शाही का नही पता,..?गङ्गा आंदोलन मैं रिश्वत खोरी सबसे बड़ा रोड़ा है
किस देश मे बिना रिश्वत के कागज की फाइल आगे नही बढ़ती वहा गङ्गा जी का पावन कार्य कैसे आगे बढ़ेगा उमा समय समय पर गङ्गा के लिये आवाज़ उठाई है भूख हड़ताले भी की है तब शायद बात और थी, सत्ता और थी आज तो सत्ता और भता सब आप और आप के सहयोगियों का है गङ्गा प्रदूषण मुक्त हो पर कागजो मे केवल न हो, केवल टी वी और सभाओ मे न हो,
तीन वर्ष मे केवल सभाये, और नामांकरण ही हुआ है ठोस कुछ है तो कहै,
साबरमती की तरह गंगा को साफ करके उसकी सूरत बदलने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं, ... राष्ट्रीय गंगा बेसिन अथॉरिटी की चार साल में संपन्न हुई तीन बैठक नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चरितार्थ करती नजर आती रही, शायद आगे भी ऐसा ही होगा
बात पर गौर करें तो गंगा की बदहाली के लिए न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकारों की उदासीनता भी उतनी ही जिम्मेदार है।जो प्रायः यहाँ मौन रहे अपनी जिम्मेदारी की बॉल केंद्र सरकार की ओर उछलते रहे गङ्गा के प्रदूषण के लिये एक दूसरे को दोषी बनाकर खुद को गङ्गा पुत्र मानते रहे
पश्चिम की गंगा यानी दमन गंगा अब अरब सागर के पानी में जहर घोल रही है जिसके चलते उथले समुद्र की मछलियां खत्म हो चुकी हैं। ... पर नदी और समुद्र के पानी में जहर घुलने के बाद मछुआरे बदहाली के शिकार हो चुके हैं। मछुवारो की माने तो बरसात में तो समुद्र में भी मरी हुई मछलियां उतराई नज़र आती हैं वही पटना शहर का बेहिसाब कचरा गंगा जी में आंखें मूंदकर बहाया जा रहा है. बड़ी शर्म की बात है 20 लाख लोगों की गंदगी से गंगा रोज़ मैली हो रही हैं और आस्था शर्मसारः
नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों की अलग से आयोजित कार्यशाला में गंगा सफाई में लगी 14 अलग-अलग एजेंसियों है पर उनके बीच समन्वय का अभाव नजर आता है ऐसा न हो कि रिटायर होने के बाद वह किताब लिखकर कहे कि ऐसा होना चाहिए था, ऐसा नहीं। हमने सरकारों को सेंकडो सुझाव दिये पर किसी ने सुनी नही अगर ऐसा ही है तो उनकी जय हो
मोदी सरकार के बनते ही आनन फानन मे सरकार ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाने की सोच पर अमल करते हुए जल संसाधन मंत्रालये ने इसे जन आंदोलन का रूप देने के लिए जुलाई माह में 'गंगा मंथन' कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनाई थी और बहन उमा जी ने बड़े ही जोश के साथ दो वर्षों मे गङ्गा को प्रदूषण मुक्त करने की बात की थी तभी हम बड़ी हैरान , और आश्चर्य हुआ कि बहन जी के पास कोई जिन, दिव्य शक्ति आ गईं लगती हैं शायद, जो काम 100 वर्षो मे नही हुआ वो दो वर्षों मे हो जाये, गङ्गा जी के लिये संकल्प बद्ध उमा जी को सरकारी तंत्र की अवसर शाही का नही पता,..?गङ्गा आंदोलन मैं रिश्वत खोरी सबसे बड़ा रोड़ा है
किस देश मे बिना रिश्वत के कागज की फाइल आगे नही बढ़ती वहा गङ्गा जी का पावन कार्य कैसे आगे बढ़ेगा उमा समय समय पर गङ्गा के लिये आवाज़ उठाई है भूख हड़ताले भी की है तब शायद बात और थी, सत्ता और थी आज तो सत्ता और भता सब आप और आप के सहयोगियों का है गङ्गा प्रदूषण मुक्त हो पर कागजो मे केवल न हो, केवल टी वी और सभाओ मे न हो,
तीन वर्ष मे केवल सभाये, और नामांकरण ही हुआ है ठोस कुछ है तो कहै,
साबरमती की तरह गंगा को साफ करके उसकी सूरत बदलने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं, ... राष्ट्रीय गंगा बेसिन अथॉरिटी की चार साल में संपन्न हुई तीन बैठक नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चरितार्थ करती नजर आती रही, शायद आगे भी ऐसा ही होगा
बात पर गौर करें तो गंगा की बदहाली के लिए न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकारों की उदासीनता भी उतनी ही जिम्मेदार है।जो प्रायः यहाँ मौन रहे अपनी जिम्मेदारी की बॉल केंद्र सरकार की ओर उछलते रहे गङ्गा के प्रदूषण के लिये एक दूसरे को दोषी बनाकर खुद को गङ्गा पुत्र मानते रहे
पश्चिम की गंगा यानी दमन गंगा अब अरब सागर के पानी में जहर घोल रही है जिसके चलते उथले समुद्र की मछलियां खत्म हो चुकी हैं। ... पर नदी और समुद्र के पानी में जहर घुलने के बाद मछुआरे बदहाली के शिकार हो चुके हैं। मछुवारो की माने तो बरसात में तो समुद्र में भी मरी हुई मछलियां उतराई नज़र आती हैं वही पटना शहर का बेहिसाब कचरा गंगा जी में आंखें मूंदकर बहाया जा रहा है. बड़ी शर्म की बात है 20 लाख लोगों की गंदगी से गंगा रोज़ मैली हो रही हैं और आस्था शर्मसारः
नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों की अलग से आयोजित कार्यशाला में गंगा सफाई में लगी 14 अलग-अलग एजेंसियों है पर उनके बीच समन्वय का अभाव नजर आता है ऐसा न हो कि रिटायर होने के बाद वह किताब लिखकर कहे कि ऐसा होना चाहिए था, ऐसा नहीं। हमने सरकारों को सेंकडो सुझाव दिये पर किसी ने सुनी नही अगर ऐसा ही है तो उनकी जय हो
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-11
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-11
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गंगा की जो धाराएं हैं वह अपनी
बाल्यकाल और किशोर अवस्था मे है.वैज्ञानिकों की माने तो नदियों से ऐसी स्थिति में छेड़छाड़ करना उनकी हत्या के समान है.गङ्गा जी पर बनने वाले बांध , बिजली परियोजना, ये सभी कार्य गङ्गा हत्या है इसके लिये कानून मे प्रवधान होना चाहिए विकास के नाम पर किसी की हत्या करने की छूट किसी को नही होनी चाहिए , जहाँ एक और गङ्गा को माँ दर्जा दिया जाता हैं वही पहले उसे निर्मल बहने और जीवन जीने का अधिकार होना चाहिये, भारत की जीवनदायी नदी गंगा भले ही असंख्य भारतीय मन में माता का दर्जा पाती हो लेकिन जब उसके प्रति प्यार और संवेदना के साथ सोचने की ... जब उद्गम पर ही गंगा को उत्पीड़ित किया जाएगा तो नदी का भविष्य क्या होगा!
गंगा नदी को एक राष्ट्रीय नदी के रूप में घोषित किया जाए और जिस तरह से राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार गंगा को सम्मान एवं सुरक्षा प्रदान की जाए.ऐसी मेरी सोच है
यदि हम वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो गंगा क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी अपने जीवन के लिए गंगा पर निर्भर रहती है. यही कारण है कि गंगा को सभी धर्मो में भारत की भाग्य रेखा भी कहा गया है.इसलिये भी गङ्गा को बचाना अति आवश्यक है कोई भी हिन्दू धर्म मे जन्म व्यक्ति गङ्गा के महत्व से अनभिज्ञ नही है गङ्गा जीवन और मरण, सभी कार्य मे आवश्यक है यदि गङ्गा मिटी तो सोचे आप अपने पितरों का विसर्जन कहा करेंगे .? नालो मे, आचमन करना होगा तो नाले के मल युक्त जल से करेंगे, और 30 वर्षो मे गङ्गा का रूप यमुना की तरह बदरंग नालो सा हो जायेगा, न लगे तो मेरे आदरणीय मित्र दिल्ली में यमुना जी को देख तसल्ली कर सकते हैं असज से 20 वर्ष पहले गङ्गा जी तरह यमुना जी भी निर्मल बहती थीं ओर अब..? दिल्ली के विकास ने यमुना की हत्या ,विनाश कर दिया, अब गङ्गा और उनकी सहायक नदियां की बारी है कौन दोषी है सरकारे या जनता,या दोनों हॉ सभी जो मूक हो कर नदियों को मिटाता देख रहे हैं
आंकड़ों की माने तो ,1981 में अध्ययनों से पता चला कि वाराणसी से ऊर्ध्वाधर प्रवाह में, नदी के साथ-साथ प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक में जैवरासायनिक ऑक्सीजन की मांग तथा मल कोलिफोर्म गणना कम थी। पटना में गंगा के दाहिने तट से लिए गए नमूनों के 1983 में किए गए अध्ययन पुष्टि करते हैं कि एशरिकिआ कोली (escherichia coli) (ई. कोलि (E.Coli)), फीकल स्ट्रेप्टोकोकाई (Fecal streptococci) और विब्रियो कोलेरी (vibrio cholerae) जीव सोन तथा गंडक नदियों, उसी क्षेत्र में खुदे हुए कुओं और नलकूपों से लिेए गए पानी की अपेक्षा गंगा के पानी में दो से तीन गुना तेजी से मर जाते हैं और आज के आंकड़े देखै तो .?30 वर्षो मैं स्थिति नाज़ुक हो गईं हैं नदियों अंतिम साँसे ले रही, बस वेंटिलेटर पर ही माने, अब हद हो गई अब गंगा के लिए अलग मंत्रालय के साथ कड़े कानून और उनका सख्ती से पालन भी जरूरी है। मंत्रालय के तहत ऐसी एक समिति होनी चाहिए, जिसमें वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और आध्यात्मिक गुरु समाज सेवी सदस्य हों।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गंगा की जो धाराएं हैं वह अपनी
बाल्यकाल और किशोर अवस्था मे है.वैज्ञानिकों की माने तो नदियों से ऐसी स्थिति में छेड़छाड़ करना उनकी हत्या के समान है.गङ्गा जी पर बनने वाले बांध , बिजली परियोजना, ये सभी कार्य गङ्गा हत्या है इसके लिये कानून मे प्रवधान होना चाहिए विकास के नाम पर किसी की हत्या करने की छूट किसी को नही होनी चाहिए , जहाँ एक और गङ्गा को माँ दर्जा दिया जाता हैं वही पहले उसे निर्मल बहने और जीवन जीने का अधिकार होना चाहिये, भारत की जीवनदायी नदी गंगा भले ही असंख्य भारतीय मन में माता का दर्जा पाती हो लेकिन जब उसके प्रति प्यार और संवेदना के साथ सोचने की ... जब उद्गम पर ही गंगा को उत्पीड़ित किया जाएगा तो नदी का भविष्य क्या होगा!
गंगा नदी को एक राष्ट्रीय नदी के रूप में घोषित किया जाए और जिस तरह से राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार गंगा को सम्मान एवं सुरक्षा प्रदान की जाए.ऐसी मेरी सोच है
यदि हम वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो गंगा क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी अपने जीवन के लिए गंगा पर निर्भर रहती है. यही कारण है कि गंगा को सभी धर्मो में भारत की भाग्य रेखा भी कहा गया है.इसलिये भी गङ्गा को बचाना अति आवश्यक है कोई भी हिन्दू धर्म मे जन्म व्यक्ति गङ्गा के महत्व से अनभिज्ञ नही है गङ्गा जीवन और मरण, सभी कार्य मे आवश्यक है यदि गङ्गा मिटी तो सोचे आप अपने पितरों का विसर्जन कहा करेंगे .? नालो मे, आचमन करना होगा तो नाले के मल युक्त जल से करेंगे, और 30 वर्षो मे गङ्गा का रूप यमुना की तरह बदरंग नालो सा हो जायेगा, न लगे तो मेरे आदरणीय मित्र दिल्ली में यमुना जी को देख तसल्ली कर सकते हैं असज से 20 वर्ष पहले गङ्गा जी तरह यमुना जी भी निर्मल बहती थीं ओर अब..? दिल्ली के विकास ने यमुना की हत्या ,विनाश कर दिया, अब गङ्गा और उनकी सहायक नदियां की बारी है कौन दोषी है सरकारे या जनता,या दोनों हॉ सभी जो मूक हो कर नदियों को मिटाता देख रहे हैं
आंकड़ों की माने तो ,1981 में अध्ययनों से पता चला कि वाराणसी से ऊर्ध्वाधर प्रवाह में, नदी के साथ-साथ प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक में जैवरासायनिक ऑक्सीजन की मांग तथा मल कोलिफोर्म गणना कम थी। पटना में गंगा के दाहिने तट से लिए गए नमूनों के 1983 में किए गए अध्ययन पुष्टि करते हैं कि एशरिकिआ कोली (escherichia coli) (ई. कोलि (E.Coli)), फीकल स्ट्रेप्टोकोकाई (Fecal streptococci) और विब्रियो कोलेरी (vibrio cholerae) जीव सोन तथा गंडक नदियों, उसी क्षेत्र में खुदे हुए कुओं और नलकूपों से लिेए गए पानी की अपेक्षा गंगा के पानी में दो से तीन गुना तेजी से मर जाते हैं और आज के आंकड़े देखै तो .?30 वर्षो मैं स्थिति नाज़ुक हो गईं हैं नदियों अंतिम साँसे ले रही, बस वेंटिलेटर पर ही माने, अब हद हो गई अब गंगा के लिए अलग मंत्रालय के साथ कड़े कानून और उनका सख्ती से पालन भी जरूरी है। मंत्रालय के तहत ऐसी एक समिति होनी चाहिए, जिसमें वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और आध्यात्मिक गुरु समाज सेवी सदस्य हों।
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-10
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-10
हिमालय के शिखर गोमुख से निकलकर बंगाल की खाड़ी में मिलने वाली माँ गंगा भारतवासियों के लिए धार्मिक एकता, श्रद्धा, सनातन महत्व, आध्यात्मिक,मुक्ति दायनी और पतितपावनी के रूप में परम् पूज्य है. इसमें दो राय नहीं कि इसके तट पर हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का विकास हुआ है गङ्गा जी के तट पर इतिहास की नामी हस्तियों ने जन्म लिया,
पतित पावनी गङ्गा जी ने अपनी धारा से अपने क्षेत्रो उपजाऊ बना दिया , जहाँ जहाँ से गङ्गा जी गुजरी वहां की सँस्कृति का इतिहास मे अपना नाम था, वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो गंगा क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी अपने जीवन के लिए गंगा पर निर्भर रहती है. यही कारण है कि गंगा को सभी धर्मो में भारत की भाग्य रेखा भी कहा गया है. दूसरे शब्दों मे ''गङ्गा है तो हम है गङ्गा नही तो हमारा अस्तित्व भी नही,,
यदि गङ्गा व उनकी सहायक नदियों युही प्रदूषित होती रही तो निश्चित ही 35 करोड़ लोगों का अस्तित्व भी मिटा जायेगा, सभी शहरों का अस्तित्व गङ्गा जी के दम पर है सभी तीर्थ स्थलों की महत्ता गङ्गा जी के कारण है गङ्गा जी नही तो तीर्थ नही, पर्यटन नही, व्यापार नही, क्या आपको नही लगता मित्रों ऐसी अनमोल दैव्य धरोहर को बचाना चाहिये कागजो मे नही,प्रयास हो सार्थक, सच्ची से, यदि मोदी जी की सेना के 300 संसद व छै छै विधायक अगर एक एक जिला को भी सम्भाले तो गङ्गा प्रदूषण की समस्या 2 वर्ष मे ठीक हो जायेगी, पर राज नेता कहा गङ्गा जी का दर्द समझते हैं वो तो वही समझेगा जो गङ्गा को ह्रदय से माँ मानता होगा गङ्गा जी को नदी मानने वाले कहा गङ्गा जी पीड़ा समझेगे,
गंगा के तट अमीरो के लिये पिकनिक स्पोर्ट है
खाओ पियो गंद मचाओ, मस्ती मौज मनाओ
गरीब भी कहा कम है तीर्थ के नाम पर
कपडे धोओ गङ्गा मे मैल मिलाओ
गंगा के तट मल-मूत्र का डेर लगाओ
जूठन,उतरन गंगा मे छोड़ पाप मिटाओ
हो गई गंगा मैली दोष गंगा पर लगाओ
है ग़र शर्म थोड़ी तो डूब चुल्लू मर् जाओ,.....
अब तो बस गंगा संरक्षण कानून बना चाहिये, इसके लिये कठोर कदम उठाने होंगे गंगा में गिरने वाले सभी गंदे नाले, मल-मूत्र और औद्योगिक प्रदूषण को तुरंत प्रभाव से रोका जाए. गंगा संरक्षण हेतु राष्ट्रीय गंगा आयोग गठित किया जाए. गंगा का शोषण किसी भी रूप में नहीं किया जाए.
हिमालय के शिखर गोमुख से निकलकर बंगाल की खाड़ी में मिलने वाली माँ गंगा भारतवासियों के लिए धार्मिक एकता, श्रद्धा, सनातन महत्व, आध्यात्मिक,मुक्ति दायनी और पतितपावनी के रूप में परम् पूज्य है. इसमें दो राय नहीं कि इसके तट पर हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का विकास हुआ है गङ्गा जी के तट पर इतिहास की नामी हस्तियों ने जन्म लिया,
पतित पावनी गङ्गा जी ने अपनी धारा से अपने क्षेत्रो उपजाऊ बना दिया , जहाँ जहाँ से गङ्गा जी गुजरी वहां की सँस्कृति का इतिहास मे अपना नाम था, वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो गंगा क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी अपने जीवन के लिए गंगा पर निर्भर रहती है. यही कारण है कि गंगा को सभी धर्मो में भारत की भाग्य रेखा भी कहा गया है. दूसरे शब्दों मे ''गङ्गा है तो हम है गङ्गा नही तो हमारा अस्तित्व भी नही,,
यदि गङ्गा व उनकी सहायक नदियों युही प्रदूषित होती रही तो निश्चित ही 35 करोड़ लोगों का अस्तित्व भी मिटा जायेगा, सभी शहरों का अस्तित्व गङ्गा जी के दम पर है सभी तीर्थ स्थलों की महत्ता गङ्गा जी के कारण है गङ्गा जी नही तो तीर्थ नही, पर्यटन नही, व्यापार नही, क्या आपको नही लगता मित्रों ऐसी अनमोल दैव्य धरोहर को बचाना चाहिये कागजो मे नही,प्रयास हो सार्थक, सच्ची से, यदि मोदी जी की सेना के 300 संसद व छै छै विधायक अगर एक एक जिला को भी सम्भाले तो गङ्गा प्रदूषण की समस्या 2 वर्ष मे ठीक हो जायेगी, पर राज नेता कहा गङ्गा जी का दर्द समझते हैं वो तो वही समझेगा जो गङ्गा को ह्रदय से माँ मानता होगा गङ्गा जी को नदी मानने वाले कहा गङ्गा जी पीड़ा समझेगे,
गंगा के तट अमीरो के लिये पिकनिक स्पोर्ट है
खाओ पियो गंद मचाओ, मस्ती मौज मनाओ
गरीब भी कहा कम है तीर्थ के नाम पर
कपडे धोओ गङ्गा मे मैल मिलाओ
गंगा के तट मल-मूत्र का डेर लगाओ
जूठन,उतरन गंगा मे छोड़ पाप मिटाओ
हो गई गंगा मैली दोष गंगा पर लगाओ
है ग़र शर्म थोड़ी तो डूब चुल्लू मर् जाओ,.....
अब तो बस गंगा संरक्षण कानून बना चाहिये, इसके लिये कठोर कदम उठाने होंगे गंगा में गिरने वाले सभी गंदे नाले, मल-मूत्र और औद्योगिक प्रदूषण को तुरंत प्रभाव से रोका जाए. गंगा संरक्षण हेतु राष्ट्रीय गंगा आयोग गठित किया जाए. गंगा का शोषण किसी भी रूप में नहीं किया जाए.
Wednesday, May 17, 2017
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-9
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-9
जाने क्यू गङ्गा जी की दशा देख कर भारतीयों का मन नही पसीजता, क्यू लोग बूत बेसुध होकर जी रहे है जो गङ्गा करोड़ों जीवो की प्राण रेखा है वह अपने ही पुत्रों की मार झेल रही , या यू कहो अंतिम साँसे ले रही हैं क्या माँ गङ्गा जी का कोई उपचार नही है अब और नही अब सार्थक प्रयास हो बस सार्थक, झूठे वादे और व्यर्थता का प्रयास दिखावा न हो,
ऐसे दिखावे के काम हर बार कुछ कुछ कुछ समय मैं होते रहे हैं पर परिणाम तो शून्य ही हर बार रहा मित्रो 3साल पहले मोदी जी प्रधानमंत्री बने, राजीव गांधी की तर्ज़ पर गङ्गा जीको बचाने के लिये फ़ौज बना दी गई , ख्वाव देखना आरम्भ होगी 2019 तक गङ्गा को प्रदूषण मुक्त करने का कार्यक्रम बना, पर कितने प्रतिशत गङ्गा प्रदूषण मुक्त हुई..? क्या आपको ऐसा लगता है कि 2 अक्टूबर 2019 में " नमामि - गङ्गे " प्रोजेक्ट सहित हमारा भारत, साफ - सुथरा हो जाएगा ? मुझे तो ऐसा दिख रहा है - कि 2019 क्या 2029 तक भी, हमारी गङ्गा और हमारा भारत, साफ - सुथरा नहीं हो सकता । अब आप ही बताइए .माननीय मोदी जी कागज की नाव, और कागज पर प्रोजेक्ट ,किस काम के,मोदी जी लँगड़े घोड़े रेस नही जीतते, बस मीटिंग पर मीटिंग, और उस मीटिंग के लिये मीटिंग, चाय पार्टी बहुत हो चुका , अब मन की बात नही, जतन करने की बात हो। अधिकारी कहते हैं
मोदी जी के ड्रीम प्रोजेक्ट गंगा सफाई अभियान का एक्शन प्लान तैयार हो गया है।अथार्त (कागज की नाव तैयार ) हैं पर ऐसे प्लान राजीव गांधी ने भी आनन फानन मे बनाये थे क्या हुआ बस अधिकारी ही बदले सोच नही, इस अभियान में अब तक हजारों करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं पर अब तक गंगा साफ नहीं हुई, बल्कि उलटे और मैली हो गई है। गंगा सफाई अभियान के नाम पर 'गंगा एक्शन प्लान' के तहत हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। गंगा में प्रदूषण कम होने के बजाय गंगा और ज्यादा प्रदूषित हुई है। गंगा के नाम पर रोज नई-नई योजना-परियोजना बनाना एक तमाशा बनता जा रहा है और जनता तमाशबीन, मात्र,मोदी जी शायद आपको जानकारी होगी की हमारी गंगा की पहचान दुनिया की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक के रूप में की जाने लगी हैं आंकड़े कहते है और यूईसीपीसीबी (UECPCB) अध्ययन के अनुसार, जबकि पानी में मौजूद कोलिफोर्म (coliform) का स्तर पीने के प्रयोजन के लिए 50 से नीचे, नहाने के लिए 500 से नीचे तथा कृषि उपयोग के लिए 5000 से कम होना चाहिए- हरिद्वार में गंगा में कोलिफोर्म का वर्तमान स्तर 5500 पहुंच चुका है। और कितना इन्तजार करेंगे साहब, जब सब समाप्त हो जायेगा
कोलिफोर्म (coliform), घुलित ऑक्सीजन और जैव रासायनिक ऑक्सीजन के स्तर के आधार पर, अध्ययन ने पानी को ए, बी, सी और डी श्रेणियों में विभाजित किया है। जबकि श्रेणी ए पीने के लिए, बी नहाने के लिए, सी कृषि के लिए और डी अत्यधिक प्रदूषण स्तर के लिए उपयुक्त माना गया। बस एक मानक और बनाना डबल ज़ेड,?क्योंकि जल्दी ही ऐसा मानक चाहिए चूंकि हरिद्वार में गंगा जल में 5000 से अधिक कोलिफोर्म (coliform) है और यहां तक कि जल में घुली हुई ऑक्सीजन और जैव रासायनिक ऑक्सीजन का स्तर निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है, इसे श्रेणी डी में रखा गया है।
अध्ययन के अनुसार, गंगा में कोलिफोर्म (coliform) के उच्च स्तर का मुख्य कारण इसके गौमुख में शुरुआती बिंदु से इसके ऋषिकेश के माध्यम से हरिद्वार पहुँचने तक मानव मल, मूत्र और मलजल का नदी में सीधा निपटान है।एक अनुमान के अनुसार सनातन द्वारा पवित्र मानी जाने वाली गङ्गा जी में बीस लाख लोग रोजाना धार्मिक स्नान करते हैं।इस गङ्गा नदी के आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व की तुलना प्राचीन मिस्र वासियों के लिए नील नदी के महत्त्व से की जा सकती है। जबकि गंगा को पवित्र माना जाता है। यहां गङ्गा रासायनिक कचरे, नाली के पानी मल मूत्र और मानव व पशुओं की लाशों के अवशेषों से भरी हुई है और गंदे पानी में सीधे नहाने से ( संक्रमण) अथवा इसका जल पीने से स्वास्थ्य संबंधी बड़े खतरे हैं
कुछ समय पूर्व नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया था कि गंगा नदी की सफाई सरकार के इसी कार्यकाल में पूरी हो जाएगी. प्रमुख सरकारी वकील ने अदालत से कहा कि केंद्र सरकार 2018 तक यह महात्वाकांक्षी परियोजना पूरी करेगी. तो मेरी सरकार 2018 भी आने वाला है जनता को अवगत कराये कहा तक आपकी सरकार सफल रही शुद्ध गङ्गा के बिना हिंदुस्तान का विकास अधूरा है साहब,
वही गौ मॉस को खाने वालो के देश मे गङ्गा शुद्ध करने सोच वैसै ही है जैसे भैंस के आगे बीन बजाना
जहाँ खुद को हिंदू कहने वाले ही गौ मॉस खाते, गौ हत्या का समर्थन करते हो उस देश और समाज़ को कोई मिटने से कोई बचा सकता..?
ऐसे दिखावे के काम हर बार कुछ कुछ कुछ समय मैं होते रहे हैं पर परिणाम तो शून्य ही हर बार रहा मित्रो 3साल पहले मोदी जी प्रधानमंत्री बने, राजीव गांधी की तर्ज़ पर गङ्गा जीको बचाने के लिये फ़ौज बना दी गई , ख्वाव देखना आरम्भ होगी 2019 तक गङ्गा को प्रदूषण मुक्त करने का कार्यक्रम बना, पर कितने प्रतिशत गङ्गा प्रदूषण मुक्त हुई..? क्या आपको ऐसा लगता है कि 2 अक्टूबर 2019 में " नमामि - गङ्गे " प्रोजेक्ट सहित हमारा भारत, साफ - सुथरा हो जाएगा ? मुझे तो ऐसा दिख रहा है - कि 2019 क्या 2029 तक भी, हमारी गङ्गा और हमारा भारत, साफ - सुथरा नहीं हो सकता । अब आप ही बताइए .माननीय मोदी जी कागज की नाव, और कागज पर प्रोजेक्ट ,किस काम के,मोदी जी लँगड़े घोड़े रेस नही जीतते, बस मीटिंग पर मीटिंग, और उस मीटिंग के लिये मीटिंग, चाय पार्टी बहुत हो चुका , अब मन की बात नही, जतन करने की बात हो। अधिकारी कहते हैं
मोदी जी के ड्रीम प्रोजेक्ट गंगा सफाई अभियान का एक्शन प्लान तैयार हो गया है।अथार्त (कागज की नाव तैयार ) हैं पर ऐसे प्लान राजीव गांधी ने भी आनन फानन मे बनाये थे क्या हुआ बस अधिकारी ही बदले सोच नही, इस अभियान में अब तक हजारों करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं पर अब तक गंगा साफ नहीं हुई, बल्कि उलटे और मैली हो गई है। गंगा सफाई अभियान के नाम पर 'गंगा एक्शन प्लान' के तहत हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। गंगा में प्रदूषण कम होने के बजाय गंगा और ज्यादा प्रदूषित हुई है। गंगा के नाम पर रोज नई-नई योजना-परियोजना बनाना एक तमाशा बनता जा रहा है और जनता तमाशबीन, मात्र,मोदी जी शायद आपको जानकारी होगी की हमारी गंगा की पहचान दुनिया की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक के रूप में की जाने लगी हैं आंकड़े कहते है और यूईसीपीसीबी (UECPCB) अध्ययन के अनुसार, जबकि पानी में मौजूद कोलिफोर्म (coliform) का स्तर पीने के प्रयोजन के लिए 50 से नीचे, नहाने के लिए 500 से नीचे तथा कृषि उपयोग के लिए 5000 से कम होना चाहिए- हरिद्वार में गंगा में कोलिफोर्म का वर्तमान स्तर 5500 पहुंच चुका है। और कितना इन्तजार करेंगे साहब, जब सब समाप्त हो जायेगा
कोलिफोर्म (coliform), घुलित ऑक्सीजन और जैव रासायनिक ऑक्सीजन के स्तर के आधार पर, अध्ययन ने पानी को ए, बी, सी और डी श्रेणियों में विभाजित किया है। जबकि श्रेणी ए पीने के लिए, बी नहाने के लिए, सी कृषि के लिए और डी अत्यधिक प्रदूषण स्तर के लिए उपयुक्त माना गया। बस एक मानक और बनाना डबल ज़ेड,?क्योंकि जल्दी ही ऐसा मानक चाहिए चूंकि हरिद्वार में गंगा जल में 5000 से अधिक कोलिफोर्म (coliform) है और यहां तक कि जल में घुली हुई ऑक्सीजन और जैव रासायनिक ऑक्सीजन का स्तर निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है, इसे श्रेणी डी में रखा गया है।
अध्ययन के अनुसार, गंगा में कोलिफोर्म (coliform) के उच्च स्तर का मुख्य कारण इसके गौमुख में शुरुआती बिंदु से इसके ऋषिकेश के माध्यम से हरिद्वार पहुँचने तक मानव मल, मूत्र और मलजल का नदी में सीधा निपटान है।एक अनुमान के अनुसार सनातन द्वारा पवित्र मानी जाने वाली गङ्गा जी में बीस लाख लोग रोजाना धार्मिक स्नान करते हैं।इस गङ्गा नदी के आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व की तुलना प्राचीन मिस्र वासियों के लिए नील नदी के महत्त्व से की जा सकती है। जबकि गंगा को पवित्र माना जाता है। यहां गङ्गा रासायनिक कचरे, नाली के पानी मल मूत्र और मानव व पशुओं की लाशों के अवशेषों से भरी हुई है और गंदे पानी में सीधे नहाने से ( संक्रमण) अथवा इसका जल पीने से स्वास्थ्य संबंधी बड़े खतरे हैं
कुछ समय पूर्व नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया था कि गंगा नदी की सफाई सरकार के इसी कार्यकाल में पूरी हो जाएगी. प्रमुख सरकारी वकील ने अदालत से कहा कि केंद्र सरकार 2018 तक यह महात्वाकांक्षी परियोजना पूरी करेगी. तो मेरी सरकार 2018 भी आने वाला है जनता को अवगत कराये कहा तक आपकी सरकार सफल रही शुद्ध गङ्गा के बिना हिंदुस्तान का विकास अधूरा है साहब,
वही गौ मॉस को खाने वालो के देश मे गङ्गा शुद्ध करने सोच वैसै ही है जैसे भैंस के आगे बीन बजाना
जहाँ खुद को हिंदू कहने वाले ही गौ मॉस खाते, गौ हत्या का समर्थन करते हो उस देश और समाज़ को कोई मिटने से कोई बचा सकता..?
मेरी गङ्गा यात्रा -8
मेरी गङ्गा यात्रा -8
भारत के सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक गङ्गा जी की क्रमिक हत्या को रही है। गंगा की मुख्य सहायक नदी, यमुना नदी का एक खंड कम से कम एक दशक तक जलीय जीव विहीन रहा है। हरियाणा से यमुना जी का जल नालो का रूप लेने लगता हैं और दिल्ली मे पहुंचकर कृष्ण की प्रिय यमुना काली, बदबूदार, विषैली हो जाती हैं कृष्ण के काल मे काली नाग ने यमुना मे जहर घोलने की कोशिश की थी पर कृष्ण जी न यमुना जी की कालिया से रक्षा की आज शहरी विकास नामक कालिया नाग ने यमुना जी को जहरीला बना दिया है उस काल मे धृतराष्ट्र अंधे थे आज के धृतराष्ट्र तो उसकी तरह आंखों पर पट्टी बंदकर बैठे है ,दिल्ली सरकार हो या केंद्र सरकार किसी को यमुना की स्थिति नजर नही आती , तो गङ्गा जी का क्या कहना
.....हरीहर वो भगीरथ भी एक इंसान था जो धरा पर गङ्गा को लाया हमने क्या अपना फर्ज निभाया हम ने तो बस थोड़े लालच को गङ्गा मे ज़हर बस ज़हर मिलाया इस विकास विकास के नारे ने सारा क्लेश कराया.........
समझ से परे है यह कौन-सी नीति है कि पहले आप गंगा की धारा में जहर डालो और फिर उसे शुद्ध करने के लिए परियोजनाएं लाओ। उस पर भारी-भरकम खर्च करते रहो होना तो यह चाहिए कि गंगा में जहर ही क्यो जाए। अगर जहर जाएगा ही नहीं तो फिर सफाई की ऐसी भारी योजना की स्थायी आवश्यकता कहां से रह जाएगी पर भृष्ट सरकारी तंत्र का खाली पेट कैसे भरेगा,..? नेताओ का भला और राजनीतिक मुददों का क्या होगा मोदी जी तो ऐसे ही सत्ता मे आये है,.. खैर छोड़ो
इस सच्चाई से किसी को परेहज नहीं कि भारत में नदियों के नाम पर अब नाले बहते हैं. जीवनदायिनी गंगा भी इस त्रासदी की शिकार है. गंगा को मां कहकर सत्ता में आई केन्द्र सरकार ने अब गंगा और अन्य नदियों की सफाई का बीड़ा उठाया पर सभी कार्यवाही कागजो पर है.भारतीय संस्कारों में गंगा महज एक नदी नहीं है बल्कि आत्मा के परमात्मा से मिलन का माध्यम है. ऐसा माध्यम जिसे मृत्युलोक पर मोक्षदायिनी बनाने के लिए कठोर तप कर भागीरथ स्वर्ग से धरती पर उतार लाए थे.सदियों सदियों तक करोड़ों लोगों को मोक्ष का अहसास दिलाने वाली गंगा आज खुद अपनी ही संतानों से अपने अस्तित्व को बचाने की प्राथर्ना कर रही है. यह विडंबना सिर्फ गंगा की नहीं बल्कि उसकी अपनी सहोदरा यमुना और देश के तमाम भागों में अपना आंचल खोलकर करोड़ों जीवन संवार रही अन्य नदियों की भी है...जीने मिटा कर हम सुख का अहसास ले रहे हैं..
हिमालय से विशाल रुप में कलकल करती मैदान तक आते आते गंगा और यमुना गंदे नालो का रूप हो जाती हैं जिसके किनारो पर सिर्फ दो पल ठहरना भी कठिन हो गया है,फिर मित्रों उसके चुल्लू भर पानी में आचमन की तो बात ही छोड़िए.
केंद्र सरकार और उमा जी भी जानती कि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में 138 गंदे नाले गंगा में रोजना 6087 मिलियन लीटर से अधिक गंदगी, मल,विषैला, कचरा बहाया जाता है,..
गंगा और इसकी सहयोगी नदियों में 140 बड़े नाले गिर रहे हैं, जो गंगा को स्वच्छ बनाने में बाधक हैं। जब तक इन नालो का कुछ प्रबन्ध नही होता किसी का बाप भी गङ्गा जी व सहयोगी नदियों का बचा नही सकता,.
हर बार लगने वाले कुंभ मेले में बजते गीत 'गंगा तेरा पानी अमृत', मानो हम सन्तों को चिड़ा रहा हो कि करोड़ो सन्तों के होते गङ्गा प्रदूषित व असहाय है भले ही गाने कुंभ के धार्मिक माहौल को उत्सव का रूप देने में सहयोग कर रहे थे लेकिन गंगा जल के प्रदूषण का स्तर श्रद्धालुओं की आस्था पर भारी पर रहा था..वही नशे मे चूर लोगो से क्या आशा हो सकती हैं
गंगानदी में प्रदूषण भार को कम करने के लिए 1985 में राजीव गांधी द्वारा गंगा कार्य योजना या गैप (GAP) का शुभारंभ किया गया था। कार्यक्रम खूब धूमधाम के साथ शुरू किया गया था, लेकिन यह 15 वर्ष की अवधि में 901.71 करोड़ (लगभग 1010) रुपये व्यय करने के बाद नदी में प्रदूषण का स्तर कम करने में विफल रहा बस पैसा का नाश ही हुआ, विद्वानों की माने तो इतने में गङ्गा सोने की हो जाती पर गङ्गा सोनिया की रह गई दिसंबर 2009 में, गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक £ 6000 लाख ($1 अरब) उधार देने पर सहमत हुआ था। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन का अंत करने की पहल का हिस्सा है। इससे पहले 1989 तक इसके पानी को पीने योग्य बनाने सहित, नदी को साफ करने के प्रयास विफल रहे थे सभी प्रयास धाक के तीन पात ही रहे, और गङ्गा विषैली पर विषैली होती गई विज्ञानिको की माने तो आने वाले समय में
गंगा सूख जाएगी और गंगा के प्रवाह क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी का जीवन और भारत की अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी
भारत के सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक गङ्गा जी की क्रमिक हत्या को रही है। गंगा की मुख्य सहायक नदी, यमुना नदी का एक खंड कम से कम एक दशक तक जलीय जीव विहीन रहा है। हरियाणा से यमुना जी का जल नालो का रूप लेने लगता हैं और दिल्ली मे पहुंचकर कृष्ण की प्रिय यमुना काली, बदबूदार, विषैली हो जाती हैं कृष्ण के काल मे काली नाग ने यमुना मे जहर घोलने की कोशिश की थी पर कृष्ण जी न यमुना जी की कालिया से रक्षा की आज शहरी विकास नामक कालिया नाग ने यमुना जी को जहरीला बना दिया है उस काल मे धृतराष्ट्र अंधे थे आज के धृतराष्ट्र तो उसकी तरह आंखों पर पट्टी बंदकर बैठे है ,दिल्ली सरकार हो या केंद्र सरकार किसी को यमुना की स्थिति नजर नही आती , तो गङ्गा जी का क्या कहना
.....हरीहर वो भगीरथ भी एक इंसान था जो धरा पर गङ्गा को लाया हमने क्या अपना फर्ज निभाया हम ने तो बस थोड़े लालच को गङ्गा मे ज़हर बस ज़हर मिलाया इस विकास विकास के नारे ने सारा क्लेश कराया.........
समझ से परे है यह कौन-सी नीति है कि पहले आप गंगा की धारा में जहर डालो और फिर उसे शुद्ध करने के लिए परियोजनाएं लाओ। उस पर भारी-भरकम खर्च करते रहो होना तो यह चाहिए कि गंगा में जहर ही क्यो जाए। अगर जहर जाएगा ही नहीं तो फिर सफाई की ऐसी भारी योजना की स्थायी आवश्यकता कहां से रह जाएगी पर भृष्ट सरकारी तंत्र का खाली पेट कैसे भरेगा,..? नेताओ का भला और राजनीतिक मुददों का क्या होगा मोदी जी तो ऐसे ही सत्ता मे आये है,.. खैर छोड़ो
इस सच्चाई से किसी को परेहज नहीं कि भारत में नदियों के नाम पर अब नाले बहते हैं. जीवनदायिनी गंगा भी इस त्रासदी की शिकार है. गंगा को मां कहकर सत्ता में आई केन्द्र सरकार ने अब गंगा और अन्य नदियों की सफाई का बीड़ा उठाया पर सभी कार्यवाही कागजो पर है.भारतीय संस्कारों में गंगा महज एक नदी नहीं है बल्कि आत्मा के परमात्मा से मिलन का माध्यम है. ऐसा माध्यम जिसे मृत्युलोक पर मोक्षदायिनी बनाने के लिए कठोर तप कर भागीरथ स्वर्ग से धरती पर उतार लाए थे.सदियों सदियों तक करोड़ों लोगों को मोक्ष का अहसास दिलाने वाली गंगा आज खुद अपनी ही संतानों से अपने अस्तित्व को बचाने की प्राथर्ना कर रही है. यह विडंबना सिर्फ गंगा की नहीं बल्कि उसकी अपनी सहोदरा यमुना और देश के तमाम भागों में अपना आंचल खोलकर करोड़ों जीवन संवार रही अन्य नदियों की भी है...जीने मिटा कर हम सुख का अहसास ले रहे हैं..
हिमालय से विशाल रुप में कलकल करती मैदान तक आते आते गंगा और यमुना गंदे नालो का रूप हो जाती हैं जिसके किनारो पर सिर्फ दो पल ठहरना भी कठिन हो गया है,फिर मित्रों उसके चुल्लू भर पानी में आचमन की तो बात ही छोड़िए.
केंद्र सरकार और उमा जी भी जानती कि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में 138 गंदे नाले गंगा में रोजना 6087 मिलियन लीटर से अधिक गंदगी, मल,विषैला, कचरा बहाया जाता है,..
गंगा और इसकी सहयोगी नदियों में 140 बड़े नाले गिर रहे हैं, जो गंगा को स्वच्छ बनाने में बाधक हैं। जब तक इन नालो का कुछ प्रबन्ध नही होता किसी का बाप भी गङ्गा जी व सहयोगी नदियों का बचा नही सकता,.
हर बार लगने वाले कुंभ मेले में बजते गीत 'गंगा तेरा पानी अमृत', मानो हम सन्तों को चिड़ा रहा हो कि करोड़ो सन्तों के होते गङ्गा प्रदूषित व असहाय है भले ही गाने कुंभ के धार्मिक माहौल को उत्सव का रूप देने में सहयोग कर रहे थे लेकिन गंगा जल के प्रदूषण का स्तर श्रद्धालुओं की आस्था पर भारी पर रहा था..वही नशे मे चूर लोगो से क्या आशा हो सकती हैं
गंगानदी में प्रदूषण भार को कम करने के लिए 1985 में राजीव गांधी द्वारा गंगा कार्य योजना या गैप (GAP) का शुभारंभ किया गया था। कार्यक्रम खूब धूमधाम के साथ शुरू किया गया था, लेकिन यह 15 वर्ष की अवधि में 901.71 करोड़ (लगभग 1010) रुपये व्यय करने के बाद नदी में प्रदूषण का स्तर कम करने में विफल रहा बस पैसा का नाश ही हुआ, विद्वानों की माने तो इतने में गङ्गा सोने की हो जाती पर गङ्गा सोनिया की रह गई दिसंबर 2009 में, गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक £ 6000 लाख ($1 अरब) उधार देने पर सहमत हुआ था। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन का अंत करने की पहल का हिस्सा है। इससे पहले 1989 तक इसके पानी को पीने योग्य बनाने सहित, नदी को साफ करने के प्रयास विफल रहे थे सभी प्रयास धाक के तीन पात ही रहे, और गङ्गा विषैली पर विषैली होती गई विज्ञानिको की माने तो आने वाले समय में
गंगा सूख जाएगी और गंगा के प्रवाह क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी का जीवन और भारत की अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी
Monday, May 15, 2017
मेरी गङ्गा यात्रा भाग -7
मेरी गङ्गा यात्रा भाग -7
मित्रो हम सभी मन से चाहते हैं गङ्गा जी और भारत की सभी नदियाँ प्रदूषण मुक्त हो, इसके लिये सभी मन से प्राथर्ना करते हैं
पर इसके साथ प्रण करना होगा कि हम नदियों मे मल का जल, कचरा नहीडालेंगे और नही अपने उधोगो का विषैला पानी नदियों मे जाने देंगे संगठित} हो कर नदियोँ मे जाने वाले नालो का समाधान निकालने के लिये} राज्य, व केंद्र सरकारों पर दबाब बनायेंगे ऐसा न हो एक तरफ हम पूजा करते रहे तो दूसरी तरफ गंगा में गंदगी फेंक रहे. एक ही पुल .आपके कानपुर सीसामउ के इस नाले से रोज 14 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में इसी रफ्तार से गिरता है. .गंगा को मैली करने का 80 प्रतिशत दोषी मलमूत्र वाला वो गंदा पानी है जो 400 करोड़ लीटर प्रतिदिन की दर से गंगा में गिरता है. धन्य है छोरा गङ्गा किनारे वाला, धन्य है पुर्व के धर्मपुत्र धुरंदर जो गङ्गा का नाश होता देख रहे है सबसे अधिक नाश कानपुर में चमड़ा फैक्ट्री ने किया है जो गंगा को जहरीला बना रहा है
कानपुर को भारत का मैनचेस्टर भी कहा जाता है. यहां के उद्योगों के कारण. लेकिन यही उद्योग कानुपर में गंगा को मैला और जहरीला कर रहे हैं.मैंने अपनी आँखों से देखा कानपुर मे गङ्गा का जल काला दुर्गंध युक्त हो जाता है कानपुर मे शायद गङ्ग प्रेमी नही है या उन्हें काली और मैली गङ्गा ही अच्छी लगती है सीसामउ के नाले से रोज 14 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में इसी रफ्तार से गिरता है. इसमें फैक्टरियों से निकलने वाला पानी भी 90 लाख लीटर गंदा पानी शामिल हैं जिसमें कई खतरनाक रसायन होते हैं. कानपुर में करीब 700 फैक्ट्रियां हैं जिनमें से करीब सौ को खतरनाक माना गया है. चमड़ा फैक्टरी मालिकों का कहना है कि कानपुर में जितना गंदा पानी गंगा में गिरता है उसमें चमड़ा फैक्टरियों का योगदान सिर्फ आठ फीसद ही है वो भी साफ करके ही गंगा में डाला जाता है.
कानपुर से जुड़े लोगों का माने तो गैप वन और JOUR में करोड़ों रूपया खर्च होने के बाद भी जहरीले रसायन पानी गंगा
में जा रहा है मोदी सरकार की नमामि गंगे के तहत फैक्टरियों के लिए एक हजार करोड़ रुपये रखे गये थे.इनसे गंदे पानी का साफ करने के संयंत्र भी लगने थे और साथ ही नई तकनीक पर भी पैसा खर्च होना था पर क्या हुआ..? . मकसद ये है कि फैक्टरियों में ही गंदे पानी को एक हद तक साफ किया जा सके। कानपुर में अब तक के अनुभव यही है कि पैसा खर्च होने के बाद भी गंगा साफ नहीं हुई है. कानपुर में गंगा में गंदगी की वजह है नाले मे बदल रही हैं
गंगा को मैली करने का 80 प्रतिशत दोषी मलमूत्र वाला वो गंदा पानी है जो 400 करोड़ लीटर प्रतिदिन की दर से गंगा में गिरता है. आपको जानकर हैरानी होगी की गंगा में गंदे नालों को छोड़ने की शुरुआत एक सरकारी आदेश से हुई थी. माने तो यह गङ्गा को मिटाने का षड्यंत्र ही था 1932 से हुई शुरूआत आज गंगा के लिए मुसीबत बन गई है.आज 85 वर्षो से ब दस्तूर जारी है जब की मालवीय जी ने गङ्गा जी के दर्द को समझकर 1911 मे गङ्गा जी को बचाने के लिये आवाज उठाई थी तो,भी सरकारी आदेश क्यो दिया गया ? कारण हिन्दू सँस्कृति को मिटा है तो गङ्गा को मिटाना परम् आवश्यक है कानपुर की चमड़ा फैक्ट्री ने किया है गंगा को सबसे जहरीला कानपुर को भारत का मैनचेस्टर भी कहा जाता है. यहां के उद्योगों के कारण. लेकिन यही उद्योग कानुपर में गंगा को मैला और जहरीला कर रहे है
मित्रो हम सभी मन से चाहते हैं गङ्गा जी और भारत की सभी नदियाँ प्रदूषण मुक्त हो, इसके लिये सभी मन से प्राथर्ना करते हैं
पर इसके साथ प्रण करना होगा कि हम नदियों मे मल का जल, कचरा नहीडालेंगे और नही अपने उधोगो का विषैला पानी नदियों मे जाने देंगे संगठित} हो कर नदियोँ मे जाने वाले नालो का समाधान निकालने के लिये} राज्य, व केंद्र सरकारों पर दबाब बनायेंगे ऐसा न हो एक तरफ हम पूजा करते रहे तो दूसरी तरफ गंगा में गंदगी फेंक रहे. एक ही पुल .आपके कानपुर सीसामउ के इस नाले से रोज 14 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में इसी रफ्तार से गिरता है. .गंगा को मैली करने का 80 प्रतिशत दोषी मलमूत्र वाला वो गंदा पानी है जो 400 करोड़ लीटर प्रतिदिन की दर से गंगा में गिरता है. धन्य है छोरा गङ्गा किनारे वाला, धन्य है पुर्व के धर्मपुत्र धुरंदर जो गङ्गा का नाश होता देख रहे है सबसे अधिक नाश कानपुर में चमड़ा फैक्ट्री ने किया है जो गंगा को जहरीला बना रहा है
कानपुर को भारत का मैनचेस्टर भी कहा जाता है. यहां के उद्योगों के कारण. लेकिन यही उद्योग कानुपर में गंगा को मैला और जहरीला कर रहे हैं.मैंने अपनी आँखों से देखा कानपुर मे गङ्गा का जल काला दुर्गंध युक्त हो जाता है कानपुर मे शायद गङ्ग प्रेमी नही है या उन्हें काली और मैली गङ्गा ही अच्छी लगती है सीसामउ के नाले से रोज 14 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में इसी रफ्तार से गिरता है. इसमें फैक्टरियों से निकलने वाला पानी भी 90 लाख लीटर गंदा पानी शामिल हैं जिसमें कई खतरनाक रसायन होते हैं. कानपुर में करीब 700 फैक्ट्रियां हैं जिनमें से करीब सौ को खतरनाक माना गया है. चमड़ा फैक्टरी मालिकों का कहना है कि कानपुर में जितना गंदा पानी गंगा में गिरता है उसमें चमड़ा फैक्टरियों का योगदान सिर्फ आठ फीसद ही है वो भी साफ करके ही गंगा में डाला जाता है.
कानपुर से जुड़े लोगों का माने तो गैप वन और JOUR में करोड़ों रूपया खर्च होने के बाद भी जहरीले रसायन पानी गंगा
में जा रहा है मोदी सरकार की नमामि गंगे के तहत फैक्टरियों के लिए एक हजार करोड़ रुपये रखे गये थे.इनसे गंदे पानी का साफ करने के संयंत्र भी लगने थे और साथ ही नई तकनीक पर भी पैसा खर्च होना था पर क्या हुआ..? . मकसद ये है कि फैक्टरियों में ही गंदे पानी को एक हद तक साफ किया जा सके। कानपुर में अब तक के अनुभव यही है कि पैसा खर्च होने के बाद भी गंगा साफ नहीं हुई है. कानपुर में गंगा में गंदगी की वजह है नाले मे बदल रही हैं
गंगा को मैली करने का 80 प्रतिशत दोषी मलमूत्र वाला वो गंदा पानी है जो 400 करोड़ लीटर प्रतिदिन की दर से गंगा में गिरता है. आपको जानकर हैरानी होगी की गंगा में गंदे नालों को छोड़ने की शुरुआत एक सरकारी आदेश से हुई थी. माने तो यह गङ्गा को मिटाने का षड्यंत्र ही था 1932 से हुई शुरूआत आज गंगा के लिए मुसीबत बन गई है.आज 85 वर्षो से ब दस्तूर जारी है जब की मालवीय जी ने गङ्गा जी के दर्द को समझकर 1911 मे गङ्गा जी को बचाने के लिये आवाज उठाई थी तो,भी सरकारी आदेश क्यो दिया गया ? कारण हिन्दू सँस्कृति को मिटा है तो गङ्गा को मिटाना परम् आवश्यक है कानपुर की चमड़ा फैक्ट्री ने किया है गंगा को सबसे जहरीला कानपुर को भारत का मैनचेस्टर भी कहा जाता है. यहां के उद्योगों के कारण. लेकिन यही उद्योग कानुपर में गंगा को मैला और जहरीला कर रहे है
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-6
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-6
मेरी अध्यात्म यात्रा का मुख्य पड़ाव उत्तराखण्ड ही था विशेष रूप से उत्तरकाशी से ऊपर वह स्थान जो गङ्गा जी के साथ के थे, भटवाड़ी,पराशर आश्रम का गर्म कुण्ड हो सकी की कठिन पहाड़ी की चढ़ाई हो,मुखबा, हर्षिल, भैरव घाटी मानो स्वर्ग धरती पर आ बसा हो शीतल मन्द मन्द वायु आत्मा तक को जाग्रत कर देती हैं सच है ध्यान तो यहाँ खुली आंखों से लग जाता है उत्तराखण्ड के चार धाम में गंगोत्री एक महत्वपूर्ण धाम है। यहाँ से गङ्गा जी सूरज कुण्ड मे गिरती है जो अत्यंत सुंदर दृश्य बनता हैं या गङ्गा जी का भव्य मन्दिर है गंगोत्री गोमुख से १८ किलोमीटर नीचे है। यहां सैकड़ों धर्मशालाएं यात्रियों के ठहरने के लिए बने हैं। इसके अलावा देश के कथित कई बड़े बाबाओं के आश्रम भी गंगोत्री में हैं। प्रायः ये आश्रम अतिक्रमण की जमीन पर गंगा किनारे बनाए गए हैं। यहां के धर्मशालाएं और आश्रम बड़े-बड़े होटल में तब्दील हो चुके हैं। इन आश्रमों एवं धर्मशालाओं का गंदा पानी, ट्वायलेट आदि गंगा में ही बहाये जाते हैं। एक भी आश्रम में इसे ठिकाने लगाने के लिए व्यवस्था नहीं है। शंकर मठ, पंजाब सिंध क्षेत्र धर्मशाला सहित कई आश्रम का गंदा पानी सीधे गंगा में डाला जा रहा है।गंगोत्री मन्दिर के बाहर विशाल बाजार है जो आने जाने वाले यात्रियों की हर प्रकार की पूर्ति करता हैं तो सोचो इनका निकलने वाला वेस्ट पानी कहा जाता होगा यहां इस के लिये कोई व्यवस्था है ही नई ,सुनता यहां कई साल पहले सीवर लाइन बिछाने की योजना बनायी गयी और सीवर ट्रीटमेंट प्लांट के लिए चार करोड़ ३० लाख रुपये का बजट स्वीकृत भी किया गया। फिर भी अभी तक न सीवर बना है और न ही सीवर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण पूरा किया जा सका है।सीवर लाइन और सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बनने से पहले ही विवादों में घिर गये हैं। सीवर लाइन पवित्र भगीरथ शिला के ऊपर से बिछाई जा रही है। सीवर लिफ्ट करने के लिए सूर्यकुंड द्घाट के सामने पंपिंग स्टेशन बनाया जा रहा है। इसके अलावा ट्रीटमेंट प्लांट भी गंगा किनारे बनाया जा रहा है। सीवर लिफ्ट यानी सीवर टैंक सूर्यकुंड के ऊपर बनने से सूर्यकुंड का अस्तित्व खतरे में है। वहीं गंगा तट पर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने से इसके खराब होने पर पूरी गंदगी गंगा में ही बहायी जायेगी। इससे सीवर ट्रीटमेंट प्लांट का कोई फायदा नजर नहीं आ रहा था सीजन के दौरान 8से 15 हजार तीर्थयात्री गंगोत्री आते हैं। इनके अलावा इस दौरान हजारों पंडे, पुजारियों के अलावा दुकानदार, पुलिसकर्मी सहित गंगोत्री में 25 से 30 हजार की भीड़ होती है। यह सीजन छह महीने का होता है। अर्थात प्रत्येक साल सीजन के दौरान करीब 30 ,35 हजार लोगों की गंदगी गंगा में रोजाना बहायी जाती है। प्लास्टिक, कूड़ा कचरा अलग। इस गंदगी को ट्रीटमेंट करने के लिए ही सीवर ट्रीटमेंट प्लान बनाने की योजना गंगोत्री में चल रही है। लेकिन मंदिर समिति सहित पुजारी इस का विरोध कर रहे हैं। धीरे धीरे पिछले 20 वर्षो मे लोगो मे जब से ट्रकिंग का रुझान बढ़ा है यात्रियों ने विशेष विदेशी लोगो मे गोमुख की ओर बढ़ना आरम्भ कर दिया है जो परेशानी अभी तक गंगोत्री तक थी वो गोमुख का नाश करने लगी यात्रियों ने गोमुख को गंदा कर दिया कांवड़ के नाम पर भी गोमुख को गंदा करना आरम्भ हो गया वही लोग अपने अतरंग वस्त्र छोड़ने लगे जो मानो धर्म की शान्ति कर रहे हो, 20 से अधिक टैंट भोज वास मे लगे है जो यात्रियों की सुख सुविधा का प्रबंध करते हैं प्रति वर्ष गोमुख पर जाने वालों की संख्या 2 से 4 हजार होने लगी तो सोचो गङ्गा प्रदूषण नीचे से नही ऊपर भी आरम्भ हो गई हैं पहाड़ शौच घर होते जा रहे , धर्म यात्रा धर्म न होकर पिकनिक केंद्र हो
कर हर गये है शराब की खाली बोतल सब सच्चाई को कहती हैं
ये कैसा धर्म जागरण और धर्म यात्रा हो रही है भगवान ही जाने , फिर अगर गङ्गा मे या पहाड़ मे प्रलय आये तो भगवान का सब कसूर,क्यो इन सब दर्शय को देख मन विचलित होता है कहा जा रही हैं हमारी संस्कृति , क्या मिलेंगे प्रदूषण मुक्त पहाड़ व गङ्गा आने वाली पीढ़ियों को,
मेरी अध्यात्म यात्रा का मुख्य पड़ाव उत्तराखण्ड ही था विशेष रूप से उत्तरकाशी से ऊपर वह स्थान जो गङ्गा जी के साथ के थे, भटवाड़ी,पराशर आश्रम का गर्म कुण्ड हो सकी की कठिन पहाड़ी की चढ़ाई हो,मुखबा, हर्षिल, भैरव घाटी मानो स्वर्ग धरती पर आ बसा हो शीतल मन्द मन्द वायु आत्मा तक को जाग्रत कर देती हैं सच है ध्यान तो यहाँ खुली आंखों से लग जाता है उत्तराखण्ड के चार धाम में गंगोत्री एक महत्वपूर्ण धाम है। यहाँ से गङ्गा जी सूरज कुण्ड मे गिरती है जो अत्यंत सुंदर दृश्य बनता हैं या गङ्गा जी का भव्य मन्दिर है गंगोत्री गोमुख से १८ किलोमीटर नीचे है। यहां सैकड़ों धर्मशालाएं यात्रियों के ठहरने के लिए बने हैं। इसके अलावा देश के कथित कई बड़े बाबाओं के आश्रम भी गंगोत्री में हैं। प्रायः ये आश्रम अतिक्रमण की जमीन पर गंगा किनारे बनाए गए हैं। यहां के धर्मशालाएं और आश्रम बड़े-बड़े होटल में तब्दील हो चुके हैं। इन आश्रमों एवं धर्मशालाओं का गंदा पानी, ट्वायलेट आदि गंगा में ही बहाये जाते हैं। एक भी आश्रम में इसे ठिकाने लगाने के लिए व्यवस्था नहीं है। शंकर मठ, पंजाब सिंध क्षेत्र धर्मशाला सहित कई आश्रम का गंदा पानी सीधे गंगा में डाला जा रहा है।गंगोत्री मन्दिर के बाहर विशाल बाजार है जो आने जाने वाले यात्रियों की हर प्रकार की पूर्ति करता हैं तो सोचो इनका निकलने वाला वेस्ट पानी कहा जाता होगा यहां इस के लिये कोई व्यवस्था है ही नई ,सुनता यहां कई साल पहले सीवर लाइन बिछाने की योजना बनायी गयी और सीवर ट्रीटमेंट प्लांट के लिए चार करोड़ ३० लाख रुपये का बजट स्वीकृत भी किया गया। फिर भी अभी तक न सीवर बना है और न ही सीवर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण पूरा किया जा सका है।सीवर लाइन और सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बनने से पहले ही विवादों में घिर गये हैं। सीवर लाइन पवित्र भगीरथ शिला के ऊपर से बिछाई जा रही है। सीवर लिफ्ट करने के लिए सूर्यकुंड द्घाट के सामने पंपिंग स्टेशन बनाया जा रहा है। इसके अलावा ट्रीटमेंट प्लांट भी गंगा किनारे बनाया जा रहा है। सीवर लिफ्ट यानी सीवर टैंक सूर्यकुंड के ऊपर बनने से सूर्यकुंड का अस्तित्व खतरे में है। वहीं गंगा तट पर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने से इसके खराब होने पर पूरी गंदगी गंगा में ही बहायी जायेगी। इससे सीवर ट्रीटमेंट प्लांट का कोई फायदा नजर नहीं आ रहा था सीजन के दौरान 8से 15 हजार तीर्थयात्री गंगोत्री आते हैं। इनके अलावा इस दौरान हजारों पंडे, पुजारियों के अलावा दुकानदार, पुलिसकर्मी सहित गंगोत्री में 25 से 30 हजार की भीड़ होती है। यह सीजन छह महीने का होता है। अर्थात प्रत्येक साल सीजन के दौरान करीब 30 ,35 हजार लोगों की गंदगी गंगा में रोजाना बहायी जाती है। प्लास्टिक, कूड़ा कचरा अलग। इस गंदगी को ट्रीटमेंट करने के लिए ही सीवर ट्रीटमेंट प्लान बनाने की योजना गंगोत्री में चल रही है। लेकिन मंदिर समिति सहित पुजारी इस का विरोध कर रहे हैं। धीरे धीरे पिछले 20 वर्षो मे लोगो मे जब से ट्रकिंग का रुझान बढ़ा है यात्रियों ने विशेष विदेशी लोगो मे गोमुख की ओर बढ़ना आरम्भ कर दिया है जो परेशानी अभी तक गंगोत्री तक थी वो गोमुख का नाश करने लगी यात्रियों ने गोमुख को गंदा कर दिया कांवड़ के नाम पर भी गोमुख को गंदा करना आरम्भ हो गया वही लोग अपने अतरंग वस्त्र छोड़ने लगे जो मानो धर्म की शान्ति कर रहे हो, 20 से अधिक टैंट भोज वास मे लगे है जो यात्रियों की सुख सुविधा का प्रबंध करते हैं प्रति वर्ष गोमुख पर जाने वालों की संख्या 2 से 4 हजार होने लगी तो सोचो गङ्गा प्रदूषण नीचे से नही ऊपर भी आरम्भ हो गई हैं पहाड़ शौच घर होते जा रहे , धर्म यात्रा धर्म न होकर पिकनिक केंद्र हो
कर हर गये है शराब की खाली बोतल सब सच्चाई को कहती हैं
ये कैसा धर्म जागरण और धर्म यात्रा हो रही है भगवान ही जाने , फिर अगर गङ्गा मे या पहाड़ मे प्रलय आये तो भगवान का सब कसूर,क्यो इन सब दर्शय को देख मन विचलित होता है कहा जा रही हैं हमारी संस्कृति , क्या मिलेंगे प्रदूषण मुक्त पहाड़ व गङ्गा आने वाली पीढ़ियों को,
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-5
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-5
हम सभी गङ्गा जी और उनकी सहायक नदियां की चिंता जनक स्थिति से अवगत है पर कोई सार्थक प्रयास नही हो पा रहा , यही हमारे देश वासीयो की विडम्बना है सभी भेड़ चाल को पसंद करते है कोई ठोस निर्णय नही होता , देश मे कोई बड़ी घटना हो तो सभी राजनीति करने लगते हैं पर राजनीति भी की, दो चार दिन का जोश, फिर गुब्बारे की मानो हवा निकल गई हो सब ठंडे के ठंडे ,मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते मानो गङ्गा जी की सुध लेने वालों की बड़ा सी आ गई थी , सभी गङ्गा जी पर राजनीति करने लगे थे हर टी वी चैनल को गङ्गा की मानो चिंता सी हो गए थी , न्यूज चैनल पर गङ्गा ही गङ्गा , सोशल मीडिया पर रोज नये नये ब्लॉग, नजर आने लगे थे यू लगा गङ्गा जाग्रति की क्रांति सी आ गई हो आज दो वर्ष के बाद सब मानो बर्फ मे लग गये सभी को पक्का पकाया चाहिए कोई परिश्रम नही करना चाहता,ऐसे मे गङ्गा जी का नाश नही सवा सत्या नाश हो गया भारतीय संस्कूति का आधार स्तंभ मानी जाने वाली गंगा पर राजनीति ही चरम पर है। और कुछ भी नही,दिन-रात गंगा की स्तुति में लीन रहने वाले इसके मानस पुत्र इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के जमीनी प्रयास करने के बजाय 'गंगा बचाओ के नाम से और गङ्गा के नाम से संगठन बना अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। हिन्दू धर्म एवं संस्कूति के कथित ठेकेदार और धर्मगुरु धर्म की आड़ में माँ गंगा को भोग-विलास, मनोरंजन, एवं व्यवसाय का केंद्र बनाकर भौतिकवाद में डूबे हुए हैं। पीछे योग गुरु रामदेव, परमार्थ निकेतन ऋषिकेश के सर्वेसर्वा स्वामी चिदानंद मुनि एवं स्वामी हंसदास ने 'गंगा रक्षा मंच' बनाया। स्वामी रामदेव ने उस समय शपथ ली थी कि जिस प्रकार योग को पूरे भारत में लोकप्रिय बना दिया है, ठीक उसी प्रकार गंगा को मैला होने से रोकने के लिए क्रांति लायेंगे। इन लोगों के साथ हरिद्वार, ऋषिकेश के कई संतों ने भी गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के लिए उनका सहयोग करने की कसम खाई थी। 'गंगा रक्षा मंच' बनने के कुछ समय बाद ही मंच की हकीकत सामने आ गई। संतों की आपसी राजनीति का शिकार 'गंगा बचाओ अभियान' हुआ। गङ्गा फिर वही की वही, सब मदारी खेल बन कर रह गया , क्यो हो न हो व्यवसाय भी तो करना है बड़े बड़े महाराज हैं खर्च भी तो अधिक है सारा समय गङ्गा गङ्गा ही थोड़े करना है तब से गङ्गा जी की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया,
बल्कि इसमें प्रदूषण और बढ़ा ही है। जब धार्मिक दृष्टि से वैज्ञानिक आधार पर अन्य नदियों से बेहतर है,गङ्गा जल मे कीड़े नही पड़ते,गङ्गा जल सड़ता नही हैं तो भी लोग गंगा को लेकर चिंतित नहीं हैं। गंगा के प्रदूषित होने को लेकर बैठक पर बैठक, रैली,और रैलियों की बाढ़ ,सम्मेलन, यात्रा निकाली जाती हैं, पर राजनेताओं की ओछी राजनीति के नीचे जैसे अन्य अच्छी बातें दफन हो गई, वैसे ही पवित्र गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का मुद्दा भी दब कर रह जाता है, गङ्गा वही सिसकियां ले रही हैं और धर्म पुत्र 5 स्टार आश्रमो मे आनन्द का परमानन्द,
फिर परिणाम गङ्गा जी को धर्म से जोड़ कर, भगवान भरोसे
छोड़,...गंगा अस्तित्व की लड़ाई लडऩे को छोड़ दिया जाता है, हालांकि सरकार गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर चुकी है।पर सरकार ही, आम जनता मैं वही गङ्गा आवश्यकता के लिये है बस , झूठन छोड़ने का स्थान,यू यो गंगा एक्शन प्लान और राष्ट्रीय नदी सरंक्षण योजना चल चुकी है, पर इस सब का कहीं असर नहीं दिख रहा है। अगर गंगा के प्रदूषित होने में कोई कमी आई है, तो वह सिर्फ सरकार को ही दिख रही होगी।या सरकारी मंत्रियों को वास्तविकता यही है कि गंगा लगातार प्रदूषित होती जा रही है। आज हालात यह हैं कि कहीं-कहीं गंगाजल कीचडय़ुक्त पानी से भी बदतर है। इसीलिए आचमन और स्नान करते समय श्रद्धालुओं को आंखें बंद करनी पड़ती हैं गंगा नदी की लम्बाई 2507 किलोमीटर है। गंगा की सफाई के प्रति जरूरी है समाज के सभी वर्गों को जागरूक बनाया जा सके। गंंगा की सफाई का मसला देश के बिगड़ते पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है।मुझे लगता है संतों को इस मामले में एक होना होगा, और इस तरह से इस दिशा में पहल करनी चाहिए।कुछ सार्थक} हो , कुछ भले सख्त कदम उठाने पड़े,जो नगर और महा नगर गंगा के किनारे बसे हुए हैं, उनकी नालियों और नालों के जरिए अत्यंत ही प्रदूषित जल सीधे गंगा में बहाया जा रहा है।पटना में ऐसे 29 नाले हैं जो गंगा को रोज- रोज प्रदूषित कर रहे हैं।
शेष कल
हम सभी गङ्गा जी और उनकी सहायक नदियां की चिंता जनक स्थिति से अवगत है पर कोई सार्थक प्रयास नही हो पा रहा , यही हमारे देश वासीयो की विडम्बना है सभी भेड़ चाल को पसंद करते है कोई ठोस निर्णय नही होता , देश मे कोई बड़ी घटना हो तो सभी राजनीति करने लगते हैं पर राजनीति भी की, दो चार दिन का जोश, फिर गुब्बारे की मानो हवा निकल गई हो सब ठंडे के ठंडे ,मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते मानो गङ्गा जी की सुध लेने वालों की बड़ा सी आ गई थी , सभी गङ्गा जी पर राजनीति करने लगे थे हर टी वी चैनल को गङ्गा की मानो चिंता सी हो गए थी , न्यूज चैनल पर गङ्गा ही गङ्गा , सोशल मीडिया पर रोज नये नये ब्लॉग, नजर आने लगे थे यू लगा गङ्गा जाग्रति की क्रांति सी आ गई हो आज दो वर्ष के बाद सब मानो बर्फ मे लग गये सभी को पक्का पकाया चाहिए कोई परिश्रम नही करना चाहता,ऐसे मे गङ्गा जी का नाश नही सवा सत्या नाश हो गया भारतीय संस्कूति का आधार स्तंभ मानी जाने वाली गंगा पर राजनीति ही चरम पर है। और कुछ भी नही,दिन-रात गंगा की स्तुति में लीन रहने वाले इसके मानस पुत्र इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के जमीनी प्रयास करने के बजाय 'गंगा बचाओ के नाम से और गङ्गा के नाम से संगठन बना अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। हिन्दू धर्म एवं संस्कूति के कथित ठेकेदार और धर्मगुरु धर्म की आड़ में माँ गंगा को भोग-विलास, मनोरंजन, एवं व्यवसाय का केंद्र बनाकर भौतिकवाद में डूबे हुए हैं। पीछे योग गुरु रामदेव, परमार्थ निकेतन ऋषिकेश के सर्वेसर्वा स्वामी चिदानंद मुनि एवं स्वामी हंसदास ने 'गंगा रक्षा मंच' बनाया। स्वामी रामदेव ने उस समय शपथ ली थी कि जिस प्रकार योग को पूरे भारत में लोकप्रिय बना दिया है, ठीक उसी प्रकार गंगा को मैला होने से रोकने के लिए क्रांति लायेंगे। इन लोगों के साथ हरिद्वार, ऋषिकेश के कई संतों ने भी गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के लिए उनका सहयोग करने की कसम खाई थी। 'गंगा रक्षा मंच' बनने के कुछ समय बाद ही मंच की हकीकत सामने आ गई। संतों की आपसी राजनीति का शिकार 'गंगा बचाओ अभियान' हुआ। गङ्गा फिर वही की वही, सब मदारी खेल बन कर रह गया , क्यो हो न हो व्यवसाय भी तो करना है बड़े बड़े महाराज हैं खर्च भी तो अधिक है सारा समय गङ्गा गङ्गा ही थोड़े करना है तब से गङ्गा जी की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया,
बल्कि इसमें प्रदूषण और बढ़ा ही है। जब धार्मिक दृष्टि से वैज्ञानिक आधार पर अन्य नदियों से बेहतर है,गङ्गा जल मे कीड़े नही पड़ते,गङ्गा जल सड़ता नही हैं तो भी लोग गंगा को लेकर चिंतित नहीं हैं। गंगा के प्रदूषित होने को लेकर बैठक पर बैठक, रैली,और रैलियों की बाढ़ ,सम्मेलन, यात्रा निकाली जाती हैं, पर राजनेताओं की ओछी राजनीति के नीचे जैसे अन्य अच्छी बातें दफन हो गई, वैसे ही पवित्र गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का मुद्दा भी दब कर रह जाता है, गङ्गा वही सिसकियां ले रही हैं और धर्म पुत्र 5 स्टार आश्रमो मे आनन्द का परमानन्द,
फिर परिणाम गङ्गा जी को धर्म से जोड़ कर, भगवान भरोसे
छोड़,...गंगा अस्तित्व की लड़ाई लडऩे को छोड़ दिया जाता है, हालांकि सरकार गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर चुकी है।पर सरकार ही, आम जनता मैं वही गङ्गा आवश्यकता के लिये है बस , झूठन छोड़ने का स्थान,यू यो गंगा एक्शन प्लान और राष्ट्रीय नदी सरंक्षण योजना चल चुकी है, पर इस सब का कहीं असर नहीं दिख रहा है। अगर गंगा के प्रदूषित होने में कोई कमी आई है, तो वह सिर्फ सरकार को ही दिख रही होगी।या सरकारी मंत्रियों को वास्तविकता यही है कि गंगा लगातार प्रदूषित होती जा रही है। आज हालात यह हैं कि कहीं-कहीं गंगाजल कीचडय़ुक्त पानी से भी बदतर है। इसीलिए आचमन और स्नान करते समय श्रद्धालुओं को आंखें बंद करनी पड़ती हैं गंगा नदी की लम्बाई 2507 किलोमीटर है। गंगा की सफाई के प्रति जरूरी है समाज के सभी वर्गों को जागरूक बनाया जा सके। गंंगा की सफाई का मसला देश के बिगड़ते पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है।मुझे लगता है संतों को इस मामले में एक होना होगा, और इस तरह से इस दिशा में पहल करनी चाहिए।कुछ सार्थक} हो , कुछ भले सख्त कदम उठाने पड़े,जो नगर और महा नगर गंगा के किनारे बसे हुए हैं, उनकी नालियों और नालों के जरिए अत्यंत ही प्रदूषित जल सीधे गंगा में बहाया जा रहा है।पटना में ऐसे 29 नाले हैं जो गंगा को रोज- रोज प्रदूषित कर रहे हैं।
शेष कल
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-4
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-4
घर छोड़ने से पहले जो साधु संत मुझे अजीब से लगते थे अब वही अच्छे और सच्चे जान पड़े , यहॉ मैं घुमक्कड़ महात्मा की बात कर रहा हूं 5 स्टार बाबाओ की चर्चा आगे करूँगा, जो हाथो मे दस्ताने पहन फिल्मी हीरो हीरोइन के साथ गङ्गा बचाने की दास्तान लिखते हैं, ये लम्बी लम्बी गाड़ियों और ए .सी के घरों के बिना रह नही सकते,
अलख जोली पलक खज़ाना, लेगी भूख तो मांग कर खाना मिल गया तो दिवाली, नही मिला तो उपवास, हर हाल मैं प्रसन्न हमें नही चिता उसे चिता हमारी है हमारी नाव का रक्षक वो सुदर्शन चक्र धारी है
मैं मन का राजा मनके का राजा होने लगा , गङ्गा बचाते-बचाते हम पर भगवा रंग चढ़ गया , ऐसा नही है कि गङ्गा जी की चर्चा से पहले मे साधक नही था, था पर साधु होने का गर्व माँ गंगा जी ने दिया उससे पहले मन केवल गुप्त होना चाहता था केवल हरि नाम ही केवलम , हरि कृपा ने एक जीवन जीने का मकसद दिया जल्दी ही हमने एक टीम बनाई जो हर वर्ष श्रावण मे कांवड़ लाने वालो के लिये मैडीकल सेवा प्रधान करें ये लोग हर वर्ष गंगोत्री और गोमुख सेवा करते रहे साथ ही लोगो को गङ्गा के प्रति जाग्रत करने का काम भी आरम्भ होने लगा आठ लोगों की मेहनती टीम मे हर विभाग का सहयोगी था सभी अपने काम मे माहिर, सेवाभाव मे एक से बढ़कर एक है जो आज भी काम कर रहे हैं कोई नाम या सम्मान का इच्छुक नही है बस सेवा भाव है कोई चन्दा नही सब खर्च भी स्वयं ही करते हैं कोई भेदभाव} नही जिसे जैसी भी सेवा या मदद चाहिये करते हैं फिर वह कावड़िया हो , यात्री हो, सन्त हो या लोकल निवासी,सेवा ही करना है विकास की इस दौड़ में सच्ची सेवा करने वाले कम ही है वही आजकल विकास विनाश कब हो जाये पता ही नही चलता मेरी सोच मे भारत की नदियो को मिटाने की तैयारी का नाम विकास है विकास के नाम पर नदियोगंगा में वैसे तो मैट्रो शहरों की पूरी गंदगी ही समां रही है, पर गंगा को प्रदूषित करने में सबसे ज्यादा योगदान शराब व खाद फैक्ट्रियों का ही है। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाला रसायनयुक्त प्रदूषित पानी इतना घातक होता है कि यह पानी जहां-जहां से गुजरता है, वहां की भूमि बंजर हो जाती है। कंटीले पेड़ों के अलावा ऐसी जमीन पर और कुछ नहीं उगता। इस जहरीले पानी की बजह से ही गंगा को शुद्ध रखने वाले जीव मर चुके हैं और जो बचे हैं, वह लगातार मर रहे हैं।गंगा मे बहा जा रहा है जहर , जो कर रहा है नदियो को विषैला ,
अब न नदियो का पानी पीने के काबिल है न ही खैती के और देश के नेता कहते हैं हम विकास कर रहे जहाँ दुनिया के सभी छोटे बड़े देश प्रदूषण और पर्यवरण की ओर तेज गति से काम कर रहे और अपने आने वाली पीढ़ियों को भी जाग्रत कर रहे वही भारत मे सौ वर्षों मे बस मीटिंग पर मीटिंग हो रही है
आज भी हमारा पीने का 90% पानी व्यर्थ समुन्द्र मे बह जाता हैं इससे बढ़ी मुर्खता क्या होगी आज भी हम बाढ़ से अपना बचाव नही कर पाते ,आज भी हमें बाढ़ के पानी को उपयोग करना नही आता,
रिश्वत खोर और भ्र्ष्टाचारी लोग इसके मुख्य दोषी है सौ मे से नब्बे बईमान फिर भी मेरा भारत महान करोड़ों रुपये का बजट बनता हैं नदियों को बचाने के लिये पर सब कागज़ो मे या लगा भी तो 10% बाँकी जेब मे जेब भी मानो डोरीमोन की पॉकेट हो जो कभी भरती ही नही, ये देश के कैसे गरीब हैं जिनकी करोड़ों डकार जाने पर भी भूख नही मिटती, गङ्गा के नाम पर हर वर्ष बजट बनता हैं और तो बिदेशो से भी सहयोग मिलता हैं सब कहा जाता है जितना पैसा गङ्गा जी के नाम पर 25 वर्षो मे खर्च दिखया गया है इतनी धन राशि मे गङ्गा कई बार प्रदूषण मुक्त हो जाती शेख चिल्ली नेता शेख चिल्ली अधिकारी शेख चिल्ली चम्मचे, बड़ी बड़ी बातें, बातो का क्या है मैंने पढ़ा है 1911 मे मदन मोहन मालवीय जी ने भी गङ्गा को लेकर आवाज उठाई थी ओर आजाद भारत मे तो आवाजे उठती रही दबाई जाती रही आज मोदी युग आ गया सौ वर्ष से ऊपर हो गये गङ्गा आज भी शोषती असहाय प्रदूषित है
घर छोड़ने से पहले जो साधु संत मुझे अजीब से लगते थे अब वही अच्छे और सच्चे जान पड़े , यहॉ मैं घुमक्कड़ महात्मा की बात कर रहा हूं 5 स्टार बाबाओ की चर्चा आगे करूँगा, जो हाथो मे दस्ताने पहन फिल्मी हीरो हीरोइन के साथ गङ्गा बचाने की दास्तान लिखते हैं, ये लम्बी लम्बी गाड़ियों और ए .सी के घरों के बिना रह नही सकते,
अलख जोली पलक खज़ाना, लेगी भूख तो मांग कर खाना मिल गया तो दिवाली, नही मिला तो उपवास, हर हाल मैं प्रसन्न हमें नही चिता उसे चिता हमारी है हमारी नाव का रक्षक वो सुदर्शन चक्र धारी है
मैं मन का राजा मनके का राजा होने लगा , गङ्गा बचाते-बचाते हम पर भगवा रंग चढ़ गया , ऐसा नही है कि गङ्गा जी की चर्चा से पहले मे साधक नही था, था पर साधु होने का गर्व माँ गंगा जी ने दिया उससे पहले मन केवल गुप्त होना चाहता था केवल हरि नाम ही केवलम , हरि कृपा ने एक जीवन जीने का मकसद दिया जल्दी ही हमने एक टीम बनाई जो हर वर्ष श्रावण मे कांवड़ लाने वालो के लिये मैडीकल सेवा प्रधान करें ये लोग हर वर्ष गंगोत्री और गोमुख सेवा करते रहे साथ ही लोगो को गङ्गा के प्रति जाग्रत करने का काम भी आरम्भ होने लगा आठ लोगों की मेहनती टीम मे हर विभाग का सहयोगी था सभी अपने काम मे माहिर, सेवाभाव मे एक से बढ़कर एक है जो आज भी काम कर रहे हैं कोई नाम या सम्मान का इच्छुक नही है बस सेवा भाव है कोई चन्दा नही सब खर्च भी स्वयं ही करते हैं कोई भेदभाव} नही जिसे जैसी भी सेवा या मदद चाहिये करते हैं फिर वह कावड़िया हो , यात्री हो, सन्त हो या लोकल निवासी,सेवा ही करना है विकास की इस दौड़ में सच्ची सेवा करने वाले कम ही है वही आजकल विकास विनाश कब हो जाये पता ही नही चलता मेरी सोच मे भारत की नदियो को मिटाने की तैयारी का नाम विकास है विकास के नाम पर नदियोगंगा में वैसे तो मैट्रो शहरों की पूरी गंदगी ही समां रही है, पर गंगा को प्रदूषित करने में सबसे ज्यादा योगदान शराब व खाद फैक्ट्रियों का ही है। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाला रसायनयुक्त प्रदूषित पानी इतना घातक होता है कि यह पानी जहां-जहां से गुजरता है, वहां की भूमि बंजर हो जाती है। कंटीले पेड़ों के अलावा ऐसी जमीन पर और कुछ नहीं उगता। इस जहरीले पानी की बजह से ही गंगा को शुद्ध रखने वाले जीव मर चुके हैं और जो बचे हैं, वह लगातार मर रहे हैं।गंगा मे बहा जा रहा है जहर , जो कर रहा है नदियो को विषैला ,
अब न नदियो का पानी पीने के काबिल है न ही खैती के और देश के नेता कहते हैं हम विकास कर रहे जहाँ दुनिया के सभी छोटे बड़े देश प्रदूषण और पर्यवरण की ओर तेज गति से काम कर रहे और अपने आने वाली पीढ़ियों को भी जाग्रत कर रहे वही भारत मे सौ वर्षों मे बस मीटिंग पर मीटिंग हो रही है
आज भी हमारा पीने का 90% पानी व्यर्थ समुन्द्र मे बह जाता हैं इससे बढ़ी मुर्खता क्या होगी आज भी हम बाढ़ से अपना बचाव नही कर पाते ,आज भी हमें बाढ़ के पानी को उपयोग करना नही आता,
रिश्वत खोर और भ्र्ष्टाचारी लोग इसके मुख्य दोषी है सौ मे से नब्बे बईमान फिर भी मेरा भारत महान करोड़ों रुपये का बजट बनता हैं नदियों को बचाने के लिये पर सब कागज़ो मे या लगा भी तो 10% बाँकी जेब मे जेब भी मानो डोरीमोन की पॉकेट हो जो कभी भरती ही नही, ये देश के कैसे गरीब हैं जिनकी करोड़ों डकार जाने पर भी भूख नही मिटती, गङ्गा के नाम पर हर वर्ष बजट बनता हैं और तो बिदेशो से भी सहयोग मिलता हैं सब कहा जाता है जितना पैसा गङ्गा जी के नाम पर 25 वर्षो मे खर्च दिखया गया है इतनी धन राशि मे गङ्गा कई बार प्रदूषण मुक्त हो जाती शेख चिल्ली नेता शेख चिल्ली अधिकारी शेख चिल्ली चम्मचे, बड़ी बड़ी बातें, बातो का क्या है मैंने पढ़ा है 1911 मे मदन मोहन मालवीय जी ने भी गङ्गा को लेकर आवाज उठाई थी ओर आजाद भारत मे तो आवाजे उठती रही दबाई जाती रही आज मोदी युग आ गया सौ वर्ष से ऊपर हो गये गङ्गा आज भी शोषती असहाय प्रदूषित है
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-3
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-3
यू तो मैंने पत्रकारिता को छोड़ दिया था पर कहते हैं न चोर चोरी से जाये पर हेराफेरी से न जाये,गङ्गा जी की बिगड़ती स्थिति ओर गङ्गा जी को माँ कहने वाले समाज का बेरुखा पन मुझे अखरने लगा था
मन कहने लगा कुछ करना ही होगा ,ऐसा नही था कि मैं कोई पहला आदमी हुँ जो गङ्गा जी को बचाने के लिये आवाज़ उठाने वाला था सैकड़ों लोग ओर भी थे आवाज़ उठ भी रही थी
पर सभी के मार्ग अलग थे मुझे लगा इस काम को साधु और पत्रकार मिलकर करै, और आवाज से आवाज को मिलना होगा
तो मैं साधु पत्रकार हो गया एक हाथ कमण्डल और कन्धे पर कैमरा,यू तो पिछले कई वर्षी से मे समाज को जाग्रत करने के लिये कलम उठता था, आज भी वही काम बस पहले जो काम मैं पैसे लेकर करता था अब केवल गङ्गा जी दुआ के लिये करना था निश्चित ही सच मुझे गङ्गा जी की कृपा मिली भी,
गङ्गा की स्थिति पर काफी लेख और फोटो ली गई , पर सबसे अधिक मदद मुझे शोशल मिडिला, के आने पर मिली गङ्गा जी पर लेख, फोटो वीडियो शेयर किये गये गोमुख से एक स्थान को नापा, हरिद्वार को देव भूमि का जाता हैं परंतु हरिद्वार पहुचते पहुचते गङ्गा जल मल होने लगता हैं जांच करता मानते है की हरिद्वार मे पहुचतै पहुचते पीना तो क्या नहाने और खेती के लेकवभी नही रहता,सरकारी आंकड़ों के आधार पर माना जाये तो मात्र हरिद्वार तक इसके मार्ग में पड़ने वाले लगभग 12 नगरपालिका कस्बों के नालों से लगभग आठ करोड़ नब्बे लाख लिटर मलजल प्रतिदिन गंगा में गिरता है। इससे बड़ी बुरी बात और क्या होगी गङ्गा नदी में गिरने वाले मलजल की मात्रा तब अधिक बढ़ जाती है जब मई और अक्तूबर के बीच लगभग 15 लाख(1.5 मिलियन) लोग चारधाम यात्रा पर प्रति वर्ष राज्य में आते हैं।ऐसा होना ही था मामला जो धर्म से जुड़ा है सारे भारत से हर वर्ष इतनी बड़ी संख्या यात्रियों का आना और अपने पाप को देवभूमि पर छोड़ना, गङ्गा के शोषण का बड़ा कारण हुआ
शेष कल
यू तो मैंने पत्रकारिता को छोड़ दिया था पर कहते हैं न चोर चोरी से जाये पर हेराफेरी से न जाये,गङ्गा जी की बिगड़ती स्थिति ओर गङ्गा जी को माँ कहने वाले समाज का बेरुखा पन मुझे अखरने लगा था
मन कहने लगा कुछ करना ही होगा ,ऐसा नही था कि मैं कोई पहला आदमी हुँ जो गङ्गा जी को बचाने के लिये आवाज़ उठाने वाला था सैकड़ों लोग ओर भी थे आवाज़ उठ भी रही थी
पर सभी के मार्ग अलग थे मुझे लगा इस काम को साधु और पत्रकार मिलकर करै, और आवाज से आवाज को मिलना होगा
तो मैं साधु पत्रकार हो गया एक हाथ कमण्डल और कन्धे पर कैमरा,यू तो पिछले कई वर्षी से मे समाज को जाग्रत करने के लिये कलम उठता था, आज भी वही काम बस पहले जो काम मैं पैसे लेकर करता था अब केवल गङ्गा जी दुआ के लिये करना था निश्चित ही सच मुझे गङ्गा जी की कृपा मिली भी,
गङ्गा की स्थिति पर काफी लेख और फोटो ली गई , पर सबसे अधिक मदद मुझे शोशल मिडिला, के आने पर मिली गङ्गा जी पर लेख, फोटो वीडियो शेयर किये गये गोमुख से एक स्थान को नापा, हरिद्वार को देव भूमि का जाता हैं परंतु हरिद्वार पहुचते पहुचते गङ्गा जल मल होने लगता हैं जांच करता मानते है की हरिद्वार मे पहुचतै पहुचते पीना तो क्या नहाने और खेती के लेकवभी नही रहता,सरकारी आंकड़ों के आधार पर माना जाये तो मात्र हरिद्वार तक इसके मार्ग में पड़ने वाले लगभग 12 नगरपालिका कस्बों के नालों से लगभग आठ करोड़ नब्बे लाख लिटर मलजल प्रतिदिन गंगा में गिरता है। इससे बड़ी बुरी बात और क्या होगी गङ्गा नदी में गिरने वाले मलजल की मात्रा तब अधिक बढ़ जाती है जब मई और अक्तूबर के बीच लगभग 15 लाख(1.5 मिलियन) लोग चारधाम यात्रा पर प्रति वर्ष राज्य में आते हैं।ऐसा होना ही था मामला जो धर्म से जुड़ा है सारे भारत से हर वर्ष इतनी बड़ी संख्या यात्रियों का आना और अपने पाप को देवभूमि पर छोड़ना, गङ्गा के शोषण का बड़ा कारण हुआ
शेष कल
मेरी गङ्गा यात्रा - 2
मेरी गङ्गा यात्रा - 2
यू तो कई वर्षो से मे हर वर्ष कुछ समय गंगोत्री के क्षेत्रो मे व्यतीत करता हूं पर मुझे सबसे बड़ा दुख इसी बात का रहा
लोगो के मन मे पर्यवरण के प्रति कोई अच्छी सोच नही है, पहाड़ का आदमी मैदानी लोगो को पर्यावरण को दुषित करने का दोष मानता है और मैदानी सारा दोष पहाड़ के वासी को मढ़ते है की वो प्रकृति धरोहर को सँजोकर नही रख पाये,पर दोनों ही दोषी है
पहाड़ो और नदियों का नाश करने के लिये,गङ्गा जी वा नदियों को प्रदूषित करने वाले नालो का विलय हो या उद्योगिक कचरा है तो हमारा, कोई दूसरी दुनिया से तो आया नही तो दोषी भी हम ही है गङ्गा जी किनारे बसने वाले शहरों न गङ्गा जी को केवल नदी मानकर उसका शोषण करना आरम्भ कर दिया विकास के नाम पर विनाश ने अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया जिसका परिणाम सभी से अवगत है कभी आपने सोचा है कि मानव ने जो विकास 1लाख वर्ष मे नही किया ,वो विकास और विनाश 150 वर्ष मे कर लिया हम पहियों के अविष्कार से वाई फाई पर आ गये, या यूं कहै मानव के अंत की ओर बढ़ गये, जल्दी ही मानव को रहने के लिये दूसरी धरती खोजनी होगी यह सत्य है हम स्वयं परमात्मा की दी सुंदर धरती का नाश कर रहे है खैर इतना लम्बा नही सोचते, बात केवल गङ्गा जी की ही करते है पिछले 1हजार वर्षों गङ्गा जी को मिटाने का मुहिम आरम्भ हो गया था बाकी बचा खुचा अंग्रजो वा अंग्रजो के हम बंधवा मजदूरों ने 150 वर्षो मे कर दिया और आज भी ब दस्तूर जारी है पिछले 30 वर्षों में मैंने देखा है गंगोत्री वा आस पास पक्के घरो की बाढ़ सी आ गई हैं विशेष रूप से गङ्गा के किनारों पर लोगो ने घर बना लिये है और गङ्गा की धारा भी अवरूद्ध होने लगी है सन्त महात्मा भी कहा कम है बड़े बड़े 5 स्टार आश्रमो का निर्माण गङ्गा की भूमि पर होने लगा है और सब का मल मूत्र गङ्गा जी को समर्पितं है जय हो, छोटी छोटी नालियों ने बड़े नालो का रूप ले लिया है होटलों की भी बाढ़ सी आ गई हैं
सुंदर पहाड़ बदरंग कर दिये जा रहे हैं निर्मल बहने वाली गङ्गा जी पर जगह जगह बांधो का निर्माण और गङ्गा जी को बाँधा जा रहा है जिससे गङ्गा की स्वरूप बदलता जा रहा है जो कि चिंता का विषय है
शेष कल
यू तो कई वर्षो से मे हर वर्ष कुछ समय गंगोत्री के क्षेत्रो मे व्यतीत करता हूं पर मुझे सबसे बड़ा दुख इसी बात का रहा
लोगो के मन मे पर्यवरण के प्रति कोई अच्छी सोच नही है, पहाड़ का आदमी मैदानी लोगो को पर्यावरण को दुषित करने का दोष मानता है और मैदानी सारा दोष पहाड़ के वासी को मढ़ते है की वो प्रकृति धरोहर को सँजोकर नही रख पाये,पर दोनों ही दोषी है
पहाड़ो और नदियों का नाश करने के लिये,गङ्गा जी वा नदियों को प्रदूषित करने वाले नालो का विलय हो या उद्योगिक कचरा है तो हमारा, कोई दूसरी दुनिया से तो आया नही तो दोषी भी हम ही है गङ्गा जी किनारे बसने वाले शहरों न गङ्गा जी को केवल नदी मानकर उसका शोषण करना आरम्भ कर दिया विकास के नाम पर विनाश ने अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया जिसका परिणाम सभी से अवगत है कभी आपने सोचा है कि मानव ने जो विकास 1लाख वर्ष मे नही किया ,वो विकास और विनाश 150 वर्ष मे कर लिया हम पहियों के अविष्कार से वाई फाई पर आ गये, या यूं कहै मानव के अंत की ओर बढ़ गये, जल्दी ही मानव को रहने के लिये दूसरी धरती खोजनी होगी यह सत्य है हम स्वयं परमात्मा की दी सुंदर धरती का नाश कर रहे है खैर इतना लम्बा नही सोचते, बात केवल गङ्गा जी की ही करते है पिछले 1हजार वर्षों गङ्गा जी को मिटाने का मुहिम आरम्भ हो गया था बाकी बचा खुचा अंग्रजो वा अंग्रजो के हम बंधवा मजदूरों ने 150 वर्षो मे कर दिया और आज भी ब दस्तूर जारी है पिछले 30 वर्षों में मैंने देखा है गंगोत्री वा आस पास पक्के घरो की बाढ़ सी आ गई हैं विशेष रूप से गङ्गा के किनारों पर लोगो ने घर बना लिये है और गङ्गा की धारा भी अवरूद्ध होने लगी है सन्त महात्मा भी कहा कम है बड़े बड़े 5 स्टार आश्रमो का निर्माण गङ्गा की भूमि पर होने लगा है और सब का मल मूत्र गङ्गा जी को समर्पितं है जय हो, छोटी छोटी नालियों ने बड़े नालो का रूप ले लिया है होटलों की भी बाढ़ सी आ गई हैं
सुंदर पहाड़ बदरंग कर दिये जा रहे हैं निर्मल बहने वाली गङ्गा जी पर जगह जगह बांधो का निर्माण और गङ्गा जी को बाँधा जा रहा है जिससे गङ्गा की स्वरूप बदलता जा रहा है जो कि चिंता का विषय है
शेष कल
मेरी गङ्गा यात्रा
माँ गंगा की चर्चा आते ही जाने कुयू मन मे कुछ सरसरी होने लगती हैं वह नदी,जो बहती जलधारा से कुछ अधिक है वह नदी जिसे सदियों सदियों से हमारे पूर्वज पूजते आये है निरन्तर, प्रतिदिन बहने वाली सभी को सुख और पुण्य, देनी वाली मोक्षदायिनी, जीवनदायिनी माँ है ये गङ्गा,
बिना भेदभाव,निस्वार्थ भाव बिना संकोच सभी का पालन पोषण करती है माँ गंगा,
किसी के लिये हो या न हो मेरे लिये मॉ हैं गङ्गा,
हरिहर मेरी अनन्त सांसो का प्रवाह है मां गंगा,
आज भी मुझे याद जब पहली बार मैंने बहते रूप मे गङ्गा जी को देखा था निर्मल विशाल , कलकल करता सुंदर रूप और देखते देखते मात्र 30 वर्षो से क्या से क्या हो गया
एक माह में मैने गङ्गा जी दोनों रूप देखै, पहला हरिद्वार दूसरा
कानपुर वाराणसी कलकत्ता, जहाँ एक और 30 वर्ष पूर्व हरिद्वार मे गङ्गा का जल पवित्र और निर्मल था वही कानपुर से आगे बदरंग होने लगा था
भारतीय जन मानस के पापो को धोते धोते आज गङ्गा की धारा मलील होने लगी हैं वाराणसी के घाटों पर रहने वाली पीढ़ीया गवाह है गंगे आहो की, आज भी गङ्गा जी की लहरों मे अपनो के दिये दर्द की सिसकियों साफ सुनाई देती हैं बस ह्रदय की गहराईयों से सुनने वाले हो जीने भी गङ्गा जी की सिसकियां आहे सुनाई दी ! वह क्या रुका, संख्या नही कितने गङ्गा जी को निर्मल पावन, कलकल बहता देने के लिये बलिदान हो गये
गङ्गा जल के तेज मिटाना षड्यंत्र है :-
भारतीय सँस्कृति का मूलभूत स्तम्भ है गङ्गा और हमारी सँस्कृति को खंडित करना विदेशी हमला वारो , और धर्म परिवर्तन करने वालो का मुख्य लक्ष्य था किसी भी सँस्कृति को मिटाना हो तो उसके विश्वास ओर श्रद्धा पर चोट करना जरूरी रहा , जान भुजकर गङ्गा जी की पवित्रता को मिटाने के लिये गङ्गा के नजदीक पशु कत्लगाह, चमड़ा उद्योग, रंगरेज, आदि आदि कामो को बसा गया गङ्गा प्रदूषण आज की बोयी समस्या नही है
1 हज़ार से अधिक वर्ष हो गये गङ्गा प्रदूषण को जन्म लिये सभी हमलावरों का एक ही उद्देश्य रहा सँस्कृति पर चोट , और वो इसमें सफल भी रहे क्योकि हमारे यहां घर के भेदी, विभीषण,शकुनि, आदि कम नही रहे
बिना भेदभाव,निस्वार्थ भाव बिना संकोच सभी का पालन पोषण करती है माँ गंगा,
किसी के लिये हो या न हो मेरे लिये मॉ हैं गङ्गा,
हरिहर मेरी अनन्त सांसो का प्रवाह है मां गंगा,
आज भी मुझे याद जब पहली बार मैंने बहते रूप मे गङ्गा जी को देखा था निर्मल विशाल , कलकल करता सुंदर रूप और देखते देखते मात्र 30 वर्षो से क्या से क्या हो गया
एक माह में मैने गङ्गा जी दोनों रूप देखै, पहला हरिद्वार दूसरा
कानपुर वाराणसी कलकत्ता, जहाँ एक और 30 वर्ष पूर्व हरिद्वार मे गङ्गा का जल पवित्र और निर्मल था वही कानपुर से आगे बदरंग होने लगा था
भारतीय जन मानस के पापो को धोते धोते आज गङ्गा की धारा मलील होने लगी हैं वाराणसी के घाटों पर रहने वाली पीढ़ीया गवाह है गंगे आहो की, आज भी गङ्गा जी की लहरों मे अपनो के दिये दर्द की सिसकियों साफ सुनाई देती हैं बस ह्रदय की गहराईयों से सुनने वाले हो जीने भी गङ्गा जी की सिसकियां आहे सुनाई दी ! वह क्या रुका, संख्या नही कितने गङ्गा जी को निर्मल पावन, कलकल बहता देने के लिये बलिदान हो गये
गङ्गा जल के तेज मिटाना षड्यंत्र है :-
भारतीय सँस्कृति का मूलभूत स्तम्भ है गङ्गा और हमारी सँस्कृति को खंडित करना विदेशी हमला वारो , और धर्म परिवर्तन करने वालो का मुख्य लक्ष्य था किसी भी सँस्कृति को मिटाना हो तो उसके विश्वास ओर श्रद्धा पर चोट करना जरूरी रहा , जान भुजकर गङ्गा जी की पवित्रता को मिटाने के लिये गङ्गा के नजदीक पशु कत्लगाह, चमड़ा उद्योग, रंगरेज, आदि आदि कामो को बसा गया गङ्गा प्रदूषण आज की बोयी समस्या नही है
1 हज़ार से अधिक वर्ष हो गये गङ्गा प्रदूषण को जन्म लिये सभी हमलावरों का एक ही उद्देश्य रहा सँस्कृति पर चोट , और वो इसमें सफल भी रहे क्योकि हमारे यहां घर के भेदी, विभीषण,शकुनि, आदि कम नही रहे
मेरी गङ्गा यात्रा भाग 1
मेरी गंगा यात्रा भाग-59
इक प्रयास गंगा बचे
कहते है जहां शहद हैं वहां मक्खियों का होना लाज़मी हैं भारत मे कोई काम बिना रिश्वत के नही होता, बड़े बड़े प्रोजेक्ट आते ही इस लिये हैं ताकि गरीब जनता के चुने गरीव नेताओं का कल्याण हो सके एक स्कीम या स्कैम बताये जिसमें घोटालों की गन्ध न आई हो,और हो भी क्यों न करोड़ो रूपये चुनाव में खर्च होते है वह भी हर दल के, तो निश्चित है वह तो निकलना ही हैं फिर लाभ होना आवश्यक हैं अन्यथा व्यपार का लाभ ही क्या,आपने ग़ालिब का शेर तो सुना होगा हर शाख पर बैठा है उल्लू अंजामे गुलिस्तां क्या होगा 2016 मे नामामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत गंगा की सफाई के लिए मिले फंड में बड़े स्तर पर हुए घोटाले की शंका के चलते उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश पर कैग यानि कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ने खर्च के ऑडिट की तैयारी पूरी की । कैग के एक सीनियर अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर मीडिया को बताया कि ऑडिट की तैयारी पूरी कर ली गई है। इसमें बड़े घोटाले कि अकांश है अतः ऑडिट से पहले होने वाले काम निपटा लिए गए हैं और दिल्ली ऑफिस को भी सूचित कर दिया है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कैग को आदेश दिया कि वह नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत चलने वाली सभी केंद्रीय योजनाओं का ऑडिट करे। ये सभी योजनाएं उत्तराखंड के अलावा यूपी, झारखंड और पश्चिम बंगाल में चल रही हैं जहां- जहां से होकर गंगा गुजरती है।अदालत के आदेश के बाद कैग पूरी स्कीम, इसके तहत हुए टेंडर्स, वर्क ऑर्डर्स का ऑडिट करेगा। साथ ही ये भी देखेगा कि अब तक कितना काम हुआ और इस पर कितना खर्च होना चाहिए। माना जा रहा है कि इसमें बड़े स्तर घोटाला हुआ है जिसका खुलासा होना अभी बाकी है। गोरतलब है कि नामामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत चलने वाली अविरल धारा और निर्मल धारा स्कीम में केंद्र की तरफ से करोड़ों का बजट दिया गया था। केंद्र ने प्रोजेक्ट के लिए 20,000 करोड़ का बजट दिया। निर्मल धारा स्कीम के तहत गंगा किनारे बसे अर्बन इलाकों में सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर को एक्सपैंड करना है। दूसरी तरफ अविरल धारा स्कीम के तहत गंगा किनारे के ग्रामीण इलाकों में सीवेज सिस्टम बनाना है।मेरी गङ्गा यात्रा भाग 1जाने कुयू बचपन से लेकर आज तक मेरा गङ्गा जी के प्रति अलग ही लगाव है जाने क्यू हर पल गङ्गा जी का ही सानिध्य हो ऐसा मन चाहता था ओर है! मुझे आज भी याद है वो 1988 का सन जब दुनिया की भीड़ और पत्रकारिता के व्यवसाय से मन उच्चाट होने लगा था यू लगता था कि ये दुनिया मेरे लिये नही है न मैं इस भीड़ का हिस्सा हूं और बिना किसी को बताये
मैंने घर छोड़ दिया ये जानते की सभी अपने चिंतित होंगे पर मेरा मन कहि से कही तक साधु या महात्मा बनने का नही था परन्तु किसी ने सही कहा है होंहि वही जो राम रची राखा
मेरे मानसिक शान्ति का पड़ाव गङ्गा जी के चरणों से होकर निकला, मेरी पहली यात्रा पहाड़ो का मोह नही गङ्गा जी का निर्मल जल धारा थी हरिद्वार की भीड़ मे कभी मन लगा ही नही कभी अगर हरिद्वार रहना भी पड़ा तो अधिक से अधिक नील गङ्गा, सप्तर्षि के किनारे ही शांति मिलती थी अधिक समय घुमक्कड़ बन मैं चम्बा, टिहरी, उतरकाशी, गंगोत्री गोमुख गङ्गा के किनारे रहा एक दो बार मुखबा भी गया ,बस आनन्द मिलता गङ्गा जी के सानिध्य मे,परन्तु गङ्गा जी के प्रति समाज की अनदेखी, निठुरता,और रूखा व्यवहार हमें अखरता था एक और हमारा समाज गङ्गा जी को माँ कहता हैं वही उसका हर तरह अपमान करते है शोषण करते है माँ को मलिन करते हैं
कैसा है ये समाज जिससे मोक्ष की कामना हैं उसे ही मिटाने पर उतारू है हर तरह से जिसको भी अवसर मिल रहा है वह गङ्गा जी का शोषण कर रहा, कोई कम नही सभी अपराधी है, सन्त, व्यपारी,नेता, अधिकारी, पुजारी,कारोबारी, प्रशासन,और सत्ता धारी सभी गङ्गा जी को मिटाना चाहते है आज जब कि लगभग 10 करोड़ लोग गङ्गा से अपनी जीविका चलाते हैं और सभी गङ्गा जल का आचमन करने वाले गङ्गा जी को किसी न किसी रूप से मलिन प्रदुषित कर रहे है
गङ्गा जल को कंधो पर रखकर 200, 200 किलोमीटर या अधिक पैदल यात्रा करने वाले श्रद्धालु भी कम नही है
जो तीर्थ स्थानों और गङ्गा जी मे अपने अतरंग वस्त्र,पन्नी,झूठन को छोड़ आते हैं
शेष भाग कल
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