मेरी गङ्गा यात्रा -8
भारत के सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक गङ्गा जी की क्रमिक हत्या को रही है। गंगा की मुख्य सहायक नदी, यमुना नदी का एक खंड कम से कम एक दशक तक जलीय जीव विहीन रहा है। हरियाणा से यमुना जी का जल नालो का रूप लेने लगता हैं और दिल्ली मे पहुंचकर कृष्ण की प्रिय यमुना काली, बदबूदार, विषैली हो जाती हैं कृष्ण के काल मे काली नाग ने यमुना मे जहर घोलने की कोशिश की थी पर कृष्ण जी न यमुना जी की कालिया से रक्षा की आज शहरी विकास नामक कालिया नाग ने यमुना जी को जहरीला बना दिया है उस काल मे धृतराष्ट्र अंधे थे आज के धृतराष्ट्र तो उसकी तरह आंखों पर पट्टी बंदकर बैठे है ,दिल्ली सरकार हो या केंद्र सरकार किसी को यमुना की स्थिति नजर नही आती , तो गङ्गा जी का क्या कहना
.....हरीहर वो भगीरथ भी एक इंसान था जो धरा पर गङ्गा को लाया हमने क्या अपना फर्ज निभाया हम ने तो बस थोड़े लालच को गङ्गा मे ज़हर बस ज़हर मिलाया इस विकास विकास के नारे ने सारा क्लेश कराया.........
समझ से परे है यह कौन-सी नीति है कि पहले आप गंगा की धारा में जहर डालो और फिर उसे शुद्ध करने के लिए परियोजनाएं लाओ। उस पर भारी-भरकम खर्च करते रहो होना तो यह चाहिए कि गंगा में जहर ही क्यो जाए। अगर जहर जाएगा ही नहीं तो फिर सफाई की ऐसी भारी योजना की स्थायी आवश्यकता कहां से रह जाएगी पर भृष्ट सरकारी तंत्र का खाली पेट कैसे भरेगा,..? नेताओ का भला और राजनीतिक मुददों का क्या होगा मोदी जी तो ऐसे ही सत्ता मे आये है,.. खैर छोड़ो
इस सच्चाई से किसी को परेहज नहीं कि भारत में नदियों के नाम पर अब नाले बहते हैं. जीवनदायिनी गंगा भी इस त्रासदी की शिकार है. गंगा को मां कहकर सत्ता में आई केन्द्र सरकार ने अब गंगा और अन्य नदियों की सफाई का बीड़ा उठाया पर सभी कार्यवाही कागजो पर है.भारतीय संस्कारों में गंगा महज एक नदी नहीं है बल्कि आत्मा के परमात्मा से मिलन का माध्यम है. ऐसा माध्यम जिसे मृत्युलोक पर मोक्षदायिनी बनाने के लिए कठोर तप कर भागीरथ स्वर्ग से धरती पर उतार लाए थे.सदियों सदियों तक करोड़ों लोगों को मोक्ष का अहसास दिलाने वाली गंगा आज खुद अपनी ही संतानों से अपने अस्तित्व को बचाने की प्राथर्ना कर रही है. यह विडंबना सिर्फ गंगा की नहीं बल्कि उसकी अपनी सहोदरा यमुना और देश के तमाम भागों में अपना आंचल खोलकर करोड़ों जीवन संवार रही अन्य नदियों की भी है...जीने मिटा कर हम सुख का अहसास ले रहे हैं..
हिमालय से विशाल रुप में कलकल करती मैदान तक आते आते गंगा और यमुना गंदे नालो का रूप हो जाती हैं जिसके किनारो पर सिर्फ दो पल ठहरना भी कठिन हो गया है,फिर मित्रों उसके चुल्लू भर पानी में आचमन की तो बात ही छोड़िए.
केंद्र सरकार और उमा जी भी जानती कि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में 138 गंदे नाले गंगा में रोजना 6087 मिलियन लीटर से अधिक गंदगी, मल,विषैला, कचरा बहाया जाता है,..
गंगा और इसकी सहयोगी नदियों में 140 बड़े नाले गिर रहे हैं, जो गंगा को स्वच्छ बनाने में बाधक हैं। जब तक इन नालो का कुछ प्रबन्ध नही होता किसी का बाप भी गङ्गा जी व सहयोगी नदियों का बचा नही सकता,.
हर बार लगने वाले कुंभ मेले में बजते गीत 'गंगा तेरा पानी अमृत', मानो हम सन्तों को चिड़ा रहा हो कि करोड़ो सन्तों के होते गङ्गा प्रदूषित व असहाय है भले ही गाने कुंभ के धार्मिक माहौल को उत्सव का रूप देने में सहयोग कर रहे थे लेकिन गंगा जल के प्रदूषण का स्तर श्रद्धालुओं की आस्था पर भारी पर रहा था..वही नशे मे चूर लोगो से क्या आशा हो सकती हैं
गंगानदी में प्रदूषण भार को कम करने के लिए 1985 में राजीव गांधी द्वारा गंगा कार्य योजना या गैप (GAP) का शुभारंभ किया गया था। कार्यक्रम खूब धूमधाम के साथ शुरू किया गया था, लेकिन यह 15 वर्ष की अवधि में 901.71 करोड़ (लगभग 1010) रुपये व्यय करने के बाद नदी में प्रदूषण का स्तर कम करने में विफल रहा बस पैसा का नाश ही हुआ, विद्वानों की माने तो इतने में गङ्गा सोने की हो जाती पर गङ्गा सोनिया की रह गई दिसंबर 2009 में, गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक £ 6000 लाख ($1 अरब) उधार देने पर सहमत हुआ था। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन का अंत करने की पहल का हिस्सा है। इससे पहले 1989 तक इसके पानी को पीने योग्य बनाने सहित, नदी को साफ करने के प्रयास विफल रहे थे सभी प्रयास धाक के तीन पात ही रहे, और गङ्गा विषैली पर विषैली होती गई विज्ञानिको की माने तो आने वाले समय में
गंगा सूख जाएगी और गंगा के प्रवाह क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी का जीवन और भारत की अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी
भारत के सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक गङ्गा जी की क्रमिक हत्या को रही है। गंगा की मुख्य सहायक नदी, यमुना नदी का एक खंड कम से कम एक दशक तक जलीय जीव विहीन रहा है। हरियाणा से यमुना जी का जल नालो का रूप लेने लगता हैं और दिल्ली मे पहुंचकर कृष्ण की प्रिय यमुना काली, बदबूदार, विषैली हो जाती हैं कृष्ण के काल मे काली नाग ने यमुना मे जहर घोलने की कोशिश की थी पर कृष्ण जी न यमुना जी की कालिया से रक्षा की आज शहरी विकास नामक कालिया नाग ने यमुना जी को जहरीला बना दिया है उस काल मे धृतराष्ट्र अंधे थे आज के धृतराष्ट्र तो उसकी तरह आंखों पर पट्टी बंदकर बैठे है ,दिल्ली सरकार हो या केंद्र सरकार किसी को यमुना की स्थिति नजर नही आती , तो गङ्गा जी का क्या कहना
.....हरीहर वो भगीरथ भी एक इंसान था जो धरा पर गङ्गा को लाया हमने क्या अपना फर्ज निभाया हम ने तो बस थोड़े लालच को गङ्गा मे ज़हर बस ज़हर मिलाया इस विकास विकास के नारे ने सारा क्लेश कराया.........
समझ से परे है यह कौन-सी नीति है कि पहले आप गंगा की धारा में जहर डालो और फिर उसे शुद्ध करने के लिए परियोजनाएं लाओ। उस पर भारी-भरकम खर्च करते रहो होना तो यह चाहिए कि गंगा में जहर ही क्यो जाए। अगर जहर जाएगा ही नहीं तो फिर सफाई की ऐसी भारी योजना की स्थायी आवश्यकता कहां से रह जाएगी पर भृष्ट सरकारी तंत्र का खाली पेट कैसे भरेगा,..? नेताओ का भला और राजनीतिक मुददों का क्या होगा मोदी जी तो ऐसे ही सत्ता मे आये है,.. खैर छोड़ो
इस सच्चाई से किसी को परेहज नहीं कि भारत में नदियों के नाम पर अब नाले बहते हैं. जीवनदायिनी गंगा भी इस त्रासदी की शिकार है. गंगा को मां कहकर सत्ता में आई केन्द्र सरकार ने अब गंगा और अन्य नदियों की सफाई का बीड़ा उठाया पर सभी कार्यवाही कागजो पर है.भारतीय संस्कारों में गंगा महज एक नदी नहीं है बल्कि आत्मा के परमात्मा से मिलन का माध्यम है. ऐसा माध्यम जिसे मृत्युलोक पर मोक्षदायिनी बनाने के लिए कठोर तप कर भागीरथ स्वर्ग से धरती पर उतार लाए थे.सदियों सदियों तक करोड़ों लोगों को मोक्ष का अहसास दिलाने वाली गंगा आज खुद अपनी ही संतानों से अपने अस्तित्व को बचाने की प्राथर्ना कर रही है. यह विडंबना सिर्फ गंगा की नहीं बल्कि उसकी अपनी सहोदरा यमुना और देश के तमाम भागों में अपना आंचल खोलकर करोड़ों जीवन संवार रही अन्य नदियों की भी है...जीने मिटा कर हम सुख का अहसास ले रहे हैं..
हिमालय से विशाल रुप में कलकल करती मैदान तक आते आते गंगा और यमुना गंदे नालो का रूप हो जाती हैं जिसके किनारो पर सिर्फ दो पल ठहरना भी कठिन हो गया है,फिर मित्रों उसके चुल्लू भर पानी में आचमन की तो बात ही छोड़िए.
केंद्र सरकार और उमा जी भी जानती कि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में 138 गंदे नाले गंगा में रोजना 6087 मिलियन लीटर से अधिक गंदगी, मल,विषैला, कचरा बहाया जाता है,..
गंगा और इसकी सहयोगी नदियों में 140 बड़े नाले गिर रहे हैं, जो गंगा को स्वच्छ बनाने में बाधक हैं। जब तक इन नालो का कुछ प्रबन्ध नही होता किसी का बाप भी गङ्गा जी व सहयोगी नदियों का बचा नही सकता,.
हर बार लगने वाले कुंभ मेले में बजते गीत 'गंगा तेरा पानी अमृत', मानो हम सन्तों को चिड़ा रहा हो कि करोड़ो सन्तों के होते गङ्गा प्रदूषित व असहाय है भले ही गाने कुंभ के धार्मिक माहौल को उत्सव का रूप देने में सहयोग कर रहे थे लेकिन गंगा जल के प्रदूषण का स्तर श्रद्धालुओं की आस्था पर भारी पर रहा था..वही नशे मे चूर लोगो से क्या आशा हो सकती हैं
गंगानदी में प्रदूषण भार को कम करने के लिए 1985 में राजीव गांधी द्वारा गंगा कार्य योजना या गैप (GAP) का शुभारंभ किया गया था। कार्यक्रम खूब धूमधाम के साथ शुरू किया गया था, लेकिन यह 15 वर्ष की अवधि में 901.71 करोड़ (लगभग 1010) रुपये व्यय करने के बाद नदी में प्रदूषण का स्तर कम करने में विफल रहा बस पैसा का नाश ही हुआ, विद्वानों की माने तो इतने में गङ्गा सोने की हो जाती पर गङ्गा सोनिया की रह गई दिसंबर 2009 में, गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक £ 6000 लाख ($1 अरब) उधार देने पर सहमत हुआ था। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन का अंत करने की पहल का हिस्सा है। इससे पहले 1989 तक इसके पानी को पीने योग्य बनाने सहित, नदी को साफ करने के प्रयास विफल रहे थे सभी प्रयास धाक के तीन पात ही रहे, और गङ्गा विषैली पर विषैली होती गई विज्ञानिको की माने तो आने वाले समय में
गंगा सूख जाएगी और गंगा के प्रवाह क्षेत्र में रहने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी का जीवन और भारत की अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी

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