मेरी गङ्गा यात्रा भाग-5
हम सभी गङ्गा जी और उनकी सहायक नदियां की चिंता जनक स्थिति से अवगत है पर कोई सार्थक प्रयास नही हो पा रहा , यही हमारे देश वासीयो की विडम्बना है सभी भेड़ चाल को पसंद करते है कोई ठोस निर्णय नही होता , देश मे कोई बड़ी घटना हो तो सभी राजनीति करने लगते हैं पर राजनीति भी की, दो चार दिन का जोश, फिर गुब्बारे की मानो हवा निकल गई हो सब ठंडे के ठंडे ,मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते मानो गङ्गा जी की सुध लेने वालों की बड़ा सी आ गई थी , सभी गङ्गा जी पर राजनीति करने लगे थे हर टी वी चैनल को गङ्गा की मानो चिंता सी हो गए थी , न्यूज चैनल पर गङ्गा ही गङ्गा , सोशल मीडिया पर रोज नये नये ब्लॉग, नजर आने लगे थे यू लगा गङ्गा जाग्रति की क्रांति सी आ गई हो आज दो वर्ष के बाद सब मानो बर्फ मे लग गये सभी को पक्का पकाया चाहिए कोई परिश्रम नही करना चाहता,ऐसे मे गङ्गा जी का नाश नही सवा सत्या नाश हो गया भारतीय संस्कूति का आधार स्तंभ मानी जाने वाली गंगा पर राजनीति ही चरम पर है। और कुछ भी नही,दिन-रात गंगा की स्तुति में लीन रहने वाले इसके मानस पुत्र इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के जमीनी प्रयास करने के बजाय 'गंगा बचाओ के नाम से और गङ्गा के नाम से संगठन बना अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। हिन्दू धर्म एवं संस्कूति के कथित ठेकेदार और धर्मगुरु धर्म की आड़ में माँ गंगा को भोग-विलास, मनोरंजन, एवं व्यवसाय का केंद्र बनाकर भौतिकवाद में डूबे हुए हैं। पीछे योग गुरु रामदेव, परमार्थ निकेतन ऋषिकेश के सर्वेसर्वा स्वामी चिदानंद मुनि एवं स्वामी हंसदास ने 'गंगा रक्षा मंच' बनाया। स्वामी रामदेव ने उस समय शपथ ली थी कि जिस प्रकार योग को पूरे भारत में लोकप्रिय बना दिया है, ठीक उसी प्रकार गंगा को मैला होने से रोकने के लिए क्रांति लायेंगे। इन लोगों के साथ हरिद्वार, ऋषिकेश के कई संतों ने भी गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के लिए उनका सहयोग करने की कसम खाई थी। 'गंगा रक्षा मंच' बनने के कुछ समय बाद ही मंच की हकीकत सामने आ गई। संतों की आपसी राजनीति का शिकार 'गंगा बचाओ अभियान' हुआ। गङ्गा फिर वही की वही, सब मदारी खेल बन कर रह गया , क्यो हो न हो व्यवसाय भी तो करना है बड़े बड़े महाराज हैं खर्च भी तो अधिक है सारा समय गङ्गा गङ्गा ही थोड़े करना है तब से गङ्गा जी की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया,
बल्कि इसमें प्रदूषण और बढ़ा ही है। जब धार्मिक दृष्टि से वैज्ञानिक आधार पर अन्य नदियों से बेहतर है,गङ्गा जल मे कीड़े नही पड़ते,गङ्गा जल सड़ता नही हैं तो भी लोग गंगा को लेकर चिंतित नहीं हैं। गंगा के प्रदूषित होने को लेकर बैठक पर बैठक, रैली,और रैलियों की बाढ़ ,सम्मेलन, यात्रा निकाली जाती हैं, पर राजनेताओं की ओछी राजनीति के नीचे जैसे अन्य अच्छी बातें दफन हो गई, वैसे ही पवित्र गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का मुद्दा भी दब कर रह जाता है, गङ्गा वही सिसकियां ले रही हैं और धर्म पुत्र 5 स्टार आश्रमो मे आनन्द का परमानन्द,
फिर परिणाम गङ्गा जी को धर्म से जोड़ कर, भगवान भरोसे
छोड़,...गंगा अस्तित्व की लड़ाई लडऩे को छोड़ दिया जाता है, हालांकि सरकार गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर चुकी है।पर सरकार ही, आम जनता मैं वही गङ्गा आवश्यकता के लिये है बस , झूठन छोड़ने का स्थान,यू यो गंगा एक्शन प्लान और राष्ट्रीय नदी सरंक्षण योजना चल चुकी है, पर इस सब का कहीं असर नहीं दिख रहा है। अगर गंगा के प्रदूषित होने में कोई कमी आई है, तो वह सिर्फ सरकार को ही दिख रही होगी।या सरकारी मंत्रियों को वास्तविकता यही है कि गंगा लगातार प्रदूषित होती जा रही है। आज हालात यह हैं कि कहीं-कहीं गंगाजल कीचडय़ुक्त पानी से भी बदतर है। इसीलिए आचमन और स्नान करते समय श्रद्धालुओं को आंखें बंद करनी पड़ती हैं गंगा नदी की लम्बाई 2507 किलोमीटर है। गंगा की सफाई के प्रति जरूरी है समाज के सभी वर्गों को जागरूक बनाया जा सके। गंंगा की सफाई का मसला देश के बिगड़ते पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है।मुझे लगता है संतों को इस मामले में एक होना होगा, और इस तरह से इस दिशा में पहल करनी चाहिए।कुछ सार्थक} हो , कुछ भले सख्त कदम उठाने पड़े,जो नगर और महा नगर गंगा के किनारे बसे हुए हैं, उनकी नालियों और नालों के जरिए अत्यंत ही प्रदूषित जल सीधे गंगा में बहाया जा रहा है।पटना में ऐसे 29 नाले हैं जो गंगा को रोज- रोज प्रदूषित कर रहे हैं।
शेष कल
हम सभी गङ्गा जी और उनकी सहायक नदियां की चिंता जनक स्थिति से अवगत है पर कोई सार्थक प्रयास नही हो पा रहा , यही हमारे देश वासीयो की विडम्बना है सभी भेड़ चाल को पसंद करते है कोई ठोस निर्णय नही होता , देश मे कोई बड़ी घटना हो तो सभी राजनीति करने लगते हैं पर राजनीति भी की, दो चार दिन का जोश, फिर गुब्बारे की मानो हवा निकल गई हो सब ठंडे के ठंडे ,मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते मानो गङ्गा जी की सुध लेने वालों की बड़ा सी आ गई थी , सभी गङ्गा जी पर राजनीति करने लगे थे हर टी वी चैनल को गङ्गा की मानो चिंता सी हो गए थी , न्यूज चैनल पर गङ्गा ही गङ्गा , सोशल मीडिया पर रोज नये नये ब्लॉग, नजर आने लगे थे यू लगा गङ्गा जाग्रति की क्रांति सी आ गई हो आज दो वर्ष के बाद सब मानो बर्फ मे लग गये सभी को पक्का पकाया चाहिए कोई परिश्रम नही करना चाहता,ऐसे मे गङ्गा जी का नाश नही सवा सत्या नाश हो गया भारतीय संस्कूति का आधार स्तंभ मानी जाने वाली गंगा पर राजनीति ही चरम पर है। और कुछ भी नही,दिन-रात गंगा की स्तुति में लीन रहने वाले इसके मानस पुत्र इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के जमीनी प्रयास करने के बजाय 'गंगा बचाओ के नाम से और गङ्गा के नाम से संगठन बना अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। हिन्दू धर्म एवं संस्कूति के कथित ठेकेदार और धर्मगुरु धर्म की आड़ में माँ गंगा को भोग-विलास, मनोरंजन, एवं व्यवसाय का केंद्र बनाकर भौतिकवाद में डूबे हुए हैं। पीछे योग गुरु रामदेव, परमार्थ निकेतन ऋषिकेश के सर्वेसर्वा स्वामी चिदानंद मुनि एवं स्वामी हंसदास ने 'गंगा रक्षा मंच' बनाया। स्वामी रामदेव ने उस समय शपथ ली थी कि जिस प्रकार योग को पूरे भारत में लोकप्रिय बना दिया है, ठीक उसी प्रकार गंगा को मैला होने से रोकने के लिए क्रांति लायेंगे। इन लोगों के साथ हरिद्वार, ऋषिकेश के कई संतों ने भी गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के लिए उनका सहयोग करने की कसम खाई थी। 'गंगा रक्षा मंच' बनने के कुछ समय बाद ही मंच की हकीकत सामने आ गई। संतों की आपसी राजनीति का शिकार 'गंगा बचाओ अभियान' हुआ। गङ्गा फिर वही की वही, सब मदारी खेल बन कर रह गया , क्यो हो न हो व्यवसाय भी तो करना है बड़े बड़े महाराज हैं खर्च भी तो अधिक है सारा समय गङ्गा गङ्गा ही थोड़े करना है तब से गङ्गा जी की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया,
बल्कि इसमें प्रदूषण और बढ़ा ही है। जब धार्मिक दृष्टि से वैज्ञानिक आधार पर अन्य नदियों से बेहतर है,गङ्गा जल मे कीड़े नही पड़ते,गङ्गा जल सड़ता नही हैं तो भी लोग गंगा को लेकर चिंतित नहीं हैं। गंगा के प्रदूषित होने को लेकर बैठक पर बैठक, रैली,और रैलियों की बाढ़ ,सम्मेलन, यात्रा निकाली जाती हैं, पर राजनेताओं की ओछी राजनीति के नीचे जैसे अन्य अच्छी बातें दफन हो गई, वैसे ही पवित्र गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का मुद्दा भी दब कर रह जाता है, गङ्गा वही सिसकियां ले रही हैं और धर्म पुत्र 5 स्टार आश्रमो मे आनन्द का परमानन्द,
फिर परिणाम गङ्गा जी को धर्म से जोड़ कर, भगवान भरोसे
छोड़,...गंगा अस्तित्व की लड़ाई लडऩे को छोड़ दिया जाता है, हालांकि सरकार गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर चुकी है।पर सरकार ही, आम जनता मैं वही गङ्गा आवश्यकता के लिये है बस , झूठन छोड़ने का स्थान,यू यो गंगा एक्शन प्लान और राष्ट्रीय नदी सरंक्षण योजना चल चुकी है, पर इस सब का कहीं असर नहीं दिख रहा है। अगर गंगा के प्रदूषित होने में कोई कमी आई है, तो वह सिर्फ सरकार को ही दिख रही होगी।या सरकारी मंत्रियों को वास्तविकता यही है कि गंगा लगातार प्रदूषित होती जा रही है। आज हालात यह हैं कि कहीं-कहीं गंगाजल कीचडय़ुक्त पानी से भी बदतर है। इसीलिए आचमन और स्नान करते समय श्रद्धालुओं को आंखें बंद करनी पड़ती हैं गंगा नदी की लम्बाई 2507 किलोमीटर है। गंगा की सफाई के प्रति जरूरी है समाज के सभी वर्गों को जागरूक बनाया जा सके। गंंगा की सफाई का मसला देश के बिगड़ते पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है।मुझे लगता है संतों को इस मामले में एक होना होगा, और इस तरह से इस दिशा में पहल करनी चाहिए।कुछ सार्थक} हो , कुछ भले सख्त कदम उठाने पड़े,जो नगर और महा नगर गंगा के किनारे बसे हुए हैं, उनकी नालियों और नालों के जरिए अत्यंत ही प्रदूषित जल सीधे गंगा में बहाया जा रहा है।पटना में ऐसे 29 नाले हैं जो गंगा को रोज- रोज प्रदूषित कर रहे हैं।
शेष कल

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