मेरी गङ्गा यात्रा भाग-6
मेरी अध्यात्म यात्रा का मुख्य पड़ाव उत्तराखण्ड ही था विशेष रूप से उत्तरकाशी से ऊपर वह स्थान जो गङ्गा जी के साथ के थे, भटवाड़ी,पराशर आश्रम का गर्म कुण्ड हो सकी की कठिन पहाड़ी की चढ़ाई हो,मुखबा, हर्षिल, भैरव घाटी मानो स्वर्ग धरती पर आ बसा हो शीतल मन्द मन्द वायु आत्मा तक को जाग्रत कर देती हैं सच है ध्यान तो यहाँ खुली आंखों से लग जाता है उत्तराखण्ड के चार धाम में गंगोत्री एक महत्वपूर्ण धाम है। यहाँ से गङ्गा जी सूरज कुण्ड मे गिरती है जो अत्यंत सुंदर दृश्य बनता हैं या गङ्गा जी का भव्य मन्दिर है गंगोत्री गोमुख से १८ किलोमीटर नीचे है। यहां सैकड़ों धर्मशालाएं यात्रियों के ठहरने के लिए बने हैं। इसके अलावा देश के कथित कई बड़े बाबाओं के आश्रम भी गंगोत्री में हैं। प्रायः ये आश्रम अतिक्रमण की जमीन पर गंगा किनारे बनाए गए हैं। यहां के धर्मशालाएं और आश्रम बड़े-बड़े होटल में तब्दील हो चुके हैं। इन आश्रमों एवं धर्मशालाओं का गंदा पानी, ट्वायलेट आदि गंगा में ही बहाये जाते हैं। एक भी आश्रम में इसे ठिकाने लगाने के लिए व्यवस्था नहीं है। शंकर मठ, पंजाब सिंध क्षेत्र धर्मशाला सहित कई आश्रम का गंदा पानी सीधे गंगा में डाला जा रहा है।गंगोत्री मन्दिर के बाहर विशाल बाजार है जो आने जाने वाले यात्रियों की हर प्रकार की पूर्ति करता हैं तो सोचो इनका निकलने वाला वेस्ट पानी कहा जाता होगा यहां इस के लिये कोई व्यवस्था है ही नई ,सुनता यहां कई साल पहले सीवर लाइन बिछाने की योजना बनायी गयी और सीवर ट्रीटमेंट प्लांट के लिए चार करोड़ ३० लाख रुपये का बजट स्वीकृत भी किया गया। फिर भी अभी तक न सीवर बना है और न ही सीवर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण पूरा किया जा सका है।सीवर लाइन और सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बनने से पहले ही विवादों में घिर गये हैं। सीवर लाइन पवित्र भगीरथ शिला के ऊपर से बिछाई जा रही है। सीवर लिफ्ट करने के लिए सूर्यकुंड द्घाट के सामने पंपिंग स्टेशन बनाया जा रहा है। इसके अलावा ट्रीटमेंट प्लांट भी गंगा किनारे बनाया जा रहा है। सीवर लिफ्ट यानी सीवर टैंक सूर्यकुंड के ऊपर बनने से सूर्यकुंड का अस्तित्व खतरे में है। वहीं गंगा तट पर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने से इसके खराब होने पर पूरी गंदगी गंगा में ही बहायी जायेगी। इससे सीवर ट्रीटमेंट प्लांट का कोई फायदा नजर नहीं आ रहा था सीजन के दौरान 8से 15 हजार तीर्थयात्री गंगोत्री आते हैं। इनके अलावा इस दौरान हजारों पंडे, पुजारियों के अलावा दुकानदार, पुलिसकर्मी सहित गंगोत्री में 25 से 30 हजार की भीड़ होती है। यह सीजन छह महीने का होता है। अर्थात प्रत्येक साल सीजन के दौरान करीब 30 ,35 हजार लोगों की गंदगी गंगा में रोजाना बहायी जाती है। प्लास्टिक, कूड़ा कचरा अलग। इस गंदगी को ट्रीटमेंट करने के लिए ही सीवर ट्रीटमेंट प्लान बनाने की योजना गंगोत्री में चल रही है। लेकिन मंदिर समिति सहित पुजारी इस का विरोध कर रहे हैं। धीरे धीरे पिछले 20 वर्षो मे लोगो मे जब से ट्रकिंग का रुझान बढ़ा है यात्रियों ने विशेष विदेशी लोगो मे गोमुख की ओर बढ़ना आरम्भ कर दिया है जो परेशानी अभी तक गंगोत्री तक थी वो गोमुख का नाश करने लगी यात्रियों ने गोमुख को गंदा कर दिया कांवड़ के नाम पर भी गोमुख को गंदा करना आरम्भ हो गया वही लोग अपने अतरंग वस्त्र छोड़ने लगे जो मानो धर्म की शान्ति कर रहे हो, 20 से अधिक टैंट भोज वास मे लगे है जो यात्रियों की सुख सुविधा का प्रबंध करते हैं प्रति वर्ष गोमुख पर जाने वालों की संख्या 2 से 4 हजार होने लगी तो सोचो गङ्गा प्रदूषण नीचे से नही ऊपर भी आरम्भ हो गई हैं पहाड़ शौच घर होते जा रहे , धर्म यात्रा धर्म न होकर पिकनिक केंद्र हो
कर हर गये है शराब की खाली बोतल सब सच्चाई को कहती हैं
ये कैसा धर्म जागरण और धर्म यात्रा हो रही है भगवान ही जाने , फिर अगर गङ्गा मे या पहाड़ मे प्रलय आये तो भगवान का सब कसूर,क्यो इन सब दर्शय को देख मन विचलित होता है कहा जा रही हैं हमारी संस्कृति , क्या मिलेंगे प्रदूषण मुक्त पहाड़ व गङ्गा आने वाली पीढ़ियों को,
मेरी अध्यात्म यात्रा का मुख्य पड़ाव उत्तराखण्ड ही था विशेष रूप से उत्तरकाशी से ऊपर वह स्थान जो गङ्गा जी के साथ के थे, भटवाड़ी,पराशर आश्रम का गर्म कुण्ड हो सकी की कठिन पहाड़ी की चढ़ाई हो,मुखबा, हर्षिल, भैरव घाटी मानो स्वर्ग धरती पर आ बसा हो शीतल मन्द मन्द वायु आत्मा तक को जाग्रत कर देती हैं सच है ध्यान तो यहाँ खुली आंखों से लग जाता है उत्तराखण्ड के चार धाम में गंगोत्री एक महत्वपूर्ण धाम है। यहाँ से गङ्गा जी सूरज कुण्ड मे गिरती है जो अत्यंत सुंदर दृश्य बनता हैं या गङ्गा जी का भव्य मन्दिर है गंगोत्री गोमुख से १८ किलोमीटर नीचे है। यहां सैकड़ों धर्मशालाएं यात्रियों के ठहरने के लिए बने हैं। इसके अलावा देश के कथित कई बड़े बाबाओं के आश्रम भी गंगोत्री में हैं। प्रायः ये आश्रम अतिक्रमण की जमीन पर गंगा किनारे बनाए गए हैं। यहां के धर्मशालाएं और आश्रम बड़े-बड़े होटल में तब्दील हो चुके हैं। इन आश्रमों एवं धर्मशालाओं का गंदा पानी, ट्वायलेट आदि गंगा में ही बहाये जाते हैं। एक भी आश्रम में इसे ठिकाने लगाने के लिए व्यवस्था नहीं है। शंकर मठ, पंजाब सिंध क्षेत्र धर्मशाला सहित कई आश्रम का गंदा पानी सीधे गंगा में डाला जा रहा है।गंगोत्री मन्दिर के बाहर विशाल बाजार है जो आने जाने वाले यात्रियों की हर प्रकार की पूर्ति करता हैं तो सोचो इनका निकलने वाला वेस्ट पानी कहा जाता होगा यहां इस के लिये कोई व्यवस्था है ही नई ,सुनता यहां कई साल पहले सीवर लाइन बिछाने की योजना बनायी गयी और सीवर ट्रीटमेंट प्लांट के लिए चार करोड़ ३० लाख रुपये का बजट स्वीकृत भी किया गया। फिर भी अभी तक न सीवर बना है और न ही सीवर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण पूरा किया जा सका है।सीवर लाइन और सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बनने से पहले ही विवादों में घिर गये हैं। सीवर लाइन पवित्र भगीरथ शिला के ऊपर से बिछाई जा रही है। सीवर लिफ्ट करने के लिए सूर्यकुंड द्घाट के सामने पंपिंग स्टेशन बनाया जा रहा है। इसके अलावा ट्रीटमेंट प्लांट भी गंगा किनारे बनाया जा रहा है। सीवर लिफ्ट यानी सीवर टैंक सूर्यकुंड के ऊपर बनने से सूर्यकुंड का अस्तित्व खतरे में है। वहीं गंगा तट पर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने से इसके खराब होने पर पूरी गंदगी गंगा में ही बहायी जायेगी। इससे सीवर ट्रीटमेंट प्लांट का कोई फायदा नजर नहीं आ रहा था सीजन के दौरान 8से 15 हजार तीर्थयात्री गंगोत्री आते हैं। इनके अलावा इस दौरान हजारों पंडे, पुजारियों के अलावा दुकानदार, पुलिसकर्मी सहित गंगोत्री में 25 से 30 हजार की भीड़ होती है। यह सीजन छह महीने का होता है। अर्थात प्रत्येक साल सीजन के दौरान करीब 30 ,35 हजार लोगों की गंदगी गंगा में रोजाना बहायी जाती है। प्लास्टिक, कूड़ा कचरा अलग। इस गंदगी को ट्रीटमेंट करने के लिए ही सीवर ट्रीटमेंट प्लान बनाने की योजना गंगोत्री में चल रही है। लेकिन मंदिर समिति सहित पुजारी इस का विरोध कर रहे हैं। धीरे धीरे पिछले 20 वर्षो मे लोगो मे जब से ट्रकिंग का रुझान बढ़ा है यात्रियों ने विशेष विदेशी लोगो मे गोमुख की ओर बढ़ना आरम्भ कर दिया है जो परेशानी अभी तक गंगोत्री तक थी वो गोमुख का नाश करने लगी यात्रियों ने गोमुख को गंदा कर दिया कांवड़ के नाम पर भी गोमुख को गंदा करना आरम्भ हो गया वही लोग अपने अतरंग वस्त्र छोड़ने लगे जो मानो धर्म की शान्ति कर रहे हो, 20 से अधिक टैंट भोज वास मे लगे है जो यात्रियों की सुख सुविधा का प्रबंध करते हैं प्रति वर्ष गोमुख पर जाने वालों की संख्या 2 से 4 हजार होने लगी तो सोचो गङ्गा प्रदूषण नीचे से नही ऊपर भी आरम्भ हो गई हैं पहाड़ शौच घर होते जा रहे , धर्म यात्रा धर्म न होकर पिकनिक केंद्र हो
कर हर गये है शराब की खाली बोतल सब सच्चाई को कहती हैं
ये कैसा धर्म जागरण और धर्म यात्रा हो रही है भगवान ही जाने , फिर अगर गङ्गा मे या पहाड़ मे प्रलय आये तो भगवान का सब कसूर,क्यो इन सब दर्शय को देख मन विचलित होता है कहा जा रही हैं हमारी संस्कृति , क्या मिलेंगे प्रदूषण मुक्त पहाड़ व गङ्गा आने वाली पीढ़ियों को,

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