माँ गंगा की चर्चा आते ही जाने कुयू मन मे कुछ सरसरी होने लगती हैं वह नदी,जो बहती जलधारा से कुछ अधिक है वह नदी जिसे सदियों सदियों से हमारे पूर्वज पूजते आये है निरन्तर, प्रतिदिन बहने वाली सभी को सुख और पुण्य, देनी वाली मोक्षदायिनी, जीवनदायिनी माँ है ये गङ्गा,
बिना भेदभाव,निस्वार्थ भाव बिना संकोच सभी का पालन पोषण करती है माँ गंगा,
किसी के लिये हो या न हो मेरे लिये मॉ हैं गङ्गा,
हरिहर मेरी अनन्त सांसो का प्रवाह है मां गंगा,
आज भी मुझे याद जब पहली बार मैंने बहते रूप मे गङ्गा जी को देखा था निर्मल विशाल , कलकल करता सुंदर रूप और देखते देखते मात्र 30 वर्षो से क्या से क्या हो गया
एक माह में मैने गङ्गा जी दोनों रूप देखै, पहला हरिद्वार दूसरा
कानपुर वाराणसी कलकत्ता, जहाँ एक और 30 वर्ष पूर्व हरिद्वार मे गङ्गा का जल पवित्र और निर्मल था वही कानपुर से आगे बदरंग होने लगा था
भारतीय जन मानस के पापो को धोते धोते आज गङ्गा की धारा मलील होने लगी हैं वाराणसी के घाटों पर रहने वाली पीढ़ीया गवाह है गंगे आहो की, आज भी गङ्गा जी की लहरों मे अपनो के दिये दर्द की सिसकियों साफ सुनाई देती हैं बस ह्रदय की गहराईयों से सुनने वाले हो जीने भी गङ्गा जी की सिसकियां आहे सुनाई दी ! वह क्या रुका, संख्या नही कितने गङ्गा जी को निर्मल पावन, कलकल बहता देने के लिये बलिदान हो गये
गङ्गा जल के तेज मिटाना षड्यंत्र है :-
भारतीय सँस्कृति का मूलभूत स्तम्भ है गङ्गा और हमारी सँस्कृति को खंडित करना विदेशी हमला वारो , और धर्म परिवर्तन करने वालो का मुख्य लक्ष्य था किसी भी सँस्कृति को मिटाना हो तो उसके विश्वास ओर श्रद्धा पर चोट करना जरूरी रहा , जान भुजकर गङ्गा जी की पवित्रता को मिटाने के लिये गङ्गा के नजदीक पशु कत्लगाह, चमड़ा उद्योग, रंगरेज, आदि आदि कामो को बसा गया गङ्गा प्रदूषण आज की बोयी समस्या नही है
1 हज़ार से अधिक वर्ष हो गये गङ्गा प्रदूषण को जन्म लिये सभी हमलावरों का एक ही उद्देश्य रहा सँस्कृति पर चोट , और वो इसमें सफल भी रहे क्योकि हमारे यहां घर के भेदी, विभीषण,शकुनि, आदि कम नही रहे
बिना भेदभाव,निस्वार्थ भाव बिना संकोच सभी का पालन पोषण करती है माँ गंगा,
किसी के लिये हो या न हो मेरे लिये मॉ हैं गङ्गा,
हरिहर मेरी अनन्त सांसो का प्रवाह है मां गंगा,
आज भी मुझे याद जब पहली बार मैंने बहते रूप मे गङ्गा जी को देखा था निर्मल विशाल , कलकल करता सुंदर रूप और देखते देखते मात्र 30 वर्षो से क्या से क्या हो गया
एक माह में मैने गङ्गा जी दोनों रूप देखै, पहला हरिद्वार दूसरा
कानपुर वाराणसी कलकत्ता, जहाँ एक और 30 वर्ष पूर्व हरिद्वार मे गङ्गा का जल पवित्र और निर्मल था वही कानपुर से आगे बदरंग होने लगा था
भारतीय जन मानस के पापो को धोते धोते आज गङ्गा की धारा मलील होने लगी हैं वाराणसी के घाटों पर रहने वाली पीढ़ीया गवाह है गंगे आहो की, आज भी गङ्गा जी की लहरों मे अपनो के दिये दर्द की सिसकियों साफ सुनाई देती हैं बस ह्रदय की गहराईयों से सुनने वाले हो जीने भी गङ्गा जी की सिसकियां आहे सुनाई दी ! वह क्या रुका, संख्या नही कितने गङ्गा जी को निर्मल पावन, कलकल बहता देने के लिये बलिदान हो गये
गङ्गा जल के तेज मिटाना षड्यंत्र है :-
भारतीय सँस्कृति का मूलभूत स्तम्भ है गङ्गा और हमारी सँस्कृति को खंडित करना विदेशी हमला वारो , और धर्म परिवर्तन करने वालो का मुख्य लक्ष्य था किसी भी सँस्कृति को मिटाना हो तो उसके विश्वास ओर श्रद्धा पर चोट करना जरूरी रहा , जान भुजकर गङ्गा जी की पवित्रता को मिटाने के लिये गङ्गा के नजदीक पशु कत्लगाह, चमड़ा उद्योग, रंगरेज, आदि आदि कामो को बसा गया गङ्गा प्रदूषण आज की बोयी समस्या नही है
1 हज़ार से अधिक वर्ष हो गये गङ्गा प्रदूषण को जन्म लिये सभी हमलावरों का एक ही उद्देश्य रहा सँस्कृति पर चोट , और वो इसमें सफल भी रहे क्योकि हमारे यहां घर के भेदी, विभीषण,शकुनि, आदि कम नही रहे

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