मेरी गङ्गा यात्रा भाग -7
मित्रो हम सभी मन से चाहते हैं गङ्गा जी और भारत की सभी नदियाँ प्रदूषण मुक्त हो, इसके लिये सभी मन से प्राथर्ना करते हैं
पर इसके साथ प्रण करना होगा कि हम नदियों मे मल का जल, कचरा नहीडालेंगे और नही अपने उधोगो का विषैला पानी नदियों मे जाने देंगे संगठित} हो कर नदियोँ मे जाने वाले नालो का समाधान निकालने के लिये} राज्य, व केंद्र सरकारों पर दबाब बनायेंगे ऐसा न हो एक तरफ हम पूजा करते रहे तो दूसरी तरफ गंगा में गंदगी फेंक रहे. एक ही पुल .आपके कानपुर सीसामउ के इस नाले से रोज 14 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में इसी रफ्तार से गिरता है. .गंगा को मैली करने का 80 प्रतिशत दोषी मलमूत्र वाला वो गंदा पानी है जो 400 करोड़ लीटर प्रतिदिन की दर से गंगा में गिरता है. धन्य है छोरा गङ्गा किनारे वाला, धन्य है पुर्व के धर्मपुत्र धुरंदर जो गङ्गा का नाश होता देख रहे है सबसे अधिक नाश कानपुर में चमड़ा फैक्ट्री ने किया है जो गंगा को जहरीला बना रहा है
कानपुर को भारत का मैनचेस्टर भी कहा जाता है. यहां के उद्योगों के कारण. लेकिन यही उद्योग कानुपर में गंगा को मैला और जहरीला कर रहे हैं.मैंने अपनी आँखों से देखा कानपुर मे गङ्गा का जल काला दुर्गंध युक्त हो जाता है कानपुर मे शायद गङ्ग प्रेमी नही है या उन्हें काली और मैली गङ्गा ही अच्छी लगती है सीसामउ के नाले से रोज 14 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में इसी रफ्तार से गिरता है. इसमें फैक्टरियों से निकलने वाला पानी भी 90 लाख लीटर गंदा पानी शामिल हैं जिसमें कई खतरनाक रसायन होते हैं. कानपुर में करीब 700 फैक्ट्रियां हैं जिनमें से करीब सौ को खतरनाक माना गया है. चमड़ा फैक्टरी मालिकों का कहना है कि कानपुर में जितना गंदा पानी गंगा में गिरता है उसमें चमड़ा फैक्टरियों का योगदान सिर्फ आठ फीसद ही है वो भी साफ करके ही गंगा में डाला जाता है.
कानपुर से जुड़े लोगों का माने तो गैप वन और JOUR में करोड़ों रूपया खर्च होने के बाद भी जहरीले रसायन पानी गंगा
में जा रहा है मोदी सरकार की नमामि गंगे के तहत फैक्टरियों के लिए एक हजार करोड़ रुपये रखे गये थे.इनसे गंदे पानी का साफ करने के संयंत्र भी लगने थे और साथ ही नई तकनीक पर भी पैसा खर्च होना था पर क्या हुआ..? . मकसद ये है कि फैक्टरियों में ही गंदे पानी को एक हद तक साफ किया जा सके। कानपुर में अब तक के अनुभव यही है कि पैसा खर्च होने के बाद भी गंगा साफ नहीं हुई है. कानपुर में गंगा में गंदगी की वजह है नाले मे बदल रही हैं
गंगा को मैली करने का 80 प्रतिशत दोषी मलमूत्र वाला वो गंदा पानी है जो 400 करोड़ लीटर प्रतिदिन की दर से गंगा में गिरता है. आपको जानकर हैरानी होगी की गंगा में गंदे नालों को छोड़ने की शुरुआत एक सरकारी आदेश से हुई थी. माने तो यह गङ्गा को मिटाने का षड्यंत्र ही था 1932 से हुई शुरूआत आज गंगा के लिए मुसीबत बन गई है.आज 85 वर्षो से ब दस्तूर जारी है जब की मालवीय जी ने गङ्गा जी के दर्द को समझकर 1911 मे गङ्गा जी को बचाने के लिये आवाज उठाई थी तो,भी सरकारी आदेश क्यो दिया गया ? कारण हिन्दू सँस्कृति को मिटा है तो गङ्गा को मिटाना परम् आवश्यक है कानपुर की चमड़ा फैक्ट्री ने किया है गंगा को सबसे जहरीला कानपुर को भारत का मैनचेस्टर भी कहा जाता है. यहां के उद्योगों के कारण. लेकिन यही उद्योग कानुपर में गंगा को मैला और जहरीला कर रहे है
मित्रो हम सभी मन से चाहते हैं गङ्गा जी और भारत की सभी नदियाँ प्रदूषण मुक्त हो, इसके लिये सभी मन से प्राथर्ना करते हैं
पर इसके साथ प्रण करना होगा कि हम नदियों मे मल का जल, कचरा नहीडालेंगे और नही अपने उधोगो का विषैला पानी नदियों मे जाने देंगे संगठित} हो कर नदियोँ मे जाने वाले नालो का समाधान निकालने के लिये} राज्य, व केंद्र सरकारों पर दबाब बनायेंगे ऐसा न हो एक तरफ हम पूजा करते रहे तो दूसरी तरफ गंगा में गंदगी फेंक रहे. एक ही पुल .आपके कानपुर सीसामउ के इस नाले से रोज 14 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में इसी रफ्तार से गिरता है. .गंगा को मैली करने का 80 प्रतिशत दोषी मलमूत्र वाला वो गंदा पानी है जो 400 करोड़ लीटर प्रतिदिन की दर से गंगा में गिरता है. धन्य है छोरा गङ्गा किनारे वाला, धन्य है पुर्व के धर्मपुत्र धुरंदर जो गङ्गा का नाश होता देख रहे है सबसे अधिक नाश कानपुर में चमड़ा फैक्ट्री ने किया है जो गंगा को जहरीला बना रहा है
कानपुर को भारत का मैनचेस्टर भी कहा जाता है. यहां के उद्योगों के कारण. लेकिन यही उद्योग कानुपर में गंगा को मैला और जहरीला कर रहे हैं.मैंने अपनी आँखों से देखा कानपुर मे गङ्गा का जल काला दुर्गंध युक्त हो जाता है कानपुर मे शायद गङ्ग प्रेमी नही है या उन्हें काली और मैली गङ्गा ही अच्छी लगती है सीसामउ के नाले से रोज 14 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में इसी रफ्तार से गिरता है. इसमें फैक्टरियों से निकलने वाला पानी भी 90 लाख लीटर गंदा पानी शामिल हैं जिसमें कई खतरनाक रसायन होते हैं. कानपुर में करीब 700 फैक्ट्रियां हैं जिनमें से करीब सौ को खतरनाक माना गया है. चमड़ा फैक्टरी मालिकों का कहना है कि कानपुर में जितना गंदा पानी गंगा में गिरता है उसमें चमड़ा फैक्टरियों का योगदान सिर्फ आठ फीसद ही है वो भी साफ करके ही गंगा में डाला जाता है.
कानपुर से जुड़े लोगों का माने तो गैप वन और JOUR में करोड़ों रूपया खर्च होने के बाद भी जहरीले रसायन पानी गंगा
में जा रहा है मोदी सरकार की नमामि गंगे के तहत फैक्टरियों के लिए एक हजार करोड़ रुपये रखे गये थे.इनसे गंदे पानी का साफ करने के संयंत्र भी लगने थे और साथ ही नई तकनीक पर भी पैसा खर्च होना था पर क्या हुआ..? . मकसद ये है कि फैक्टरियों में ही गंदे पानी को एक हद तक साफ किया जा सके। कानपुर में अब तक के अनुभव यही है कि पैसा खर्च होने के बाद भी गंगा साफ नहीं हुई है. कानपुर में गंगा में गंदगी की वजह है नाले मे बदल रही हैं
गंगा को मैली करने का 80 प्रतिशत दोषी मलमूत्र वाला वो गंदा पानी है जो 400 करोड़ लीटर प्रतिदिन की दर से गंगा में गिरता है. आपको जानकर हैरानी होगी की गंगा में गंदे नालों को छोड़ने की शुरुआत एक सरकारी आदेश से हुई थी. माने तो यह गङ्गा को मिटाने का षड्यंत्र ही था 1932 से हुई शुरूआत आज गंगा के लिए मुसीबत बन गई है.आज 85 वर्षो से ब दस्तूर जारी है जब की मालवीय जी ने गङ्गा जी के दर्द को समझकर 1911 मे गङ्गा जी को बचाने के लिये आवाज उठाई थी तो,भी सरकारी आदेश क्यो दिया गया ? कारण हिन्दू सँस्कृति को मिटा है तो गङ्गा को मिटाना परम् आवश्यक है कानपुर की चमड़ा फैक्ट्री ने किया है गंगा को सबसे जहरीला कानपुर को भारत का मैनचेस्टर भी कहा जाता है. यहां के उद्योगों के कारण. लेकिन यही उद्योग कानुपर में गंगा को मैला और जहरीला कर रहे है

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