मेरी गंगा यत्रभाग 105
इक प्रयास गङ्गा बचे
गंगा की सफाई के लिए न जाने कितनी योजनाएं बनीं, न जाने कितना बजट खर्च हुआ, लेकिन पता नहीं चल रहा है कि गंगा के अंदर ये रुपये भी बह जा रहे हैं क्या..? वर्तमान केंद्र की मोदी सरकार ने गंगा के लिए अलग मंत्रलय के गठन और 20 हजार करोड़ की बड़ी धनराशि का नियोजन करते हुए गंगा निर्मलीकरण के कार्यो और परियोजनाओं को नए सिरे से नमामि गंगे के प्रारूप में पुनर्जीवित किया है, किंतु गंगा एक्शन प्लान की विफलता की समीक्षा कर और इससे सीख लेकर आगे बढ़ने का प्रश्न आज सबसे बड़ा प्रश्न है। करोड़ों की राशि बहाने और इसकी बंदरबांट के बाद भी गंगा की सफाई का निर्धारित लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सका
गंगा प्रदूषण को दूर करने के नाम पर बनी परियोजनाओ में कभी भी परिदृश्यता नही रही न कारण जितनी भी योजनाओं ने जन्म लिया सभी नेताओं और उच्च सरकारी तन्त्र के हाथों मे रही,जो भी मोदी जी जैसे साफ छवि के थे वह या तो केवल बाद में झंडी दिखाने, फीता काटने तक ही रहे, बाद मे किसी ने परियोजनाओं की सही सुध ही नही ली, ली तो करप्ट मण्डली ने वो दिखाया जो वो दिखाना चाहते थे,यानि जो उनके अनुरूप था क्यो कि उच्च नेता अपनी मर्जी से कही जा ही नही सकते, बात जो प्रोटोकॉल की थी, आज लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती हैं यानी 2 अक्टूबर बड़ी परियोजनाओं के लिये ऐसे साधारण व्यक्तिगत के लोग चाहिए, जो कही भी रूप बदल कर पहुच जाये परियोजनाओं के सच को जाने के लिये, ऐसे ही चौधरी चरण सिंह भी थे, आज बहुत मुश्किल है हमारे नेताओं को विदेश दौरों से ही फुर्सत नही, ये भी भला हो कोविड का जो सब घर हैं नही तो सभी उच्च अधिकारी और उच्च नेता दौरों पर ही रहते, जिस देश मे अरबो रुपये चुनाव जीतने के लिये खर्च होते हो वहाँ परियोजनाओं की परिदृश्यता की बात करना बेमानी होगी,क्योंकि जो लगायेगा वो कमायेगा भी,..? हैं न सत्य और बड़ी बड़ी परियोजनाओं का निमार्ण ही इसी सोच की देन हैं जबतक कल-कारखानों या थर्मल पावर स्टेशनों का गर्म पानी तथा रसायन या काला या रंगीन एफ्लुएंट नदी में जाता रहेगा,तब तक प्रदूषण मुक्त होना कठिन है,यह नदी के पानी को जहरीला बनाने के साथ-साथ नदी के स्वयं के शुद्धिकरण की क्षमता को भी नष्ट कर देता है। नदी में मौजूद बहुत-सी सूक्ष्म वनस्पतियां और जीव-जंतु भी सफाई में मदद करते हैं। लेकिन उद्योगों के प्रदूषण के कारण गंगा में जगह-जगह डेड जोन बन गए हैं। कहीं आधा, कहीं एक तो कहीं दो किलोमीटर के डेड जोन मिलते हैं। यहां से गुजरने वाला कोई जीव-जंतु या वनस्पति जीवित नहीं बचता। गंगा पाये जाने वाली बहुत सी प्रजाति लुप्त होने के कगार पर हैं ऐसे में गंगा हरि के भरोसे पर ही हैं,
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