मेरी गंगा यात्रा भाग 106
इक प्रयास गंगा बचे
मित्रो कुछ समय पहले मुझे एक लेख पढ़ने को मिला सोचा क्यों न आप से उसकी की चर्चा कर लूं ,.यू तो मेरी हर चर्चा घूम फ़िरकर गङ्गा जी पर ही आती है यह घटना भी किसी न किसी रूप से गंगा जी की महत्वपूर्ण और उसके चमत्कारी गुण को लेकर ही हैं यह करीब सवा सौ साल पुरानी घटना है. बिहार और बंगाल में हैजा फैला हुआ था. हैजा के साथ फैला था डर, कि लाश को हाथ लगाएंगे तो हमें भी हैजा हो जाएगा. वैसे ही जैसे आज कोविड 19 को लेकर हैं बिलकुल ही ऐसा ही जान ले वही स्थिति थी लोग लाशों को किसी तरह खींचकर या सुरक्षित दूरी से उठाकर – बांधकर लाकर गंगा में फेंक दे रहे थे. उस समय भारत में रिसर्च कर रहे ब्रिटिश वैज्ञानिक हाकिन्स के मन में यह आशंका जागी कि इस तरह तो हैजा गंगा के पानी के साथ–साथ सभी जगह फैल जाएगा. लेकिन यदि यह सच है तो अब तक महामारी का फैलाव काफी तेज होना चाहिए. फिर क्या हुआ वो लग गये शोध करने उन्होंने शोध किया और पाया कि हैजे का बैक्टेरिया गंगा के पानी में जिंदा ही नहीं रह पा रहा. यानी कुछ है जो इस बैक्टेरिया को तेजी खा जा रहा है. इसके बाद यह शोध आगे बढ़ा और पाया गया कि पेचिश, मेनिन्जाइटिस, टीबी जैसी गंभीर बिमारियों के बैक्टेरिया भी गंगाजल में टिक नहीं पाते,यह शोध चल ही रहा था कि दुनिया के सामने एंटीबायोटिक की खेप आ गई यानी हर बीमारी का इलाज एंटीबायोटिक खाओ. इस जादुई खोज ने गंगा जल पर शोध कार्य को पीछे धकेल दिया. यदि गंगा जल पर शोध होता तो गंगा जल के चमत्कार को विश्व समझता पर ऐलोपैथिक इलाज ने शोध को रोक दिया आलसी मनुष्य और ख़या चाहता है उसकी मांग पूरी होनी चाहिए, भविष्य की किसे फ़िक्र हैं यदि उसके काल मे शोध होता तो कोविड 19 ही नही सैंकड़ो बीमारियों का अंत कर सकती हैं गङ्गा पता चलता,..
पिछले 20 वर्षों से मैं सरकारों से गङ्गा मंत्रालय, बनाने और उस पर शोध हो कि बात करता हु पर सरकारो के कान पर जू भी नही रैग ती सोचता सब दो ही योद्धा हैं जो इस पर शोध करवा सकते हैं स्वामी रामदेव, और बैल किशन उनसे चर्चा करते हैं,ख़ैर आगे चलते हैं अपनी बात मे,तभी लोगो ने वही किया जो ससज हो रहा है लोगों ने इतना एंटीबायोटिक खाया, इतना खाया कि बीमारी फैलाने वाले बैक्टेरिया पर इसका असर होना ही बंद हो गया. नतीजतन हमने एंटीबायोटिक का डोज और बढ़ा दिया इसी हिसाब से बैक्टेरिया भी अपनी ताकत बढ़ाता गया.वही अब हो रहा है शोध के स्थान पर शोषण हो रहा है कोविड कम होने की जगह बढता ही जा रहा है एक वर्ष से कोविड ने देश विदेश सब को बेहाल कर दिया है संख्या करोडों तक पहुँच जायेगी पर झस शोध हो वहाँ भारत सरकार ध्यान नही है यू ही हमारे पूर्वज गंगा की जल को अमृत नही कहते कुछ तो है इस चमत्कारी जल मे, निश्चित ही यह कोविंद का भी अंत कर सकता हैं बस आवश्यकता हैं तो प्रयास की, मैं प्रति दिन साधना काल मे त्रिआचमन गंगा जल से करता हु तो समझ लो। इतना जल ही हमारी प्रतिरोधक समता को बड़ा रहा हैं यह तो विज्ञान की बात हुई मेरा तो गंगा जल के चमत्कार री गुण पर भी पूर्ण विश्वास है अब बात करते हैं आगे मैंने अपने किसी लेख मे पहले भी चर्चा कि थी कि एक वायरस होता है, निंजा वायरस कहते हैं उसे. निंजा यानी योद्धा. (यह चाइनीज नाम हैं) सौ वर्ष भी नहीं हुए ये निंजा वायरस हमारी गंगा नदी में पाए जाते थे.और पाये जाते है वैज्ञानिक भाषा मे इन्हें बैक्टेरियोफाज कहते हैं और भारत के आयुर्वेदिक जानकार इसे गंगत्व कहते है. गंगत्व यानी गंगा का वह तत्व जिससे गंगा जल कभी खराब नहीं होता. वैसे एक समय था जब दुनिया की चार बड़ी नदियों में ये बैक्टेरियोफाज पाया जाता था. समय की मार ने बाकि तीन नदियों और उनकी सभ्यताओं को मिटा दिया.
परन्तु आस्था ने भारत मे गंगा जी संजोकर रखा हैं यदि हिन्दू धर्म और गंगा को मॉ नही माना जाता तो यह भी और नदियों की तरह समाप्त होकर पहले एक नदी, फिर नाला होकर मिट जाती,केवल 20 वर्ष पहले तक यह निंजा वायरस गंगा की छह मूल धाराओं में मौजूद था. फिर हमने एक टिहरी नाम का डैम बनाया और दो धाराओं भागीरथी और भीलंगना के संगम को इस डैम के लिए बनाई गई झील में डुबो दिया. नतीजा यह हुआ कि यहां मौजूद बैक्टेरियोफाज खत्म हो गया. क्योंकि विज्ञान मानता हैं किसी भी नदिया जल जब तक निरतर बहता है उसकी गुणवत्ता बनी रहती हैं और स्थिर होने पर दूसरे विषैले बैक्टीरिया गङ्गत्व को कमजोर कर नष्ट कर देते है यही कारण हैं कि जिस गंगाजल में मच्छरों के लव नही पन्नपता था वह अब जल मे ही वह ताकत वर हो गया, हरिद्वार और आगे गंगाजल की गुणवत्ता हरि भरोसे ही हैं, या यूं कहै भागीरथी में ऊपर की ओर अभी भी गंगत्व मौजूद है. साथ ही अलकनंदा, मंदाकिनी और पिण्डर में भी यह तत्व मिलता है. लेकिन कम हो गया है इतना कम की गंदे पानी को साफ करने की इसकी क्षमता नाममात्र की रह गई है. और इस बदलाव का कारण है, नदी का ठहर जाना.
डैम ने जल को कर दिया डम्प और नदी को डम्पयाडं,..यानि कूड़ा घर
No comments:
Post a Comment