Tuesday, October 15, 2019

मेरी गंगा यात्रा भाग 95

मेरी गंगा यात्रा भाग 95
इक प्रयास गङ्गा बचे
कहते है कि गंगा जी का जल कभी ख़राब नहीं होता पर लगता हैं यह अब किताबी कहानी मात्र रह गई हैं जैसे कल्पना की कहानी अलिफ़ लैला हो, गंगा अपने पहले मैदानी तीर्थस्थान ऋषिकेश से ही प्रदूषित हो रही थी जैसा कि आप जानते ही हैं गंगा के लगभग 2525 कि.मी. लंबे सफर तय करती हैं कितनी सुन्दर गणना हैं मानो भगवान सदाशिव ने स्वयं गंगा जी का सफर मार्ग तय किया हो. कहते है ऋषिकेश पहला मैदानी पड़ाव है. यहां नाले और सीवर का पानी गिरने से गंगा में प्रदूषण शुरू हो जाता है. पर अब नज़ारा कुछ और हैं। गंगा मे पहला नाला उत्तराखंड के शहर उत्तरकाशी से आरम्भ हो जाता है कुछ साल पहले तक त्रीवेणी घाट में सरस्वती नदी, गंगा में मिलती थी जो अब विलुप्त हो चुकी है. यही रहा तो गंगा भी विलुप्त हो जायेगी.विलुप्त सरस्वती नदी की जगह सरस्वती नाला ने ले ली है. इसमें पूरे शहर की गंदगी बहायी जा रही है जो आगे चलकर गंगा में मिल जाती है. गंगा किनारे लगातार बसायी जा रही बस्तियों चन्द्रभागा, मायाकुंड, शीशम झाड़ी में शौचालय तक नहीं हैं. इसलिए ये गंदगी भी गंगा में मिल रही है.पहाड़ी गङ्गा प्रदूषण के लिये मैदानी आबादी को,और मैदानी लोग पहाड़ियों को दोषी बताते है पर कम कोई भी नही ऐसे मे नुकसान नदियों के नाश के साथ हमारी आने वाली नस्लो का हो रहा है जो प्रदूषित वायु,जल,थल,नभ, और अब अंतरिक्ष को पायेंगे अगर आने वाली पीढ़ी का चित्र बनाये तो कैसा होगा कमर पर आक्सीजन का सिलेंडर, नाक मे पाइप, पेट के अगर भाग पर वाटर फ़िल्टर औऱ पानी की ख़ोज में मारा मारा फिरता जीवन,..मैं कई बार लिख चुका हूं कि विश्व के सभी राष्ट्र को एक होना होगा और मिलकर प्रयास करने होंगे क्योंकि मनुष्य एक जाति हैं और उसकी रक्षा मिलकर हो सकती हैं आज मनुष्य के विकास क्रम को लाखों वर्ष हो गये हैं पर आज भी हम आपस मे भेद भाव से जीते है तो साहब विकास कैसा..?विकास ने मानव उन्नति से अधिक विनाश को जन्म दिया हैं

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