Tuesday, June 12, 2018

मेरी गंगा यात्रा- 44

मेरी गंगा यात्रा भाग-44

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक पांच फीसद गंदा पानी पश्चिम बंगाल में गंगा नदी में ही प्रवाहित होता है। करीब 131 करोड़ लीटर गंदगी रोजाना गंगा में गिरती है। चौंतीस सीवेज प्लांट हैं जिनकी क्षमता 457 एमएलडी है, लेकिन चौदह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट खराब पड़े हुए हैं। इसलिए महज 214 एमएलडी पानी ही साफ हो पाता है। बोर्ड ने कोलकाता, हावड़ा व सियालदह सहित एक दर्जन शहरों में चौंसठ नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के सुझाव भी दिए हैं लेकिन वहां तृणमूल कांग्रेस की सरकार गंगा की सफाई को लेकर अब तक खामोश
उत्तराखंड में अर्द्धकुंभ शुरू होने को था। उत्तराखंड सरकार का दावा था कि अप्रैल 2016 तक कुल एक करोड़ श्रद्धालु हरिद्वार में डुबकी लगाएंगे। और ये तो निश्चित ही है कुम्भ मे इतनी संख्या तो होती ही  हैं और हरिद्वार मे छोटे मोटे कार्यक्रम मे अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है हरिद्वार से रिषिकेश मार्ग 8,8 घण्टो के लिये जाम रहता हैं 2010 का महाकुंभ मैंने देखा था हम भी 4 माह के लिये कुम्भ मैला मे रहे ,समय समय पर गङ्गा को लेकर कार्यक्रम भी हुए, पर मन सन्तुष्ट नही था सब और गङ्गा को लेकर कार्यक्रम थे पर सब बकवास अधिक थे कोरे ढकोसले, मिडिया, सन्त, जनता,सरकार,अधिकारी सब चोर चोर मुसैरे भाई, सही अर्थों मे प्रयोगिक कुछ नही था सब राजनीति की भेट चढ़ गया, सहारा टीवी पर कई कई कार्यक्रम ,लाइव भी हमने किये पर सब व्यर्थ,खाया पिया मुँह पर हाथ मारा और सब अपने अपने रास्ते..? गंगा रही रोती की रोती,चलिये 2016 की बात करते हैं अधिकारियो का मानना था ऐसे में मल-मूत्र, फूल व प्लास्टिक सभी तो गंगा में ही जाएंगे। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि वर्ष 2010 में उत्तराखंड में कुंभ के दौरान हरिद्वार में गंगा के नमूनों की पड़ताल की गई थी तब प्रति दस मिलीलीटर जल में हानिकारक जीवाणुओं की संख्या छह हजार पाई गई जो चिंता का विषय हैं यह तो स्नान के पानी के लिए सरकार द्वार जारी मानकों से पंद्रह हजार प्रतिशत अधिक  हैं। इस प्रदूषण के कारण ही हैजा, पीलिया, पेचिश व टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियां बढ़ी हैं। वैसे भी देश में आठ फीसद स्वास्थ्य समस्याएं और एक तिहाई मौतें जलजनित बीमारियों के कारण ही तो होती हैं। अगर सरकारी सर्व को ही सत्य माने तो ऋषिकेश से इलाहाबाद तक गंगा के आसपास करीब पच्चीस से अधिक औद्योगिक इकाइयां स्थित हैं जिनमें चीनी, उर्वरक व कागज मिल के अलावा तेलशोधक कारखाने तथा चमड़ा उद्योग प्रमुख हैं। इनसे निकलने वाला सारा कचरा और रसायनयुक्त गंदा पानी गंगा में गिर कर इसके पारिस्थितिकीय तंत्र को भारी हानि पहुंचा रहा है। इन कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट में मुख्य रूप से हाइड्रोक्लोरिक एसिड, मरकरी, भारी धातुएं व कीटनाशक जैसे खतरनाक रसायन होते हैं। ये रसायन मनुष्य की कोशिकाओं में जमा होकर बहुत-सी बीमारियां उत्पन्न करते हैं।  मानो या न मानो ऐसी स्थिति मे गंगा जल मे स्नान और आचमन मोत को दावत देना है  बिहार और पश्चिम बंगाल में भी गंगा में प्रदूषण, गंगा एक्शन प्लान पर काम होने के बावजूद तेजी के साथ बढ़ा है। संसदीय लोक लेखा समिति ने तो तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि पटना में गंगाजल तेजाब बन गया है। यहां तीन से ज्यादा नालों का मुंह गंगा में खुलता है। बिहार के पंद्रह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट एक अरसे से खराब हैं। फतुहा से दानापुर तक गंगा के पेट में र्इंट के भट्ठे लगते हैं।

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