Tuesday, June 5, 2018

मेरी गङ्गा यात्रा भाग-34

इक प्रयास मेरी गंगा यात्रा -34
चलिये मित्रो अब कुछ आंदोलन की भी चर्चा करेंगे जिसमें कुछ सार्थक लगे कुछ प्रपंच मात्र ही रहे कुछ मे साधक ने अपने प्राणो की आहुति दी कुछ ने मुम्बईया नचैयो के साथ दस्ताने पहन पहन कर मीडिया मे हीरो बनने का ड्रामा किया गया ओर बा-दस्तूर समय समय पर जारी भी हैं
पर गंगा कल भी बेचारी थी आज भी मारी है..........
गंगा की निर्मलता, स्वच्छता और अविरलता के लिए पिछले 30 वर्षों से भारत की धरती पर अनशन और धरने होते रहे लेकिन गंगा की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ विशेष जब जब सरकारों ने गंगा जी को बचाने की बात की तब तब नये नये संगठन नजर आये और मीडिया मे हलचलों ने जन्म लिया पर सब सरकार के सोते ही सो गये  कई टी वी चैनलों ने गंगा जी पर विशेष कार्यक्रम भी बनाने की तैयारी की थी पर , सब हवा हवाई हो गये क्योंकि मामला तो पैसा कमाने का था जो हुआ नही  अगर पीछे की ओर देखै तो  वर्ष 1914 से लेकर 1916 तक हुए विश्व के पहले सफल बांध विरोधी आंदोलन के बाद गंगा के लिए कोई भी आंदोलन सफल नहीं रहा। क्योकि वह सभी आजादी के सिपाही थे कोई लालच नही था न कोई रिश्वत खोरी थी आज गंगा जी को बचाने मे रिश्व्तखोरी सबसे बड़ी समस्या है आज कोई भी बिना स्वार्थ के कुछ नही करना चाहता, कौंन क़ीमती समय बर्बाद करै
समय ही तो पैसा है
कुछ हरि सिमरन करने वाले बाबा ही बिजनेस मैन हो गये तो जो बिजनेस मैन है वो क्यो सेवा करें साहब गंगा न तो खरबों रुपये के एक्शन प्लान से स्वच्छ हुई और न ही आंदोलनों तथा न ही राष्ट्रीय नदी घोषित करने से। हां, इतना जरूर हुआ कि गंगा पर बन रही परियोजनाएं कभी रोक दी गईं तो कभी शुरू कर दी गईं।
1916 के बाद गंगा रक्षा के लिए गंगा एकात्मकता यात्रा निकाल कर वर्ष 1983 में पहला आंदोलन शुरू किया गया था। वर्ष 1916 के बाद पहली बार गंगा नदी के प्रति जागरूकता अभियान आरम्भ हुआ  इसके बाद हर वर्ष गंगा की पवित्रता, निर्मलता, स्वच्छता, अविरलता के लिए आंदोलन होते रहे।
शेष कल

No comments:

Post a Comment