मेरी गंगा यात्रा भाग-52
इक प्रयास गंगा बचे
मित्रो जैसा कि आप जानते है कि गंगा जी की लम्बाई लगभग 2510 किलोमीटर हैं अतः हमारी गंगा यात्रा भी कम से कम 2510 भाग में होनी चाहिए अतः अगर इसी तरह गंगा यात्रा को पढ़कर शेयर कर रहे तो निश्चित ही हम इस पर शोध कदम बढ़ाते रहेंगे, आज आप और हम 51 वे कदम पर है और यात्रा अभी लम्बी हैं और उससे भी लम्बी गंगा जी के दर्द की कहानी हैं मा.मदन मोहन मालवीय जी से ही आरम्भ करें तो भी100वर्ष से अधिक हो गये हमने 1800, 1857, 1860,1902, के भी इलाहाबाद और हरिद्वार, वाराणसी की छाया चित्र देखैं हैं उस समय भी गंगा जी स्थिति उत्तम नही कहि जा सकती , अतः नजर दौड़ाये तो पायेंगे गंगा जी के प्रदूषण के पीछे भी एक षड्यंत्र काम कर रहा था,जो नही चाहते थे कि भारत की अति प्राचीन संस्कृति बचे लक्ष्य चार ग को मिटाना,..? गाय, गीता,गायत्री, गंगा, और वह कामयाब भी रहे ज़रा अपने भीतर झांक कर दे, यह आज भी बां दस्तूर जारी हैं यह सब 1हजार वर्ष से अधिक से जारी हैं प्रायः गंगा जी के आसपास ही चमड़ा उद्योग,बूचड़खाना,प्रदूषित उधोग बड़े मन्दिरों से सटा कर मस्जिद का निर्माण हुआ क्यो,आदि आदि की बस्ती बसाई गई..?और ये सब आज से न ही,न ही अंग्रेजो के समय बसाई गई यह उससे भी पहले से है अगर पुराने लेखकों की पुस्तकों का सहारा ले तो आप समझ जायेंगे की यह षड्यंत्र हैं तुलसीदास जी की रचित राम चरित्र मानस 1632 मे भी ऐसी टीस नज़र आती हैं,इतना होने पर भी हिंदू ही क्यो सैकुलर हैं..? बाकी क्यो नही, जब दुनिया के देख बोलना भी नही जानते थे भारत मे हजारों स्कूल गुरुकुल की स्थापना हो चुकी थी,अगर गंगा बच गई तो धर्म की स्थापना हो सकती हैं गंगा बची तो गायत्री गीता गौ को बचाना आसान होगा क्यो क्योंकि गंगा जल अमृत हैं अगर यह जल प्रदूषण मुक्त हुआ तो शक्ति का संचार निश्चित है गंगा जल मुक्ति ही नही शक्ति भी देखता हैं गंगा मे शक्ति प्रदान करने वाले बैक्टीरिया हैं जो शरीर के बैड बैक्टीरिया को मारता हैं गंगा एक मात्र नदी हैं जिसके जल मे कीड़े नही पड़ते इसरो को चाहिए कि गंगा जल पर रासायनिक ख़ोज करें, गंगा जल साधरण जल नही है आयुर्वेद ने गंगा को अमृत कहा हैं आयुर्वेद की दृष्टि से भी गंगाजल में जो गुण पाए जाते हैं। उन्हें देखकर आप चकित रह जायेंगे चरक संहिता ने जिसका काल आज से दो हजार वर्ष पूर्व है- गंगाजल को पथ्य माना है। चक्रमणि दत्त ने भी, जो सन् 1060 के लगभग हुए हैं, इसका समर्थन किया है। ‘भण्डारकर ओरियण्टल इन्स्टीट्यूट’ में एक प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ है ‘भोजन कुतूहल’। उसमें गंगाजल की उपयोगिता बताते हुए लिखा है- ‘गंगाजल श्वेत, स्वादु, स्वच्छ, रुचिकर, पथ्य, भोजन पकाने योग्य, पाचक शक्ति बढ़ाने वाला और बुद्धि को तीव्र करने वाला है।और अब तो विज्ञान की कृपा से गंगाजल का महत्व भारत से बाहर भी प्रकाशित हो उठा है और इस जल के गुणों पर मुग्ध होकर विदेशियों ने भी इसे अपनाना प्रारम्भ कर दिया है।आज के विज्ञान का परीक्षण यह सिद्ध कर चुका है कि गंगाजल में शरीर की शक्ति बढ़ाने की अपूर्व शक्ति है और इसका सेवन करते रहने पर रोगी तथा दुर्बल व्यक्ति को डाक्टरी टानिक पीने की आवश्यकता नहीं रहती। इसके पीते रहने पर अजीर्ण रोग, जीर्ण ज्वर तथा संग्रहणी, तपेदिक, दमा इत्यादि रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। प्लेग, हैजा, मलेरिया आदि संक्रामक रोग गंगाजल के सेवन से अदृश्य हो जाते हैं। रोगों के कीटाणुओं को नाश करने की शक्ति इसमें अद्वितीय है।
Monday, June 25, 2018
मेरी गंगा यात्रा भाग-52
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