मेरी गंगा यात्रा भाग-19
मित्रों कुछ दिनों से गंगा जी को लेकर चलने वाले आंदोलनो मे कमी आ रही है लगता हैं गंगा जी प्रदूषण मुक्त हो गईं हैं..? या राजनीति ठंडी हो गई हैं पिछले 10 वर्षों मे गंगा बचाने वालो की बाढ़ सी आ गई थी पर ये वो लोग थे जिनके आका सता धारी लोग रहे सरकारे बदली आका बदले आका बदले संगठन बदल गये कुछ लोग थे जो निःस्वार्थ काम करते आ रहे हैं पर उनकी कोई सुनता नही ना उन्हें आगे हीआने दिया गया क्योंकि वह या तो सनकी थे या गंगा जी के अंध भक्त वह न सरकारी मलाई खाते न खाने देते,तो सत्ता धारियों को ऐसे लोग दुश्मन नज़र आते है एक ग्रुप और भी है जो समय समय में कुम्भकर्ण नींद से जागता हैं ये वो लोग हैं जो खुद गंगा के नाश का कारण हैं जो गंगा के किनारों पर कब्जे कर बैठे हैं गंगोत्री से कलकत्ता तक हर जगह ऐसे लोग भरे हैं जो जब गंगा के किनारों को मुक्त कराने बात आती है तो इनकी मानो नानी मर जाती हैं इनके सीने पर सांप लौटने लगते है वो भी कालिया नाग, इनकी नॉटकी के आगे सरकारे भी बेबस हो जाती हैं क्योंकि यह सत्ता के सहायक नही है ये कभी नगरों का मास्टर प्लान नही बनने देते ,क्योकि पहला हथौड़ा इनके अवैध कब्जों पर चलेगा ये सब आंखों देखी हैं कोई कोरी कल्पना नही करोड़ो रूपये खर्च करना इस समस्या का हल नही है जब कि जीवनदायिनी गंगा को साफ करने के लिए अब तक करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। सन्यासियों, वैज्ञानिकों के साथ-साथ आम जनता गंगा को स्वच्छ करने की कोशिश में लगी हुई है, लेकिन गंगा आज भी मैली की मैली है। गंगा को बचाने की कोशिशें नाकाफी रही हैं। पहाड़ों से निकल कर गंगा मैदान की तरफ बहती है। इसका पहला पड़ाव होता है हरिद्वार,हरिद्वार धार्मिक नगरी तो है ही लेकिन गंगा को गंदा करने की पहली बदनामी भी ये शहर उठाता आया है।शास्त्र कहते हैं गंगा पाप धोती है लेकिन हरिद्वार में गंगा शहर की गंदगी को साफ करती ज्यादा नजर आती है। विशेषज्ञों द्वारा किए गए रिसर्च में हरिद्वार के हरकी पैड़ी के 100 एम.एल. गंगाजल में पाए गए एमपीएन कोलीफॉर्म बैक्टीरिया 54,000 तक तथा विश्वकर्मा घाट के जल में 35,000 तक बैक्टीरिया पाए गए हैं। जो समय समय पर बढ़ता है कितनी शर्म की बात है जबकि इनकी मौजदूगी सिर्फ दस तक स्वीकृत है। फीकल कोलीफॉर्म टेस्ट में भी इन दोनों जगहों पर क्रमशः गंगाजल में 1,400 तथा 2,800 बैक्टीरिया पाये गए थे। इनके अलावा गंगा में ई-कोलाई बैक्टीरिया, आयरन तथा रेत भी जरूरत से ज्यादा पाये गए हैं।गंगा की हत्या करने वाले शहर के तौर पर सबसे बदनाम कानपुर है। हर साल यहां गंगा में प्रदूषण बेहद खतरनाक हद तक पाया जाता है। एमपीएन कोलीफॉर्म टेस्ट में कानपुर में गंगाजल कई बार फेल हुआ है। कानपुर में दाखिल होते वक्त ये आंकड़ा 35,000 जबकि कानपुर से बाहर जाते वक्त 54,000 है। यानी कानपुर शहर के गंगाजल में बैक्टीरिया पनप रहे हैं बढ़ रहे हैं। फीकल कोलीफॉर्म टेस्ट में भी कानपुर में दाखिल होते वक्त ये आंकड़ा 2,800 तथा कानपुर से निकलते वक्त 2200 है। यानी मल से उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया कुछ कम हुए नजर आते हैं। लेकिन पानी में ई-कोलाई बैक्टीरिया की मौजूदगी है। एक खतरनाक बात यह है कि इस बार कानपुर के पानी में धातुओं की मौजूदगी भी मिली है। जो तीन साल बाद लौटी नजर आ रही है। जिससे सिर्फ पेट की ही बीमारियां नहीं होती बल्कि लंबे वक्त तक पानी इस्तेमाल करने पर कैंसर और किडनी खराब होने जैसी बीमारियाँ भी हो सकती हैं।उत्तर प्रदेश के कुल सात शहरों से 11 नमूने लिए गए लेकिन बैक्टीरिया के मामले में सबसे खराब पानी वाराणसी में मिला। यहां एमपीएन कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की तादाद बेहद चौंकाने वाली थी। 100 एम.एल गंगाजल में वाराणसी में गंगा को दाखिल होते वक्त 1,40,000 तक बैक्टीरिया पाए गए तथा निकलते वक्त ये बढ़ कर 3,50,000 तक पहुंच गए। पानी में फीकल कोलीफॉर्म यानी मल से उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया भी बेहद तेजी से बढ़ते नजर आए। साफ नजर आ रहा है कि वाराणसी में गंगा की शुद्धि के लिए किए गए काम किसी काम नहीं आ रहे हैं। वाराणसी के गंगाजल में इन बैक्टीरिया के अलावा ई-कोलाई, रेत, आयरन, मैंगनीज और कॉपर भी काफी मात्रा में पाया गया। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में भी गंगाजल की स्थिति बहुत खराब है उसमें पाए गए एमपीएन कोलीफॉर्म 1,70,000 है जो सामान्य से कहीं ज्यादा है जबकि फीकल कोलीफॉर्म 54000 है। इसी तरह रेत, आयरन, मैंगनीज और पानी में शीशे की मौजूदगी भी पाई गई। कुल मिलाकर हरिद्वार से बलिया तक यही नतीजा निकला कि उत्तराखंड उत्तर प्रदेश में ही राम की गंगा ज्यादा मैली है।जबकि मित्रों ये आंकड़े पुराने है आज का क्या हाल है.? आप समझ सकते है और को भी समझा सकते है राज कपूर नही सही गाना बनाया था राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते धोते
Tuesday, June 5, 2018
मेरी गंगा यात्रा भाग-19
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