मेरी गंगा यात्रा भाग-18
मित्रों इससे पहले अपनी बात आरम्भ करू आप सभी बन्धुओ को 'गंगा अवतरण दिवस" यानि गंगा दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं
कहते गङ्गा दशमी को माँ गंगा भगीरथ के पितरों को मोक्ष प्रदान करने धरा पर अवतरित हुई थी ब्रह्म लोक मे ब्रह्मा जी के कमण्ड मे रहने वाली भगवान विष्णु पद गामनी मां गंगा आज भी पितरों को तार रही है आपकी पवित्र निर्मल धारा को प्रणाम,..आप हम सब पर अपनी अनुकम्म्पा बनाये रखें
माँ गंगा की चर्चा आते ही जाने कुयू मन मे कुछ सरसराहट होने लगती हैं वह नदी,जो बहती जलधारा से कुछ अधिक है वह नदी जिसे सदियों सदियों से हमारे पूर्वज पूजते आये है निरन्तर, प्रतिदिन बहने वाली सभी को सुख और पुण्य, देनी वाली मोक्षदायिनी, जीवनदायिनी माँ है ये गंगा बिना भेदभाव,निस्वार्थ भाव से बिना संकोच सभी का पालन पोषण करती है माँ गंगा,
.....किसी के लिये हो या न हो मेरे लिये मॉ हैं गङ्गा,......
....हरिहर मेरी अनन्त सांसो का प्रवाह है मां गंगा,.......
आज भी मुझे याद जब पहली बार मैंने बहते रूप मे गङ्गा जी को देखा था निर्मल विशाल , कलकल करता सुंदर रूप और देखते देखते मात्र 30 वर्षो से क्या से क्या हो गया एक माह में मैने गङ्गा जी दोनों रूप देखै, पहला हरिद्वार दूसरा कानपुर वाराणसी कलकत्ता, जहाँ एक और 30 वर्ष पूर्व हरिद्वार मे गङ्गा का जल पवित्र और निर्मल था वही कानपुर से आगे बदरंग होने लगा था
भारतीय जन मानस के पापो को धोते धोते आज गङ्गा की धारा मलील होने लगी हैं वाराणसी के घाटों पर रहने वाली पीढ़ीया गवाह है गंगे आहो की, आज भी गङ्गा जी की लहरों मे अपनो के दिये दर्द की सिसकियों साफ सुनाई देती हैं बस ह्रदय की गहराईयों से सुनने वाले हो जीने भी गङ्गा जी की सिसकियां आहे सुनाई दी ! वह क्या रुका, संख्या नही कितने गङ्गा जी को निर्मल पावन, कलकल बहता देने के लिये बलिदान हो गये
गङ्गा जल के तेज को मिटाना षड्यंत्र है :-
भारतीय सँस्कृति का मूलभूत स्तम्भ है गङ्गा और हमारी सँस्कृति को खंडित करना विदेशी हमला वारो , और धर्म परिवर्तन करने वालो का मुख्य लक्ष्य था किसी भी सँस्कृति को मिटाना हो तो उसके विश्वास ओर श्रद्धा पर चोट करना जरूरी रहा है, जान भुजकर गङ्गा जी की पवित्रता को मिटाने के लिये गङ्गा के नजदीक पशु कत्लगाह, चमड़ा उद्योग, रंगरेज, आदि आदि कामो को बसा गया गौर करें जहाँ भी आपके तीर्थ है वही आस पास ही बड़े पशु कत्लगाह है जैसे हरिद्वार के पास, मेरठ, कानपुर आदि के पास , मित्रों गङ्गा प्रदूषण आज की बोयी समस्या नही है
लगभग 1200 से अधिक वर्ष हो गये गङ्गा प्रदूषण को जन्म लिये सभी हमलावरों का एक ही उद्देश्य रहा सँस्कृति पर चोट , और हमारी संस्कृति के मुख्य स्तम्भ क्या है वही गाय, गंगा, गायत्री, गीता,क्या आपको नही लगता यह सब आज शक्ति हीन है गङ्गा प्रदूषण की मार झेल रही है गाय धीरे धीरे म्लेच्छो के पेट मे जा रही है ,और गायत्री जिसे गुप्त से भी गुप्त शास्त्रों मे कहा है आज उसका व्यपार किया जा रहा है तबलों की थाप पर चीख़ चीख़ कर गाई जा रही हैं और गीता पर रोज ही लड़ाई हो रही हैं वे हमारी अनदेखी का लाभ उठा कर वह हमें कमजोर करने मे सफल रहे क्योकि हमारे यहां घर के भेदी, विभीषण,शकुनि, आदि कम नही हैं जो अपने को सैकुलर दिखाना चाहते हैं जिसका परिणाम हमारी पीढ़ियां भोगेगी हमें जागना होगा और औरो को भी जगाना होगा इसके प्रति आने वाली पीढ़ियों को सावधान करना होगा कल लाखो लोग गंगा स्नान करेंगे पर देखना होगा कितने गंगा को प्रदूषित नही करेंगे कितने मन को जाग्रत करेंगे कि गंगा को बचाना हैं धर्म ध्वजा को फेरना है
Tuesday, June 5, 2018
मेरी गंगा यात्रा भाग-18
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