मेरी गंगा यात्रा भाग-21
राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण
मित्रों आज निर्जला एकादशी है लगभग 22 वर्ष हो गये एकादशी व्रत रखते हुए सारे एकादशी व्रत रखते हुए भी निर्जला पर जल का भी परेहज किया कभी कोई परेशानी नही हुई हरि कृपा है पर एक बात सोचने के लिये मन विवश हैं 24 घण्टे जल ने लेने पर हम सब कमजोर हो सकते हैं अगर नदियां ही न रही तो..? जीव जगत का क्या होगा.? एक दिन सहना कठिन है तो, जीवन भर हो तो क्या होगा जीव जगत समाप्त ही मानो,नदियों जीवन है प्राण शक्ति है जीव ऊर्जा हैं तो, इनकी अनदेखी क्यो,?सवाल एक गंगा जी का नही है सब जल राशियों का है नदियां ही नही तलइया तालाब सब प्रदूषित है या मिट गये, भूमि का जल भी अब प्रदूषण युक्त है आज से 30 वर्ष पहले जो भूमिगत जल का लेबल 20 फुट पर था आज 150 से 200 फुट चला गया हैं
निश्चित ही अगला विश्व युद्ध पानी के लिये ही होगा,नदियों की अनदेखी, गिरता जल लेबल, बढ़ता प्रदूषण, बढ़ते तापमान का कारण है आज विश्व पर्यवरण दिवस भी है लोग पेड़ लगाते नजर आये पर कल क्या होगा कौन उनकी देखभाल करेंगा,कौन उन्हें पानी देगा ये भी सोचना होगा , अब कुछ होना चाहिये, कुछ सार्थक होना चाहिये रुपये खर्च करने मात्र से इस समस्या का अंत नही हो सकता समाज मे जागरूकता लानी होगी वो भी क्रांतिकारी स्तर पर, तभी सम्भव है आंदोलन, अनशन का दौर गया समझो, मर कर प्राणों की आहुति देकर जाग्रति नही हो सकती जीवन जी कर संघर्ष करके ही सम्भव है! सरकारी आंकड़ों को देखे तो ऐसा नही है कुछ हुआ नही है हुआ है जैसे होता आया है ये गंगा कार्ययोजना 1985 से चल आ रही है ताकि गंगा नदी के आस-पास होने वाली प्रदूषण बढाने वाली गतिविधियों की रोकथाम की जा सके।सीवर के पानी को साफ करने वाले संयंत्रों, कम लागत के स्वच्छता कार्य, श्मशान घाटों के कारण गंगा में प्रदूषण का बढ़ना,विभिन्न प्रदूषण बढ़ाने वाली गतिविधियों से निपटने के लिए तत्काल 1441.44 करोड़ रूपये इस मद में जारी किए गये थे कहा लगे पता नही हाँ हिसाब मांगा तो पेपर वर्क पूरा है
नदी कार्ययोजनाओं के कार्यान्वयन में होने वाले अनुभवों के मद्दे नजर सरकार ने संरक्षण रणनीति की समीक्षा की थी अगर याद हो फरवरी 2009 में इसको ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन किया गया था।
2009-2010, 2010-2011 और 2011-2012 में प्राधिकरण के कार्यक्रमों के तहत क्रमश: 99¬.74 करोड़ रूपये, 466.43 करोड़ रूपये और 53.44 करोड़ रूपये खर्च किए गए। इस दौरान पश्चिम बंगाल में क्रमश: 57.08 करोड़ रूपये, 192.36 करोड़ रूपये खर्च किये गये जबकि 2011-2012 में कोई खर्च नहीं किया गया।
तय किया गया है कि वर्तमान वित्त वर्ष में पांच बेसिन राज्यों उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में परामर्श के बाद वार्षिक कार्ययोजना के लिए धन राशि उपलब्ध कराई जाएगी। वर्ष 2012-2013 वित्त वर्ष के लिए प्राधिकरण की योजना के तहत 512.50 करोड़ रूपये वार्षिक का प्रावधान किया गया था
यह धन आवंटन की जानकारी उस समय में पर्यावरण एवं वन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्रीमती जयंती नटराजन ने संसद में दी थी
Tuesday, June 5, 2018
मेरी गङ्गा यात्रा भाग-21
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