Tuesday, June 5, 2018

मेरी गङ्गा यात्रा भाग -26

मेरी गंगा यात्रा भाग-26
दांस्ता तेरे दर्द की करू कहा से शुरू
हर फ़लसफ़ा हर कोना कोना
है कै बस शिकायत नही करता.......
मित्रों कौन नही जिसने दर्द नही दिया कोई अपना बनकर दग़ा देता रहा कोई ग़ैर ग़ैरत के गुमान मे चोट देता रहा यानि कहानी आज की हो या म्लेच्छ,अंग्रेजो समय की सभी ने अपना ही उल्लू सीधा किया और आज भी उनकी नस्लों ने हो नाश किया है पहले गौर अंग्रेजों ने शोषण किया आज कोरे काले, मन और तन दोनों से काले अंग्रेजों ने हिंदुस्तान को मिटाने की कसम खाई है शर्म की बात है जिस देश मे पानी पिलाना पुण्य का काम था वहाँ पानी 20 रुपये लीटर बिकता हैं क्यो
पहला प्रश्न जो कम्पनिया और सरकारे पानी बेचती है वह पानी बनाती है .? पानी प्राकृतिक संसाधन है और सबका इस पर समान अधिकार है फिर वो कौन हैं जो पानी का व्यापार करते हैं  और किस आधार पर प्रकृति संसाधन का मोल लेते हैं जिस देश मे इंसान तो क्या जानवरों के लिये भी प्याऊ बनाये जाते थे वहां पानी मोल बिकता है सही है हम तरक़्क़ी कर रहे हैं.? चलो छोड़ो गंगा जी पर बात करते हैं मैने पढ़ा था पर समस्या उससे भी पहले की है आधुनिक भारत बात कर तो गंगाजी को मिटाने  की प्रक्रिया की शुरुआत 18वीं सदी में अंग्रेजों के आगमन के साथ शुरू हुई थी। 1842 के दौरान  ब्रिटिश इंजीनियर प्रोब कोले द्वारा जाहिर तौर पर क्षेत्र में अकाल को रोकने के लिये ऊपरी गंगा नहर का निर्माण किया गया था और लगभग उसी समय अंग्रेजों ने हिमालय के वनों के विनाश की प्रक्रिया शुरू किया उसी समय खनन, पर्यटन, और व्यापारिक उद्देश्य से देवदार के वृक्षों का रोपण शुरू किया गया  था जो हिमालय की पारिस्थितिकी के लिए अपूर्णीय क्षति का कारण बने, जिसका दुष्प्रभाव जल धाराओं और गंगा जी के प्रवाह पर हुआ है। साथ ही जंगलात बर्बाद हुए इसी ब्रिटिश शासन के दौर में भी, विद्वानों का एक समूह गंगा का उपयोग, परिवहन और व्यापार के प्रमुख मार्ग के तौर पर करने के पक्ष में था। परन्तु रेलवे बिछाने की वकालत करने वाली लॉबी ने इस विचार पर हावी हो इसे पछाड़ दिया। देश में रेलवे के फैलते जाल ने भी जल धाराओं को प्रभावित किया। गंगा नदी के विनाश की और यह भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है। पटना इलाहाबाद में जहां कभी पानी के बड़े जहाज चलते थे वहाँ आज मीलो बालू का विस्तार है मुझे याद है मेरे एक मित्र ने मुझे अंग्रेजी शासनकाल की प्रयागराज की फोटो दिखाई थी जिसमें पानी का जहाज भी दिखाई दे रहे थाऔर आज पटना मे घुटनों तक ही गहरा पानी है।
एक लेख मे पढा था कि 1916 में जब हरिद्वार के चारों ओर नहरें बनाकर जलधारा का मार्ग बदला जा रहा था। तब हरिद्वार और गंगा जी की रक्षा के लिये महामना मदनमोहन मालवीय जी के नेतृत्व में प्रचंड संघर्ष हुआ। यानि जाग्रति 1916 भी हुई आज भी हो ही रही है .? पर 101साल हो गये शुभकामनाएं है न शर्म की बात....कहते हैं  साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार झुकी और उन्होंने मालवीय जी से वादा किया कि आगे से गंगा के प्रवाह और जल धारा के साथ कोई छेड़-छाड़ और कोई नुकसान नहीं किया जाएगा। परन्तु अफसोस कि स्वतंत्र भारत की सरकारो ने उस वायदे का सम्मान नहीं किया इसके विपरीत गंगा सहित इसकी सहायक नदी के साथ अकल्पनीय छेड़-छाड़ की जो हमारी नदियों के विनाश का कारण बन रही है। विनाश के कुछ प्रमुख कृत्यों की झलक निम्नलिखित हैं:
1. बिहार नेपाल कि सीमा पर 1960 में कोसी बैराज का निर्माण और बिहार की प्रमुख नदियों को तटबांधो में बांधने के प्रयास जिसके कारण उत्तर बिहार में बाढ़ से अपार क्षति हुई है। 1971 में राजमहल में फरक्का बैराज का निर्माण।
2. ऊपरी गंगा नहर प्रणाली के माध्यम से और अधिक मात्रा में पानी को नदी से निकालना।
3. गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी यमुना पर पश्चिमी यमुना नहर पर हथिनी कुंड में एक नए बांध का निर्माण यमुना जल को नदी की धारा में जाने से रोक लिया गया।
4. उत्तराखंड में विशालकाय टिहरी बांध का निर्माण और पंच गंगाओं पर बांध निर्माण और अन्य प्रकल्प जो जल धाराओं के अविरल प्रवाह में रुकावट होंगे।
5. गंगा के मध्य भाग में गंगा के सभी प्रमुख सहायक नदियों- यमुना, काली, रामगंगा आदि को गंदे और प्रदूषित नालों में तब्दील कर दिया गया है।
6. हम युवा पीढ़ी को गंगा नदी प्रणाली की मुलभूत बातों और महत्व से अवगत कराने में विफल रहें।
7. हमने विदेशी विशेषज्ञों की सलाह पर ऐसी कृषि पद्धतियों को अपनाया, अपने रहन-सहन और खान-पान में बदलाव किया जो हमारी जलवायु के अनुकूल नहीं है। जिससे कृषि, जल और स्वास्थ्य क्षेत्र में पूरी गंगा बेसिन क्षेत्र में संकट पैदा हो गया है।

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