मेरी गंगा यात्रा भाग-42
एक प्रयास गंगा बचे
आज कुछ आंकड़ों को देखे की पिछले दशकों मे गङ्गा प्रदूषण के नाम पर क्या क्या सरकारे करती रही,और अंत मे हाथ खड़े करना ही बचा, एक समाचार पत्र ने लिख कि गंगा को साफ करना भारत सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। 125 करोड़ के देश की सरकार के लिये नदियों को बचाना चुनोती हैं..? उस पर गङ्गा को बचाना..? कारण भी क्या इसमें सबसे बड़ी चुनौती गंगा में हर तरफ से आ रहा मल-मूत्र का कचरा, औद्योगिक कचरा, बूचडखानों का कचरा है..? हम भारतीयों मे सबसे बड़ी कमी यही हैं साहब की हम हर परेशानी के आगे घुटने टेक देते है नदियों के प्रदूषण की समस्या से केवल भारत ही नही सम्पूर्ण विश्व जूझ रहा है परन्तु विश्व के सभी छोटे बड़े देखो ने इसे प्रमुख समस्या के रूप मे लिया और उसका हल युद्ध स्तर पर निकाला इस्राएल, जपान, ब्रिटेन, सभी इसके उदहारण हैं क्यो क्योंकि वहाँ सरकार और जनता अपने अपने कर्तव्य को जाने और मानते हैं अपनी बॉल दूसरे के पाले मे नही डालते, और यहाँ सरकारी तंत्र विदेशो से दान मांगने के तरीके ढूंढती हैं और जनता काम चोर हमें क्या इसके अलावा कुछ नही आता,क्यो न हो दोनो को मुफ्त खोरी की आदत जो हो गई हैं खैर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 1984 में गंगा बेसिन में सर्वे के बाद अपनी रिपोर्ट में गंगा के प्रदूषण पर गंभीर चिंता जताई, सोय प्रशासन ने करवट ली, जिसके आधार पर पहला गंगा एक्शन प्लान 1985 में अस्तित्व में आया। 34 वर्ष पहले, इसके तहत काम भी शुरू किया गया, लेकिन सफलता बेहद कम मिली। यह लगभग 15 वर्ष चला। इस पर 901 करोड़ रुपये खर्च हुए। यानि 901 करोड़ गंगा भक्तो की भेट चढ़ गये जय हो गंगा भक्तों की, मार्च 2000 में इसे बंद कर दिया गया। यानि डब्बा गोल सब जाओ अपने अपने घर,फिर देखने मे आया अप्रैल 1993 में तीन और नदियों यमुना, गोमती और दामोदर के साथ गंगा एक्शन प्लान-दो शुरू किया गया, अब तक मगरमच्छों के मुँह में स्वादिष्ट खून लग गया था जो 1995 में प्रभावी रूप ले सका। दिसंबर 1996 में गंगा एक्शन प्लान-दो को राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में विलय कर दिया गया। फरवरी 2009 में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी (एनआरजीबीए) का गठन किया गया। इसमें गंगा के साथ यमुना, गोमती, दामोदर व महानंदा को भी शामिल किया गया। पर हुआ कुछ नही 2011 में इस कार्य के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन का गठन एक पंजीकृत सोसायटी के रूप में किया गया। साहब नाम बदलते रहे पर मजमुम न बदला न प्यार का परिणाम आया,फिर कांग्रेस का सफाया हो गया और मोदी जी छोरा गङ्गा किनारे वाला, बनारसी बाबू बन गये और आनन फ़ानन मे वही हुआ जो होना ही था कसमे वादे प्यार वफ़ा सब वादे हैं वादो का क्या, जीतने चक्कर मोदी ने विदेशो के काटे हैं आधे मे गङ्गा का तो कल्याण हो जाता,मोदी सरकार ने 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया। 1995 से 2014 तक की गंगा सफाई की इन योजनाओं पर 4,168 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। परिणाम आपके सामने हैं उमा जी के स्थान को नितिन जी ने ले ली बस,एक प्रयास गंगा बचे

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