मेरी गंगा यात्रा भाग-48
एक प्रयास गंगा बचे
मित्रों एक हिंदू एक तपस्वी होने के नाते मुझे भी चिंता है कि गंगा प्रदूषण मुक्त हो,यह मेरी निजी सोच हैं आप सब की क्या सोच है वही ग़ैर हिंदू और वह जो स्वयं को नास्तिक कहने वाले हैं भारतीय सुप्रीम कोर्ट की उस धारणा का क्या अर्थ लगाएंगे,..? जो कहती हैं कि पौराणिक कथाओं में अपनी विशेष जगह के कारण गंगा मुक्ति दायनी विशेष ध्यान देने की हक़दार है,सब नदियों मे इसका स्थान सब से ऊपर है अतः गंगा पर विशेष ध्यान देनी की आवश्यकता है दूसरे गंगा यमुना सब से अधिक प्रदूषित नदियों हैं और सबसे अधिक क्षेत्रफल को प्रभवित करती हैं आप धार्मिक न भी हो यह माने को जरूर मजबूर होंगे कि यह अधिक लोगों की मांग को पूरा करती हैं अतः सुप्रीम कोर्ट की अवधारणा उचित है ऐसा नही कि बाकी नदियों की अनदेखी की जाये!सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह केंद्र सरकार को नदियों के लिये अलग से मंत्रालय बनाने के लिये कहै जिसके लिये सभी की समभाव भागीदारी हो यह काम केवल सरकारी अधिकारियों की प्लानिंग न होकर सामाजिक टीम वर्क हो,केवल नदियों के पक्के घाट ही न बनकर रह जाये, प्रदूषण की मुख्य कमी पर काम हो, कुछ समय पहले ही कई सरकारी एजेंसियों के विशेषज्ञों की एक टीम ने एक रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें इस बात का ज़िक्र किया गया है कि ये सभी क़स्बे मिलकर प्रतिदिन 363.6 करोड़ लीटर गंदा पानी पैदा करते हैं. जो कि क्षमता से अधिक है पांच राज्यों में फैले इन क़स्बों में मौजूदा 55 ट्रीटमेंट प्लांटों की कुल क्षमता क़रीब 102.7 करोड़ लीटर प्रतिदिन है.यानी नदियों को साफ़ करने का मतलब हुआ इन क़स्बों की सफाई और यहां के निवासियों को बेहतर सीवेज और सफाई की व्यवस्था देना.यह समस्या सम्पूर्ण भारत की नदियों की हैं दक्षिण भारत की कृष्णा और कावेरी पर भी उतना ही धन और ऊर्जा ख़र्च होनी चाहिए जितनी साबरमती या गंगा पर हो, लेकिन उन दो नदियों के बारे में लोगों में जागरूकता की कमी है ?वही
ब्रह्मपुत्र और यमुना, जो गंगा की तरह ही तरह या उससे भी ज़्यादा गंदी है, इन्हें भी अनदेखा नही किया जा सकता,क्या अगली आने वाली पीढ़ियों को नदियों की ‘पुरानी भव्यता’ नही देनी चाहिए?
Tuesday, June 19, 2018
मेरी गंगा यात्रा भाग-48
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