मेरी गंगा यात्रा भाग-46
एक प्रयास गंगा बचे
मित्रों एक सर्वे के अनुसार अगले 10 वर्षों मे धरती की सतह का तापमान 4 डिग्री बढ़ जायेगा जिसके कई कारण है वही पिछले 20 वर्षों से देखने मे आया है भारत की नदियाँ दिन-प्रतिदिन प्रदूषित हो रही हैं। दिल्ली मे यमुना,बनारस मे गंगा, नाले का रूप हो गई हैं वही नदी सरस्वती लोप हो चुकी हैं कई नदियों पर चलने वाली विभिन्न सरकारी परियोजनाओं के सरकार के प्रयास के बावजूद नंदी प्रदूषण को रोकने का कोई भी संभव परिणाम नहीं मिला रहा है। हम किसे दोषी ठहरायें? मेरी माने तो सभी इसके दोषी हैं सरकारी आंकड़ों के अनुसार जल प्रदूषण के बहुत सारे कारक हैं जो नदी के पानी की समग्र गुणवत्ता को कम करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से कुछ निम्नलिखित प्रकार से है यदि इस पर जनता और सरकारी तंत्र जागरूक हो तो कुछ सार्थक परिणाम निकल सकते है राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों अच्छी तरह से जानते है कि औद्योगिक अपशिष्टों, रसायनों के मिश्रणों और भारी धातुओं को सीधे नदियों के पानी में छोड़ दिया जाता है। इन्हें साफ करना मुश्किल होता है। फिर नदियों को साफ करना मुश्किल होगा यदि हर औधोगिक केंद्र से निकलने वाले जल को नदियों मे गिरने से रोका जाये तथा प्रत्येक केंद्र मे गन्दे पानी को साफ करने के लिये वाटर ट्रीटमेंट प्लांट होना अनिवार्य हो, जिसकी क्षमता प्रत्यक्ष से चार गुणा हो ताकि भविष्य मे लोड बढ़ने पर परेशानी न हो, तथा समय समय पर इसकी जांच भी होती रहे,दूसरे नम्बर पर कृषि अपशिष्ट, रसायन, फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिये आजकल जो रसायन,उर्वरक कृषि में इस्तेमाल किए जा रहे है वह कीटनाशक नदी के जल को दूषित कर रहे हैं। भूमि को भी जहरीला बना रही हैं भारत मे आज भी 71 प्रतिशत भूमि का प्रयोग खेती के लिये होता हैं जल चक्कर भूमिगत जल को तेजाब बना रहा है जो मनुष्य के स्वास्थ्य को हानि पहुंचा रहा है इसके लिये सरकार को चाहिए कि वह विदेशो की तरह ओरगेनिक जैविक प्रकतिक खेती पर जोर दे, प्राकृतिक बारिश भी प्रदूषण साथ लाती है क्योंकि यह प्रदूषित हवा के साथ गिरती है। हम इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं जो मिट्टी में पहुँचकर हानिकारक पदार्थों को उत्पन्न करती हैं। जिसका निर्माण वायु प्रदूषण के कारण होता हैं पेड़ अधिक से अधिक लगाने से वैश्विक ताप, प्रदूषण से बचा जा सकता हैं पेड भूमिगत जल को भी नियंत्रित कर सकते है सरकार को चाहिए नव निर्माण होने पर बरसाती पानी को भूमि में भेजना अनिवार्य होना चाहिए न कि वह व्यर्थ नालियों में बह जाये अवैध ट्यूवेल पर प्रतिबंध हो लोगों को बरसाती पानी को सम्भालना आना चाहिए नदियों में प्रवाहित किये गये घरों से निकलने वाले घरेलू अपशिष्ट और गंदे नाले नदियों में प्रदूषण के स्तर को बढ़ा देते हैं। जिसके लिये कस्बों शहरों मे ट्रीटमेंट प्लांट होना अनिवार्य होना चाहिए तथा नदियों के किनारों पर सीवरेज की व्यवस्था अनिवार्य हो,प्लास्टिक के थैले और वस्तुएं, ठोस अपशिष्ट और फूल-मालाओं, शव का नदियों में नियमित अपवहन प्रदूषण का दूसरा कारण है। जिस पर प्रतिबंध होना चाहिए नदियों के पास खुले स्थानों पर कई प्रकार के धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करने वाले लोग भी नदियों के प्रदूषण में योगदान करते हैं।सब कचरा नदियों को भेट कर आते हैं इसके लिये जाग्रति हो यह आवश्यक है तथा कड़े नियम बनाने चाहिए और शीघ्र लागू भी हो
नदियों में पशुओं को नहलाना, वाहनों और कपड़ो को धोना भी प्रदूषण का अन्य कारण है।
मानव अवशेषों को नदियों में प्रवाहित करना प्रदूषण का एक अन्य कारण है, आंशिक रूप से जला हुआ शरीर और मृत शरीर स्वास्थ्य संबंधी गंभीर खतरे पैदा करते हैं।
नदी प्रदूषण के बारे में कुछ औचित्य केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (सीएसई) द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के सांख्यिकी आँकड़ों ने प्रदूषण के संदर्भ में नदी के प्रदूषण के कुछ कठोर स्पष्टीकरण दिये हैं, जिसने इसे गंभीर चिंता का विषय बना दिया है: 445 नदियों पर सर्वेक्षण किया गया है, सर्वेक्षण से पता चला कि इनमें से एक चौथाई नदियाँ भी स्नान के योग्य नहीं है। भारतीय शहर हर दिन 10 अरब गैलन या 38 बिलियन लीटर नगरपालिका वाला अपशिष्ट जल उत्पन्न करते हैं, जिनमें से केवल 29% का उपचार किया जाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने यह भी कहा है कि 2011 में किए गए सर्वेक्षण में लगभग 8,000 शहरों में केवल 160 सीवेज प्रणाली और सीवेज उपचार संयंत्र थे। भारतीय शहरों में दैनिक रूप से उत्पादित लगभग 40,000 मिलियन लीटर सीवेज में से केवल 20% का उपचार किया जाता है। यमुना नदी एक कचरे के ढेर का क्षेत्र बन चुकी है जिसमें दिल्ली का 57% से अधिक कचरा फेंका जाता है।
दिल्ली के केवल 55% निवासियों को एक उचित सीवरेज प्रणाली से जोड़ा गया है।
विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (सीएसई) के अनुसार, यमुना नदी के प्रदूषण में लगभग 80% अनुपचारित सीवेज है।
गंगा को भारत में सबसे प्रदूषित नदी माना जाता है।
गंगा नदी में नियमित रूप से लगभग 1 बिलियन लीटर कच्चे अनुपचारित सीवेज को प्रवाहित किया जाता है।
गंगा नदी में प्रति 100 मिलीलीटर जल में 60,000 फ्रैकल कॉलिफॉर्म बैक्टीरिया होते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा है।
Saturday, June 16, 2018
मेरी गंगा यात्रा भाग-46
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