मेरी गंगा यात्रा भाग/57
इक प्रयास गंगा बचे
कल मैं एक खबर पढ़ रहा था कि पहाड़ से मैदान तक पानी ही पानी,यानी कि बाढ़ ही बाढ फिर भी दो दिन बाद आपको सुनने को मिलेगा की भारत मे जल की कमी है , भूमि का जलस्तर कम हो रहा हैं, वाह हैं न पागल पन की बात और हो भी क्यों न हमारा 90% पानी व्यर्थ ही बह कर समुन्द्र चला जाता हैं और यह तब है जब हमें आज़ाद हुए 70 वर्ष लगभग हो गये, आज हम चाँद से आगे मंगल तक अंतरिक्ष मे यान भेजने मे समर्थ हैं पर पानी को कैसे सुरक्षित रखे इससे ना समझ है, कानून को कैसे तोड़ना हैं यह हमे आता हैं, राष्ट्रीय सम्पत्ति को हानि पहुचाने में हमने पी.एच्. डी कर रखी हैं सरकार को वोट बैंक की राजनीति आती हैं यहां यू कहै आजादी रास नही आ रही हमें लठ्ठ की भाषा ही समझ मे आती हैं यह देश हमारा हैं इसका निर्माण हमें करना है समाज मे ऐसी भावना ही नही हैं बस एक ही बात आती हैं हमें क्या, हमारा काम थोड़े है, विचारों में माहिर फुटबॉल के खिलाड़ी है अपनी कमियों की बॉल दूसरों के पाल् में फैकनी जरूर आती हैं
हमें क्या, हमें क्या,..? इसी ने देश समाज का नाश किया हैं मेरी इतना सा करने से क्या होगा.? क्या गंगा बच जायेगी, देश का विकास होगा आज यह सोच हैं 90%भारतीयों की,नकारात्मक सोच ही नरक हैं सकारात्मक सोच ही स्वर्ग हैं यह जान लो,लक्ष्य को भेदना, ब्रह्म की संवेदना,
Saturday, September 15, 2018
मेरी गंगा यात्रा भाग-57
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