मेरी गंगा यात्रा भाग-67
इक प्रयास गंगा बचे
स्वास्थ्य की जागृति भारत मे सदियों पुरानी हैं आयुर्वेद हजारों वर्षों से समाज मे प्रचलित हैं आजादी के बाद से केन्द्र व राज्य सरकारें चिकित्सा व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने के लिए करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा देती है, लेकिन वही विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है यह पर्याप्त नही है भारत मे महिलाओं, बच्चों मे मृत्यु दर अधिक है आज लभगभ 30 से 40 प्रतिशत लोग ही लम्बी आयु भोग पाते है जब कि चाइना, जपान में 99प्रतिशत लोग 90,व100 आयु का आंकड़ा पार कर जाते है यह केवल एशिया की बात है विश्व की बात बाद में करेगे, वही विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती हैंभारत के उत्तर प्रदेश में 12 प्रतिशत बीमारियों की जड़ गंगा का प्रदूषित हो रहा जल ही है। जो आगे बढ़ेगा ही,यदि सरकार गंगा के प्रदूषित होने के मुददे पर गंभीरता से विचार कर काम शुरु करे तो हर परेशानियां खुद ही हल हो जायेंगी। वैज्ञानिकों की रिपोर्ट को अगर सही माना जाये, तो आज गंगाजल पीने की तो बात ही छोडिय़े, खेतों में सिंचाई करने लायक भी नहीं है। प्रदूषित गंगाजल से भूमि बंजर हो सकती है। जो गंगा लाखों लोगों का पोषण करती हैं वह जहरीली हो रही हैं जो गंगा के किनारे बसने वाले कस्बे हैं यह उनके लिये घातक रिपोर्ट हैं यह तो निश्चित ही हैं प्रदूषित जल से उगाई जा रही फसल भी हानिकारक ही है, मतलब गंगाजल लगातार जहर में परिवर्तित होता जा रहा है,या ये कहे कि हरिद्वार के बाद गंगा जल जहर की शक्ल मे बह रहा हैं जो जल्दी हरिद्वार और पहाड़ों मे भी हो जायेगा,70 सालो का इतिहास देखै तो पायेंगे सरकारे सिर्फ योजना और प्लान बनाने के बाद हाथ पर हाथ रखे बैठी देख रही है, जब कि गंगा के विलुप्त होने पर या जहरीला होने पर समाज के किसी एक वर्ग पर ही असर नहीं होगा। यह हर जाति, हर धर्म और हर समुदाय के लोगों को प्रभावित करेगा गंगा की सहायक गौला ,कोसी,राम गंगा,जैसी नदियां शिवालिक पुत्री है लेकिन ये गंगा सखी भी है, गौला और कोसी बरेली जिले में जाकर राम गंगा में और रामगंगा बदायूं जिले में गंगा में सम्माहित हो जाती है, तो क्या नमो गंगे योजना इन नदियों के लिए नही होनी चाहिए? कुछ अरसा पहले उत्तराखंड के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कई पेपर मिलो और फैक्टरियों को बंद भी करवाया था कि इनका कचरा गंगा में इन्ही नदियों से पहुंच रहा है। यदि ऐसा है तो उत्तराखंड सरकार को गौला रामगंगा और कोसी जैसी नदियों के आसपास कचरे सीवर से बचने की योजना को नमो गंगे योजना का हिस्सा बनना चाहिए।बन्धु खाली गंगा को साफ करके गंगा साफ नही हो जाने वाली, उत्तराखंड से निकलने वाली हर छोटी बड़ी नदी की पानी की धारा को साफ रखना होगा, हाल ही में वाइल्डलाइफ ऑफ इंडिया की एक रिसर्च में भी ये बात सामने आई है कि अविरल बहने वाली नदियो के किनारे बसे शहर कस्बे गांव भी गंगा के पठार का हिस्सा है, भू गर्भ वैज्ञानिक पदम विभूषण प्रो खड़क सिंह वाल्दिया कहते है कि दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रो में अब गंगा का पठार जमुना की सभ्यता वाला क्षेत्र शामिल हो गया है जिसकी गैसों से प्रदूषण से हिमालय और शिवालिक में मौसम के बदलाव हो रहे है कहीं तेज गर्मी तो कभी तेज बारिश से बादल फट रहे है। जिस तरह से गौला नदी किनारे कूड़ा डाला जारहा है,सीवर डाला जा रहा है वो गंगा तक पहुंच रहा है,ये बात हम नही डब्लू डब्लू एफ की रिपोर्ट में सामने आया है। बरहाल उत्तराखंड सरकार ये भी योजना बनाये कि हमारी नदियां बारहो महीने साफ सुथरी रहे वो गंदे नालो में तब्दील न हो।
Saturday, September 15, 2018
मेरी गंगा यात्रा भाग-67
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