Saturday, September 15, 2018

मेरी गंगा यात्रा भाग-65

मेरी गंगा यात्रा भाग-65
इक प्रयास गङ्गे बचे
मित्रों पिछले लेख मे हमने चिंता व्यक्त की हमारा देश पर सेवा को अपना धर्म मानता हैं भूखे को भोजन प्यास को पानी, पिलाना मानवता का भाग हैं सदियों से प्याऊ लगाना शुभ माना जाता हैं और आज आज़ादी के बाद देश मे पानी बिकता हैं जो हमारे लिये परेशानी का सबब हैं एशिया मे पानी पिलाना सबाब काम माना जाता है पर पूंजीवाद ने पीने के पानी को भी व्यवसाय बना दिया आज यह 100अरब डॉलर का व्यवसाय हैं सबसे पहले उन्नीसवीं सदी की शुरूआत से ही यूरोप में बोतलबंद पानी के व्यापारी पैदा होने लगे थे। 1845 में पहली पानी कंपनी पोलैण्ड के मैनी में शुरू हुई जिसका नाम था पोलैण्ड स्प्रिंग बाटल्ड वाटर कंपनी। 1845 से शुरू हुआ बोतलबंद पानी का यह कारोबार आज 100 अरब डालर का भरापुरा उद्योग है। दुनिया में हर साल 100 अरब डालर से भी ज्यादा पैसा बोतलबंद पानी खरीदने पर खर्च किया जाता है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। हालांकि यहां पानी के बोतलबंद व्यापार की शुरूआत बहुत देर से हुई यानी अस्सी के दशक में। उस समय प्रफांस की एक कंपनी डैनोन मिनरल वाटर का व्यापार करने आई थी। उसने एक लीटर पानी की कीमत रखी 70 रुपए। आज भारत में बोतलबंद पानी का व्यापार करनेवाली लगभग 100 कंपनियां और उनके 1200 बाटलिंग प्लांट हैं। इनमें वे कंपनियां और ब्राण्ड शामिल नहीं हैं जो कुटीर उद्योग की तर्ज पर पाउच पैक पानी का व्यापार कर रही हैं।भारत में बोतल बंद पानी के दिन बहुत बाद में आए हैं. पहले लोग अपने साथ पानी की बोतल लेकर नहीं चलते थे. लेकिन लगभग हर हिंदू परिवार में पानी का एक कलश या कोई दूसरा बर्तन ज़रुर होता था जिसमें पानी भरा होता था. गंगा का पानी.पीढ़ियाँ गुज़र गईं ये देखते-देखते कि हमारे घरों में गंगा का पानी रखा हुआ है- किसी पूजा के लिए, चरणामृत में मिलाने के लिए, मृत्यु नज़दीक होने पर दो बूंद मुंह में डालने के लिए जिससे कि आत्मा सीधे स्वर्ग में जाए.मिथक कथाओं में, वेद , पुराण , रामायण महाभारत सब धार्मिक ग्रंथों में गंगा की महिमा का वर्णन है.कई इतिहासकार बताते हैं कि सम्राट अकबर स्वयं तो गंगा जल का सेवन करते ही थे, मेहमानों को भी गंगा जल पिलाते थे.इतिहासकार लिखते हैं कि अंग्रेज़ जब कलकत्ता से वापस इंग्लैंड जाते थे, तो पीने के लिए जहाज में गंगा का पानी ले जाते थे, क्योंकि वह सड़ता नहीं था. इसके विपरीत अंग्रेज़ जो पानी अपने देश से लाते थे वह रास्ते में ही सड़ जाता था.गंगा जब हिमालय से आती है तो कई तरह की मिट्टी, कई तरह के खनिज, कई तरह की जड़ी बूटियों से मिलती मिलाती है. कुल मिलाकर कुछ ऐसा मिश्रण बनता जिसे हम अभी नहीं समझ पाए हैं." दूसरी नदियों के मुकाबले गंगा में सड़ने वाली गंदगी को हजम करने की क्षमता 15 से 20 गुना ज्यादा है दूसरी नदी जो गंदगी 15-20 किलोमीटर में साफ़ कर पाती है, उतनी गंदगी गंगा नदी एक किलोमीटर के बहाव में साफ़ कर देती

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