Saturday, September 15, 2018

मेरी गंगा यात्रा भाग-73

मेरी गंगा यात्रा भाग-73
इक प्रयास गंगा बचे
कुछ समय पहले जागरण में समाचार पढ़ा कि कन्नौज: गंगा नदी में बायोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड (बीओडी) की कमी से पांच दिन पहले काफी तादाद में मछलियां मर गई थी। यह पिछले माह की बात हैं सूचना पर जिला प्रशासन समेत प्रदूषण नियंत्रण टीम ने दौरा कर हकीकत जानी। साथ ही उच्चाधिकारियोंको पत्र लिखा। इसके बाद नरौरा बांध से पानी छोड़े जाने से गंगा के जलस्तर बढ़ा। साथ ही जहरीले पानी में कमी आई है।  क्योंकि गंगा स्वयं प्रकृति हैं और प्रकृति स्वयं की रक्षा करना जानती हैं जिसके चलते जलीय जीवों पर खतरा फिलहाल टल गया है। यहां गंगा नदी मे पर्याप्त जल हैं सरकारी तंत्र द्वारा  गंगा के जल को निर्मल बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। गत समय गंगा नदी में घुलित आक्सीजन की मात्रा कम होने से काफी तादाद में छोटी-बड़ी मछलियां मर गई थी। इसकी सूचना मिलते ही जिला प्रशासन समेत प्रदूषण नियंत्रण टीम में हडकंप मच गया था। बाहर से आई टीमों समेत जिलाधिकारी रवींद्र कुमार समेत प्रशासनिक अफसरों ने निरीक्षण कर हकीकत जानी। इसमें बायोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड (बीओडी) की कमी से मछलियों के मरने की बात सामने आई। डीएम समेत अफसरों ने उच्चाधिकारियों को पत्र लिख यथास्थित से अवगत कराया। इसके बाद नरौरा बांध से पानी छोड़ा गया। इसमें गंगा नदी में पानी बढ़ने के साथ गंगा जी काला पानी साफ हो गया। साथ ही घुलित आक्सीजन की कमी दूर हो गई। गौरतलब है कि पीलीभीत, शाहजहांपुर, हरदोई होकर गंगा में मिली गर्रा नदी व मुजफ्फर नगर, मेरठ, बुलंदशहर, अलीगढ़, फर्रुखाबाद होकर कन्नौज के मेहंदी घाट पर गंगा में गिरने वाली काली नदी का पानी  जहरीला पानी है। यहां कहै की गन्दे नाले के पानी के साथ ओधोगिक कचरे की मात्रा अधिक है इन दोनों नदियों के माध्यम से करोड़ों लीटर गंदगी प्रतिदिन मोक्षदायिनी गंगा नदी पर गिर रही है। इससे भविष्य में जलीय जंतुओं को खतरा बढ़ने की संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता है।  दूसरे इन क्षेत्रों में यू भी मछलियों का अवैध शिकार होता हैं  सरकारी तंत्र की माने तो यहां के नमूने लेकर परीक्षण के लिए भेजे गए हैं। आज एक महीना होने को हैं क्या परिणाम हैं वो ऊपर वाला जाने, क्या इससे सच्चाई का पता चलेगा। राज तन्त्र का कहना है गंगा में पहुंचने वाली गंदगी रोकने के उपाय किए जा रहे हैं। भई यह सब तो पिछले 40 वर्षों से सुन रहे पर जमीनी कार्यवाही क्या है इसके लिए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा गया है। पत्र लिख रहे जवाब हम बता देते है क्या आयेगा यही की हम कार्यवाही करंगे बन्धु पत्र तो हमने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, आदि को भी लिखे है क्या होगा कुछ नही पहले राजीव के समय सुनने मे आता था हमने देखा, हम देखेंगे, और वह देखते चले गये मोन सिह मोन ही रहे और मोदी जी जीने गंगा ने भुलाया हैं गंगा मेरी मां हैं काशी मेरा दूसरा घर वह विदेश यात्रा से नही बचते, हा 2019 के चुनाव आ रहे है अब सब के दर्शन गंगा जी को होंगे..? जब तक आम नागरिक अपनी जिम्मेदारी नही लेंगे न गंगा बच सकती हैं न पर्यवरण, आइये गंगा तथा अन्य नदियां हमारी हैं हम ही प्रयास करें अन्यथा आने वाली पीढ़ियों को हम क्या देंगे वही हरिद्वार और अन्य गंगा के किनारे पर लगने वाला कावड़ मेला भी गंगा की के लिये गल घोटू हो रहा हैं हरिद्वार मे चारो ओर भीड़ ही भीड़ हैं और जिससे शहर की अर्थव्यवस्था बिगड़ गई हैं यदि शहर के आम व्यक्ति की कोई परेशानी हो तो एम्बुलेंस के लिये भी रास्ता नही है जल भरना तो ठीक है पर गंगा मे पुरानी कावड़ छोड़ना कहा तक सही हैं 3करोड़ लोगों का कचरा गन्दगी शहर को और शहर की गंगा को अर्पण हैं मात्र 15 दिनों मे गंगा के प्रदूषण की स्थिति एक वर्ष मे होने वाले प्रदूषण से हजार गुना होगी और यही वाराणसी, पटना कलकत्ता आदि मे होगी हमारी रिवायत हमारी संस्कृति पर भारी पड़ने वाली हैं जब समाज ही जागरूक न हो तो ऐसे मे प्रशासन पंगु और राज तन्त्र मोन हो जाता हैं और समाज भिक्षु, अपंग जल ही जीवन हैं और नदियों इनकी पूरक,नदियों ही नही रहेंगी तो संस्कृति कहा विकास करेंगी

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