मेरी गंगा यात्रा भाग-68
इक प्रयास गंगा बचे
बात गंगा जी की अशुद्धि की हो तो विश्वास नही होता गंगा की अशुद्ध होगी पर बीते समय में परिवर्तन मजबूरियां बन गईं और गंगा नाला, पर विश्वास रखने वालों के लिये गंगा बीमार है पर मृत नही, न ही अभी वल्टीनैटर पर है बस सामुहिक प्रयास की आवश्यकता हैं, पूर्व समय के लोगों की नजर में गङ्गा जल अमृत था आयुर्वेद मे औषधि, हिंदुत्व की नज़र मे प्राण,भोजन कुतूहल’। उसमें गंगाजल की उपयोगिता बताते हुए लिखा है- ‘गंगाजल श्वेत, स्वादु, स्वच्छ, रुचिकर, पथ्य, भोजन पकाने योग्य, पाचक शक्ति बढ़ाने वाला और बुद्धि को तीव्र करने वाला है।’ मेरी माने तो इसके साथ ही गंगा जल प्रतिदिन लेने से शरीर मे रोग प्रतिरोध क्षमता बढती हैं जुखाम मे गंगा जल प्रतिदिन लेने पर चार दिन में जुखाम वायरल ठीक हो जाता है गंगा जल मे तुलसी पत्र लोंग दालचिनी, गिलोय लेने पर डेंगू चिकनगुनिया, कैसा भी ज्वर ठीक हो जाता हैं गंगा जल मे कैंसर को मिटाने की क्षमता है गाय मूत्र गंगा जल को एक साथ प्रयोग करे,वही आयुर्वेद मानता हैं गंगा जल की एक आचमनी तीन वर्ष तक मनुष्य के शरीर मे रहती हैं ये गंगा जी की महिमा कहिये गंगा जल का पान करने वाला कभी नरक नही जाता ऐसा शास्त्र कहते है कल इसपर विशेष चर्चा करूँगा गीताप्रेस की पुस्तकों के अनुसार विवेचना करेंगे, इसपर अभी और खोज हो सकती हैं आज से दो हजार वर्ष पूर्व है भी गंगाजल को पथ्य कहा गया है आयुर्वेद के जानकार चक्रमणि दत्त ने भी, जो सन् 1060 के लगभग हुए हैं, इसका समर्थन किया है।‘गंगा को हिन्दू पवित्र समझते हैं, उनका कहना है कि गंगा का जल शुद्ध है और कभी दूषित नहीं होता। हम लोग गंगाजल को ऐसा नहीं समझते क्योंकि भारत के प्रधान नगर काशी में ही लाखों मनुष्य अपना धर्म समझकर प्रतिदिन गंगा में स्नान कर उसे गन्दा कर देते हैं। नालियों का जल, शव और कूड़ा-कर्कट भी इसमें बहाया और फेंका जाता फारसी के सुविख्यात कवि श्री आफरी ने भागीरथी के जल का गुणगान करते हुए लिखा है- ‘गंगा के जल में गोता लगाओ ताकि पुण्य का मोती हाथ लगे। यदि तुम अपने होठों को गंगाजल से तर कर लोगे तो फिर महायात्रा (मृत्यु) के वन में प्यास से न तड़पोगे और प्रलय के भयंकर ताप में पड़कर भी न जलोगे।गंगाजल की इन्हीं उपयोगिताओं के कारण हमारे यहाँ अनादि काल से राजाओं से लेकर निर्धनों तक इसका प्रयोग होता आया है। केवल हिन्दुओं में ही नहीं किन्तु मुस्लिम शासन काल में बादशाहों के महलों में भी गंगाजल का ही प्रयोग होता था।
Saturday, September 15, 2018
मेरी गंगा यात्रा भाग-68
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