मेरी गंगा यात्रा भाग 101
एक प्रयास गंगे बचे
20 नंवबर 2019 के बाद आज पुनः गंगा यात्रा का तीसरा पड़ाव आरम्भ करते हैं पिछले कुछ महीनों से सम्पूर्ण विश्व कोरोना कोविड 19 की महामारी को झेल रहा है रोगियों की संख्या लाखो से करोड़ों मे पहुँच गई और मरने वालों की संख्या भी कम नही है भारत मे भी लोगो ने पहली बार बिना युद्ध का कर्फ्यू देख लिया सड़कों पर केवल पशु पक्षी ही नजर आते थे इंसान तो मानो घर रूपी पिंजरे मे कैद हो, बार घूमने वाले आवारा कुत्ते भी मनुष्य को चिड़ाते थे हम कैद में और कैदी बाहर, कहते है जंगल के पशु भी नजदीक शहरों मे मौज मस्ती कर चिड़ा रहे थे आज भी कोरोना की स्थिति ठीक नही है परन्तु विश्व की सभी सर्कसों ने ( माफ करना सरकारों) कोविड 19 के साथ समझौता कर लिया है लोग मरते है तो मरे,बस राजस्व की हानि नही होनी चाहिए, वही कोरोना के चलते प्रकृति ने चैन की सांस ली, वही मनुष्य ने भी 100 से अधिक समय के बाद प्रदूषण मुक्त शहर देखै और मिली प्रदूषण मुक्त वायु,
सभी गंगा पुत्र चिल्ला चिल्ला कर मर गये पर सामाजिक किड़ो पर गंगा और नदियों को बचाने की प्राथर्ना व्यर्थ रही 100 वर्षो में नदियाँ नाला होने लगी, वही प्रकृति ने अपनी एक चाबी भरी एक बार मे प्रकृति ने स्वयं को शुद्ध कर लिया इतने होने पर भी उत्तरवाहिनी गंगा के बीच स्थित तीन पहाड़ी के पास एक अत्यंत मनोरम दृश्य देखने को मिल रहा था। वटेश्वरस्थान तीनों पहाडिय़ों के प्रतिबिंब गंगा के नीले जल में स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे। पचास की उम्र के लोगों के लिए तो यह किसी अजूबे से कम नहीं है।नमामि गंगे योजना के तहत पिछले पांच वर्षों में खर्च किए गए लगभग आठ हजार करोड़ रुपये भी वह काम नहीं कर पाए जो लॉकडाउन के दौरान हो गया। हालांकि नमामि गंगे योजना अंतर्गत बन रहे सीवरेज ट्रिटमेंट प्लांट भी लगभग पचास स्थानों पर चालू हो चुके थे। विगत पचास वर्षों से गंगा नदी की सफाई का प्रयास सरकारों द्वारा किया जा रहा है, पर कागज़ी कार्यवाही मे अधिक, हैं लेकिन जब लॉकडाउन के दौरान प्राकृतिक रूप से गंगा नदी काफी स्वच्छ हो चुकी है तो अब गंगा के किनारे बसी आबादी का यह कर्तव्य बनता है कि लॉकडाउन के समाप्त होने के बाद जितनी पवित्र गंगा हमें मिले उसे उतना ही स्वच्छ रखें। पर ऐसा होगा,..? कुते की पूंछ 12 वर्ष पाइप में रखी ,निकली फिर टेड़ी की टेढ़ी, वर्ष 1980 के आसपास से गंगाजल मटमैला नजर आने लगा। स्वामी जीके अनुसार गंगा की दुर्गति के लिए उद्योगों का प्रदूषित जल और फरक्का बांध का निर्माण है। जैसे ही गंगा का अविरल प्रवाह थमा तो गंगा प्रदूषित होने लगी।शोधकर्ताओं के अनुसार शुद्ध जल में डिजाल्वड आक्सीजन की मात्रा पांच मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक होनी चाहिए। वहीं बायोकेमिकल आक्सीजन डिसाल्व की मात्रा तीन मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होनी चाहिए। बायोकेमिकल आक्सीजन डिसाल्व सबसे अधिक उद्योगों से आता है। उद्योगों के बंद रहने के कारण उद्योगों का प्रदूषित पानी गंगा में नहीं आ रहा है।
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